मंगलवार, 12 जून 2018

जानवरों की जीत


शहर की भीड़-भाड़ से दूर एक बहुत घना जंगल था। जंगल में बड़े-बड़े पेड़, कंटीली झाड़ियाँ और गहरा लसलसा दलदल था। शहर के लोग अक्सर इससे दूर ही रहते थे। उस जंगल में बहुत सारे जानवर, पशु-पक्षी रहते थे। हाथी, बंदर, चिड़िया, खरगोश, हिरण, जिराफ और भी कई सारे जानवर आपस में मिलजुल कर रहते थे। ये जंगल उनका घर था और अपने घर में वे सब चहकते रहते थे।
एक दिन शाम को गौरैया चिड़ियों का एक झुंड कहीं से उड़ता हुआ आया और जंगल के बीचों-बीच खड़े सागवान के पेड़ों की बड़ी-बड़ी डालियों पर उतर कर आराम करने लगा। सबसे पहले ये खबर लगी घुमक्कड़ी बंदर को। दिन भर इधर-उधर घूमते रहने के कारण ही सब जानवरों ने उसका नाम घुमक्कड़ी रख दिया था। जानवरों में एक वो ही था जो शहर में भी जाने कहाँ-कहाँ घूम आया था। घुमक्कड़ी की एक खास आदत थी कि वो जब भी कोई नई जगह घूम कर आता तो जंगल के सारे साथियों को वहाँ के बारे में सारी बातें बताता। एक दिन तो हाथियों के मुखिया ने हँसते हुए कह भी दिया था, “हम तो सारी उम्र इसी जंगल में रह गए, अगर ये घुमक्कड़ी न होता तो हमें तो इस जंगल के बाहर की कोई खबर ही नहीं मिलती।” इस पर ननकू गिलहरी ने मुँह बनाते हुए कहा, “आया बड़ा दुनिया घूमने वाला! हमने भी कई बार शहर देखा है, बस ये है कि हमें इस घुमक्कड़ी की तरह बातें बनाना नहीं आता।” इस पर सारे जानवर ठठा कर हँस पड़े थे।
उस दिन सारे जानवर दिन का खाना खाकर सुस्ता रहे थे कि घुमक्कड़ी पहुँच गया। “अरे सब लोग सुनो, अभी-अभी बहुत सारी चिड़ियों का झुंड सागवान के पेड़ों पर उतरा है। जाने कौन हैं, कहाँ से आई हैं, कुछ पता नहीं,” घुमक्कड़ी बोला। सारे जानवर उठ खड़े हुए। पेड़ों के नीचे जाकर हाथियों के मुखिया ने पूछा, “अरे ओ चिड़ियों! कौन हो, कहाँ से आई हो?” हाथी की गरजदार आवाज़ सुनकर चिड़ियों के झुंड में सन्नाटा छा गया। चिड़ियों के छोटे-छोटे बच्चे तो डर के मारे पेड़ के बड़े-बड़े पत्तों में दुबक गए।

तभी पेड़ की कोठर से चिड़ियों की रानी निकल कर आई और बोली, “क्या हुआ हाथी दादा, पहचाना मुझे…, मैं सोन चिरैया..., नीलवन वाली।” हाथियों का मुखिया बोला, “अरे सोन चिरैया...! इतने समय बाद...! चार-पाँच बरसातें निकल गई होंगी..., कहाँ रही अब तक?” चिड़ियों के झुंड को जैसे ही पता चला कि ये तो हमारी रानी के जान-पहचान वाले ही हैं तो उनका डर दूर हो गया और वो फिर से डालियों पर फुदकने लगा।
“क्या बताऊँ हाथी दादा, बड़े खराब दिन देखे हैं,” सोन चिरैया ने पेड़ से नीचे आकर कहा। “हाँ ये तो है, आजकल पीने के पानी की भी बहुत कमी हो रही है। एक नदी थी जो हमेशा बहती रहती थी, उसमें भी अब कभी-कभी ही पानी देखने को मिलता है,” हाथी दादा ने गहरी साँस लेकर कहा। सोन चिरैया रुआसी होकर बोली, “इतना भी होता तो कैसे ना कैसे समय निकल ही जाता दादा, पर हमारा तो पूरा घर ही उजड़ गया।” जंगल के सारे जानवर इन दोनों की बातें सुन रहे थे। मिचमिची आँखों वाले हिरण ने पूछा, “क्या हुआ सोन चिरैया, किसने तुम्हारा घर उजाड़ दिया?” सोन चिरैया ने कहा, “भैया क्या बताऊँ, मेरे तो भाग ही फूटे हैं, वरना पूरा कुनबा लेकर दर-दर क्यों भटकती फिरती।” हाथी दादा ने उसे तसल्ली दी, “चिंता मत करो बहन, हम सब तुम्हारे अपने ही हैं। हमें तुम सारी बात बता दो, शायद इससे तुम्हारा दुख कुछ हल्का हो जाए।”
