शनिवार, 12 सितंबर 2020

यात्रा

अगर ये धरती गोल है

तो पहुँच ही जाऊँगा तुम तक

एक दिन।

चल पड़ा हूँ मैं इस छोर से

बस तुम रुकी रहना ठीक उसी जगह, 

उसी जगह जहाँ बरसों पहले 

रोपा था यादों का बिरवा हमने। 

अक्षांश और देशांतर रेखाओं पर झूलता, खोजता

बढ़ रहा हूँ तेरी ओर,

कि जाने क्यों लोग बजाते हैं तालियाँ

नवाजते हैं उपाधियाँ

कहते हैं इन्हें मेरी उपलब्धियाँ,

जबकि मैं जानता हूँ

ये तो मेरे बढ़ते कदम हैं तेरी ओर,

और मैं पहुँच ही जाऊँगा तुम तक
एक रोज, 

अगर ये धरती हुई गोल

और तुम प्रतीक्षारत रहीं

यादों के बिरवे तले।



केटी
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रविवार, 12 जुलाई 2020

रास्ते के रंग

वह जा रहा था। रास्ता था, वह था और साथ थे नजारे... सूरज, धूप, हवा, रेत, बबूल, पेड़, पंछी।
रास्ता मुड़ा। अब सूरज ठीक ऊपर चमकने लगा। तीखी धूप आँखें चौंधियाने लगी, बदन जलाने लगी। हवा भी जैसे डर कर धूप का साथ दे रही हो! पहले तन झुलसा फिर मन झुलसना शुरू हो गया। गहरा आघात हमें भीतर झुलसाने लगता है। दुनिया की हर शय का रंग गहरा काला हो जाता है। सन्नाटा काट खाने को दौड़ता है। कुछ कदमों की दूरी मीलों लंबी हो जाती है। हर साँस दुख का भारी दस्तावेज बन जाता है। 

रास्ता फिर मुड़ा। सूरज दाँयी ओर पेड़ों की ओट में आ गया। अरे...! ये क्या...! पेड़ों की घनी डालियों से छन कर आती हुई धूप खुशबू में बदल गई! आहा! कितनी सलोनी धूप!... कभी चोरी से झाँकती और लाज से पीली हुई प्रेमिका पहली बार अपने प्रेमी से मिलने का जतन कर रही है। पेड़ की पत्तियों में सरसराहट जैसे प्रीत का प्रथम बोल बोलने में उसके कंठ में आ गए कलेजे की थरथराहट है।... और वो, बेचैन प्रेमी-सा उसके इंद्रजाल में है। हवाएँ मृदंग बजा रही हैं। रास्ते की रेत लिपटना चाहती है... मुझे भी साथ लेलो, मैं भी साक्षी बनूँगी तुम्हारे प्रणय की। समय धुआँ हो गया है, भागता बादल हो गया है। कितने महीने मुहूर्तों की मानिंद गुजर जाते हैं, साल समय की सबसे छोटी इकाई बन बीत जाते हैं।

रास्ता फिर मुड़ता है... फिर मुड़ता है... फिर मुड़ता है। हर बार सब कुछ बदल जाता है। तब कहीं जाकर समझ में आता है कि समय कुछ नहीं बदलता, बदलने वाला होता है वो मोड़ जो तय करता है कि धूप जलाएगी या प्रेयसी बन गुनगुनाएगी।

केटी
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रविवार, 7 जून 2020

मौन

भीतर का गहन मौन

सिद्ध होता है हमेशा, हर बार

कहीं अधिक समर्थ

कहे-सुने जाने वाले शब्दों से।

हम गढ़ ही नहीं पाए ऐसा शब्द

मन के दुख को जो करदे ज्यों का त्यों अभिव्यक्त, 

इसीलिए ऐ दोस्त, 

मानना ही पड़ता है हर किसी को, 

"मौनं सर्वश्रेष्ठ साधनम्।"

केटी
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शुक्रवार, 29 मई 2020

जानना

वो जिसे कहते हैं जानना

वो सदा ही था आधा अधूरा, 

मन की गहन गुफाओं में

छुप कर रहता जाने क्या क्या!

थक कर कहना पड़ता है

वो सब जो जाने थे, 

कितने अंजाने थे।

केटी
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शुक्रवार, 8 मई 2020

प्रीत बावरी

... प्रीत न करियो कोय!
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प्रीत बावरी....! क्या इस जगत में प्रीत सदा अधूरी रहती है? इसके किरदार तो पूर्णतया  लौकिक हैं, किन्तु अपेक्षाएं, अभीप्साएं पारलौकिक-सी हैं।"तुम सदा मेरे साथ रहना, तुम केवल मेरे हो, ये आत्माओं का मिलन है......," जैसी ही अनेकोंनेक पुकारें प्रेमियों की ह्रदय-धरा पर उठती रहती हैं।जागतिक स्तर पर तो ये आकांक्षाएं अधूरी ही रह जाती हैं, तो क्या प्रीत इस लोक में किसी पारलौकिक शक्ति की खोज है...? या दग्ध ह्रदय को किसी अंजान, अज्ञात प्रदेश से आने वाली या आती हुई महसूस होने वाली किसी रूहानी शीतलता का आभास करवाने का माध्यम है...? कहीं प्रीत का ये अधूरापन ही तो इसे अनूठा नहीं बना देता है, या कहीं ये ही तो इसके किरदारों में एक अद्भुत आग तो नहीं भर देता जो कि उन्हें ज़माने से टकराने की कुव्वत दे देता है...?
...सबसे ऊंची प्रेम सगाई!

केटी
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मंगलवार, 31 मार्च 2020

अधूरापन

किसी को भी

पूरा पढ़ पाया कौन

पढ़ना अधूरा ही रहता है

जैसे रह जाता प्रेम अधूरा

लाख जतन के बाद भी।

केटी
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शुक्रवार, 20 मार्च 2020

भीतर जो है

यूँही अपने आप

नहीं उपजता

कुछ भी यहाँ।

गेहूँ, गुलाब, बाजरा या बेर;

और यहाँ तक कि

घृणा, प्यार, करुणा, क्रोध और आध्यात्मिकता भी

नहीं उपजते

कुछ भी यहाँ

यूँही अपने आप।

मिट्टी, पत्थर और अतीत के खड्ड में

दबे होते हैं कुछ बीज

अवसर की अनुकूलता

बनती है कारण

जिनके उपजने का।

इसलिए जो दिखता है बाहर ऐ दोस्त!

वो दबा है बहुत गहरे

भीतर कहीं।

केटी
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