मन की धारा ...... जैसी भी बह निकली ...... कुछ कविताएं, कुछ कहानियाँ, कुछ नाटक ........ जो कुछ भी बन गया ........ मुझे भीतर तक शीतल कर गया ......
जी उठता है हर बार
फिर भी
मारो उसे बार बार
वो जो रावण है
छुप के रहता है हमारे मन की लंका में
केटी ****
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