गहरी साँस लेकर सोन चिरैया बोली, “हमारा परिवार नीलवन में रहता था। बहुत सुंदर घर था हमारा। सभी लोग बड़े प्यार से रहते थे। दाना, पानी, हवा किसी चीज की कमी नहीं थी। क्या पता किसकी नज़र लगी कि सब कुछ खत्म हो गया। एक दिन शहर से खूब सारे लोग बड़ी-बड़ी मशीनें लेकर आए और पेड़ों को काटने लगे। तीखे-तीखे दाँतों वाली धारदार मशीनें जब पेड़ों पर चली तो एक के बाद एक सारे पेड़ गिरने लगे। हमारे बहुत सारे साथी उनके नीचे दब कर घायल हो गए, कुछ तो बच भी नहीं पाए। मेरे खुद के परिवार के नन्हे-नन्हे बच्चे जो अभी उड़ना भी नहीं जानते थे, भारी-भारी पेड़ों के तले दब कर मर गए,” बोलते-बोलते सोन चिरैया की आँखों से आँसू बहने लगे। हाथी दादा ने उसे दिलासा देते हुए कहा, “तुम्हारे साथ बहुत बुरा हुआ सोन चिरैया। जाने क्यों लोग दूसरों के घरों को उजाड़ते हैं!... पर अब तुम चिंता मत करो और आराम से अपने परिवार के साथ यहाँ रहो।” सारे जानवरों ने एक स्वर में कहा, “हाँ-हाँ सोन चिरैया, आज से तुम सब हमारे परिवार के सदस्य हो।” रोती हुई सोन चिरैया को खुशी हुई और उसने सबको धन्यवाद दिया। हाथी दादा ने कहा, “अब तुम सब लोग कुछ खा-पी लो, फिर दिन में गपशप करेंगे।” सभी जानवर जाने लगे। अंत में रह गया घुमक्कड़ी। उसने सोन चिरैया से कहा, “मैं तो शहर में कई जगह घूम आया हूँ, तुम सब लोगों को वहाँ की बातें बताऊंगा।” सोन चिरैया मुस्कराते हुए बोली, “ अरे वाह! तब तो हमारी दोस्ती खूब जमेगी।” जल्दी ही मिलने का वादा कर घुमक्कड़ी पेड़ों की डालियों पर कूदता-फलांगता चल दिया। इसी तरह दिन गुजरने लगे। सोन चिरैया को सहारा मिला और वो भी सबके साथ घुलमिल गई। एक दिन खूब बरसात हुई। दिन भर सारे जानवर अपने-अपने घरों में दुबके रहे। पेड़ों की डालियाँ पानी में भीगकर हवा में लहरा रही थीं। जंगल की मिट्टी महक रही थी। शाम के समय बरसात थमी तो सब के सब नदी किनारे आ जुटे। नदी में थोड़ा-थोड़ा पानी चल रहा था। कुछ जानवर नदी में नहा रहे थे तो कुछ किनारे की ठंडी रेत में लोटपोट हो रहे थे। तभी घुमक्कड़ी वहाँ पहुँचा। ननकू गिलहरी ने मुँह टेढ़ा करते हुए कहा, “लो, आ गए गप्पीराम, अब सुनो इनकी बातें।” सभी जानवर हँस पड़े। घुमक्कड़ी ने बताया कि आज वो शहर में बड़े साहब के बंगले पर गया था। वहाँ बातें चल रही थीं कि साहब के नए घर के लिए लकड़ी चाहिए और उन्होंने ठेकेदार को कल ही जंगल से सागवान के पेड़ काट कर लाने के लिए कहा है। हाथी दादा ने घुमक्कड़ी से कहा, “ठीक-ठीक बता, ऐसे ही अपने मन से इधर-उधर की तो नहीं सुना रहा है?” घुमक्कड़ी तमक कर बोला, “अपने मन की क्यों सुनाऊँगा! जो सुना है वही बता रहा हूँ।” हाथी दादा ने कहा, “फिर तो गजब हो जाएगा! सोन चिरैया के परिवार में कुछ दिन पहले ही तो नन्हे-नन्हे बच्चे हुए हैं। दुख के दिनों को भुलाकर पूरे परिवार में खुशियाँ आई हैं। ऐसे में उस बेचारी पर तो दुखों का पहाड़ टूट पड़ेगा।”
लंबू जिराफ बोला, “क्यों ना हम सोन चिरैया से कहदें कि वो अपने बच्चों को लेकर दूसरे पेड़ों पर चली जाए।” सभी को ये बात जच गई। घुमक्कड़ी सोन चिरैया को बुला लाया। हाथी दादा ने उसे सारी बात बताई। वो तो फूट-फूट कर रोने लगी।
“नहीं-नहीं दादा, ये बच्चे तो अभी बहुत छोटे हैं, इन्हें दूसरी जगह नहीं ले जाया जा सकता है। लगता है मेरा दुर्भाग्य मेरा पीछा करते-करते यहाँ भी पहुँच गया।” सोन चिरैया के साथ-साथ उसके परिवार कि सभी चिड़ियाएँ रोने लगीं। आसपास सारे जानवर मुँह उतारे हुए खड़े थे। घुमक्कड़ी बोला, “इस तरह रोने से क्या होगा! हम सबको मिलकर इस मुसीबत का सामना करना चाहिए, कोई उपाय खोजना चाहिए।” सोन चिरैया बोली, “नहीं भैया, मेरे परिवार के लिए आप सबके जीवन को खतरे में मत डालो।” हाथी दादा ने डांठते हुए कहा, “क्या कह रही हो सोन चिरैया, क्या तुम सब हमारे अपने नहीं हो? घुमक्कड़ी ठीक कहता है, हमें मिलकर कोई उपाय खोजना चाहिए।” सभी लोग सोच-विचार करने लग गए। हाथी दादा ने कहा, “अब मेरी बात ध्यान से सुनो। कल सुबह ही घुमक्कड़ी और ननकू अपने साथियों के साथ शहर वाले रास्ते पर जा बैठेंगे। जैसे ही शहर से लोगों को जंगल की ओर आते हुए देखेंगे तो ये लोग शोर करते हुए जंगल की ओर दौड़ेंगे। इससे हमें पता चल जाएगा कि वो लोग आ रहे हैं। इधर पेड़ों पर सभी बंदर और दूसरी तरफ हाथी और जिराफ अपने पूरे परिवार के साथ तैयार रहेंगे। घुमक्कड़ी और ननकू की आवाज़ सुनते ही सब के सब ज़ोर से चिल्लाते हुए जंगल में घुसने वाले लोगों की ओर भागेंगे।... सब को समझ में आ गया कि क्या करना है...?” सभी ने एक स्वर में कहा कि चाहे जो हो जाए इस बार सोन चिरैया का घर नहीं उजड़ने देंगे। सुबह सूरज उगने के साथ ही ननकू और घुमक्कड़ी अपने कुछ साथियों को लेकर शहर से जंगल की ओर आने वाले रास्ते पर डट गए। उनकी नज़रें दूर तक देख रही थीं। इधर पेड़ों और कंटीली झाड़ियों के पीछे हाथियों का पूरा दल छुपकर बैठ गया। दूसरी तरफ लंबू जिराफ अपने परिवार के साथ तैयार था। पेड़ों की ऊँची डालियों पर बंदरों की टोली सबसे पहले कूदने को तैयार थी। सब खामोशी से संकेत का इंतज़ार कर रहे थे। जंगल में ऐसा सन्नाटा कभी न छाया था। उधर सोन चिरैया बार-बार अपने बच्चों से चुप रहने को कह रही थी। मन ही मन डरी हुई वन-देवता से प्रार्थना कर रही थी। सूरज सामने वाले टीले के ऊपर चमकने लगा। तभी घुमक्कड़ी की नज़र दूर उड़ते हुए धूल के बादल की ओर गई। उसने फुसफुसा कर ननकू से कहा, “देख रही हो उधर, लगता है बहुत सारी गाडियाँ आ रही हैं।” ननकू लपक कर पेड़ की सबसे ऊँची डाली पर पहुँची और देखा तो सच में शहर की ओर से एक के पीछे एक कई सारी गाडियाँ जंगल की ओर बढ़ रही थी। जैसे ही वो ज़रा करीब आए और वैसे ही घुमक्कड़ी और ननकू ने अपने साथियों के साथ ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ करनी शुरू करदी। बस इशारा मिलने की देर थी, हाथियों का झुंड चिंघाड़ता हुआ आगे बढ़ा, उधर जिराफ दौड़ने लगे और पेड़ों की डालियों से लटकते हुए बंदर कूद पड़े। जानवर गुस्से में हुंकार मचा रहे थे। और फिर जानवरों का ये दल शहर से आने वाली गाड़ियों पर टूट पड़ा। अचानक हुए ऐसे हमले से शहर से आए लोग चौंक गए और डर के मारे गाड़ियों से कूद-कूद कर भागने लगे। उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर इन जानवरों को हो क्या गया है! जान बचाने के लिए उन्होंने गाडियाँ शहर की ओर मोड़ी और भाग छूटे। जानवरों ने उन्हें खदेड़ते हुए दूर तक भगाया जिससे वो फिर ना लौट आएँ। फिर हाथी दादा ने सबको रुक जाने के लिए कहा। सबके चेहरे पर जीत की खुशी झलक रही थी। नाचते-गाते-चिल्लाते वे जंगल में पहुँचे। हाथी दादा ने सोन चिरैया को बुलाया और कहा, “अब तुम्हें कोई डर नहीं है, आराम से रहो यहाँ। हमने उन लोगों को भगा दिया है। जब तक हम सब एक हैं, हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है।” सोन चिरैया का चेहरा खिल उठा। उसने सभी को धन्यवाद दिया। घुमक्कड़ी बोला, “वैसे सबसे पहले खबर तो मैं ही लाया था।” ननकू बोली, “लो! ये फिर शुरू हो गया।” इस पर सभी जानवर ठहाका लगाकर हँस पड़े।
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शनिवार, 2 जून 2018

ओ तेरे नैना हैं जरा बेईमान से

यह कहानी है बाजा बाबू की। बाजा बाबू...उर्फ रंगलाल। रंगलाल कस्बे के इकलौते बैंडमास्टर प्रभुलाल का बेटा था। उस जमाने में शादियों में बैंड पार्टी को बुलाना बड़े रौब की बात मानी जाती थी, और फिर प्रभुलाल की बैंड पार्टी तो दूर-दूर तक मशहूर थी। बारात जब बैंड बाजे के साथ सज-धज कर निकलती तो गली-मोहल्लों में घरों से निकल कर औरतें-बच्चे-बूढ़े कौतूहल भरी नजर से बारात को देखते और बैंड बाजे की मधुर ध्वनि का आनंद लेते।
उन दिनों रंगलाल कस्बे की सरकारी स्कूल में ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ता था। रोज शाम को उसके पिता अपनी बैंड पार्टी के साथ नए-नए गानों को बजाने का अभ्यास करते थे। अपने अभ्यास में वो अक्सर रंगलाल को भी शामिल करते थे। उनका मानना था कि बड़ा होकर उसे ही तो उनकी बैंड पार्टी को सँभालना है। रंगलाल को भी बाजा बजाने में बड़ा मजा आता था। गाने के सुर पीतल के बाजे से निकल कर उस पर सम्मोहन-सा करने लगते थे-
पों पों पों पों पों पों ऽऽऽ
आज मेरे यार की शादी है
लगता है जैसे सारे संसार की शादी है
पों पों पों पों पों पों ऽऽऽ
बजाते-बजाते रंगलाल की आँखें मुँद जाती और उसके पैर थिरकने लगते। प्रभुलाल इस बात पर अक्सर उसे डाँठते थे-
"बैंडमास्टर का काम गीत बजाने का है। इतना सुरीला बजाओ कि लोग झूमने लगें, नाचने लगें। ये नहीं कि खुद ही नाचने लगो।"
रंगलाल खिसियाकर हँसने लगता।
रंगलाल की कक्षा में ही कस्बे के माने हुए वकील धनपतराज जी की बेटी ललिता भी पढ़ती थी। रंगलाल उसे देखकर सोचता, "यह कितनी गोरी गट्ट है... ऐसा लगता है जैसे किसी ने धीरे-से प्लेट में एक रुपए वाली माखणिया आइसक्रीम सरका दी हो... हाथ से छुआ नहीं कि पिघली... बोलती कितना धीरे है...पास वाले को भी न सुनाई दे...।" कक्षा में रंगलाल का सारा ध्यान ललिता पर ही लगा रहता। स्कूल में कुछ ही बच्चे साइकिल लाते थे। ये सम्पन्न घरों के या नौकरीपेशा परिवार वालों के बच्चे होते थे। ललिता भी साइकिल से ही स्कूल आती थी। एक रोज़ छुट्टी होने पर ललिता ने जैसे ही साइकिल उठाई तो देखा पिछला पहिया एकदम नीचे बैठा हुआ था। साइकिल की यह हालत देख ललिता परेशान हो गई। कुछ लड़के-लड़कियों ने देखा भी, दो पल रुके भी, पर फिर धीरे-धीरे सब सरक लिए। ललिता के पड़ौस में रहने वाले ठेकेदार साहब का लड़का भँवर साइकिल से गुज़रा तो रुक गया। भँवर रंगलाल का पक्का दोस्त था। वह रोज़ उसे साइकिल पर बैठा कर अपने साथ लाता-ले जाता था। भँवर ने पूछा, “क्या हुआ ललिता, खड़ी कैसे है?” “... साइकिल,” बस इतना ही बोल पाई वह और उसका गला भर आया। रंगलाल ने आगे बढ़कर कहा, “ला अपनी साइकिल मुझे दे, मैं पंक्चर ठीक करवाके ले आऊँगा। तू भँवर के साथ चली जा।” ललिता भँवर की साइकिल पर बैठ कर चली गई। जाते-जाते उसने पीछे मुड़कर रंगलाल को और फिर अपनी साइकिल को देखा। पैदल-पैदल पंक्चर साइकिल को घसीटते हुए रंगलाल स्कूल से बाज़ार आया। रफीक चाचा की दुकान से पंक्चर बनवा कर वह ललिता के घर पहुँचा। पूरे दो घंटे धूप में चलते हुए उसका गला सूख गया था। ललिता का घर इतना बड़ा था कि उसे अंदाज ही नहीं आया कि वह कहाँ से उसे पुकारे। तभी एक नौकर ने उसे इधर-उधर झाँकते हुए देखा तो पूछा, “किस से काम है, यहाँ क्या कर रहा है?” नौकर ने थोड़ा डाँठते हुए पूछा था इसलिए कुछ पल को तो वह झिझका फिर बोला, “ललिता की साइकिल पंक्चर हो गई थी, ठीक करवाके लाया हूँ।” तभी अंदर का पर्दा हिला और ललिता बाहर आई। “हाँ-हाँ मेरी ही साइकिल है, अंदर रख दो इसे,” ललिता ने नौकर से कहा। नौकर साइकिल रखने लगा। रंगलाल ने मुस्करा के ललिता से कहा, “तू तो ऐसे ही परेशान हो गई थी, देखा! ठीक करवादी ना मैंने!” ललिता कुछ न बोली, सिर्फ थोड़ा-सा हँसी। सफ़ेद झक्क मोती बिखर गए। रंगलाल सोचने लगा कि हँसने से इसके गाल लाल हो गए या पहले से लाल ही थे। कब घर पहुँचा, पता नहीं। शाम को प्रभुलाल ने अपनी बैंड-पार्टी के साथ एक नए गाने का अभ्यास किया-
ओ फिरकी वाली, तू कल फिर आना
नहीं फिर जाना, तू अपनी ज़ुबान से
ओ तेरे नैना हैं ज़रा बेईमान से...

रंगलाल भी सुर पकड़ने लगा।

पों पों पों पों पों पों ऽऽऽ
ओ तेरे नैना हैं ज़रा बेईमान से...

इस बार रंगलाल को दूसरे बाजों की घनघनाहट की जगह सफ़ेद झक्क मोतियों के बिखरने की झंकार सुनाई दी और फिर उसके पैर थिरकने लगे-
ओ तेरे नैना हैं ज़रा बेईमान से...
“क्या कर रहा है?... सही सुर लगा ना... कितनी बार कहा है नाचने की जगह बजाने पर ध्यान दे,” प्रभुलाल ने बेसुरे होते रंगलाल को डाँठा। रंगलाल का मन उचट गया। बाजा रखकर वह माँ के पास चला गया। माँ तवे से रोटियाँ उतार रही थी। फूली-फूली रोटियाँ... फूले-फूले गालों जैसी...पर रोटियाँ उन गालों-सी लाल नहीं हैं... रंगलाल जाने क्या-क्या सोच रहा था। इस सुर को वह पकड़ नहीं पा रहा था। खाना खाकर भँवर के यहाँ चल दिया।
कल से गणित पढ़ाने मास्टर जी घर पर आएंगे। ललिता भी पढ़ने आएगी,” भँवर ने बताया। रंगलाल भँवर से गिड़गिड़ाते हुए बोला, “यार मुझे भी बैठा ले ना साथ में।” “नहीं-नहीं, मास्टर जी नाराज़ हो जाएंगे, पापा से कह देंगे,” भँवर बोला। रंगलाल क्या कहता। गुमसुम हो गया। अचानक भँवर ने रंगलाल के दोनों कंधों पर हाथ रखकर कहा, “मुझे सब पता है, तू ललिता से दोस्ती करना चाहता है ना, इसीलिए आना चाहता है नाबोल... सच है ना?” रंगलाल को झटके से हुए इस आक्रमण का अंदाजा न था। उसके टूटे-फूटे जवाब और चेहरे से उड़ते हुए भाव सब कुछ साफ-साफ कह गए। भँवर ने रास्ता निकाला, “मास्टर जी सीधे स्कूल से मेरे घर पर आएंगे। एक घंटा पढ़ाएंगे। उनके निकलते ही तू आ जाना। मैं ललिता को सवाल करने के लिए रोके रखूंगा। रंगलाल को विश्वास नहीं हो रहा था कि बात इतनी आसानी से बन जाएगी। आज उसे अपने दोस्त पर गर्व हुआ। दूसरे दिन स्कूल में उसे लगा कि सारे पीरियड इतने लंबे कैसे हो रहे हैं! छुट्टी क्यों नहीं हो रही है! छुट्टी होते ही रंगलाल भँवर के साथ घर को निकला। घर जाकर बस्ता पटका और खूब छपाछप पानी से मुँह धोया। बार-बार काँच में देखा, बाल ठीक किए। चप्पल डाले और ये जा वो जा। सीधे भँवर कि गली के नुक्कड़ पर गणेश मंदिर की सीढ़ियों पर जा बैठा। भँवर के घर के बाहर मास्टर जी की साइकिल दिख रही थी। साइकिल पर लगी नीले रंग की टोकरी दूर से ही पहचान में आ रही थी। समय बिताने के लिए कई गाने गुनगुनाए... या शायद एक ही गीत कई बार गुनगुनाया... ओ तेरे नैना हैं ज़रा बेईमान से। तभी मास्टर जी को साइकिल उठाते देखा। लपक कर पहुँच गया। मास्टर जी को नमस्ते कर सीधा ऊपर वाले कमरे में। उसको देखते ही भँवर थोड़ा-सा मुस्कराया फिर बोला, “अरे रंगलाल, आजा-आजा।” ललिता ने हल्के से सर उठाया और बोली, “मैं जाऊँ?” “नहीं-नहीं तू बैठ, मैं पानी लेकर आता हूँ,” कहते हुए भँवर कमरे से निकल कर नीचे चला गया। कमरे में ललिता और रंगलाल अकेले। ललिता का मुँह नीचे किताब में गड़ा हुआ, जाने क्या ढूँढ रही थी उसमें। रंगलाल एकटक उसे देख रहा। रंगलाल को बदन में जैसे पानी उबलता हुआ-सा महसूस हो रहा था। कनपटियों पर मानो चींटियाँ रैंग रही हों। मन किया कि कस के भींच ले ललिता को। उसकी साँसे तेज़ होने लगी। सारे अंग बर्फ में जम कर जैसे अकड़ गए हों। तभी भँवर कमरे में आया। भँवर के हाथ से पानी का जग लेकर रंगलाल खूब सारा पानी एक साँस में पी गया। ललिता ने कॉपी किताब उठाए और चलने को हुई। “कल जल्दी आ जाना, सारे सवाल कर लेंगे,” भँवर ने कहा। ललिता ने गर्दन हिलाई और रवाना हो गई। जाते-जाते उसने रंगलाल को देखा और थोड़ा-सा मुस्कराई।  उसके जाते ही दोनों दोस्त किताबें एक तरफ फैंक कर बिस्तर पर लुढ़क गए। भँवर ने रंगलाल की आँखों में झाँकते हुए पूछा, “बता क्या किया?... क्या कहा उससे?... बोल ना।” भँवर को मस्ती सूझ रही थी। रंगलाल ने जब बताया कि उसने तो बात ही नहीं की तो भँवर झल्ला उठा, “चल साले, तेरे लिए इतनी मेहनत की और तूने सब बेकार कर दिया।” और फिर यही रोज़ का क्रम बन गया। रंगलाल और ललिता इसी तरह मिलने लगे। उनकी बातों में ज़्यादा तो रंगलाल ही बोलता था, पर ललिता भी अब बात करने लगी थी उससे। धीरे-धीरे उनकी दोस्ती बढ़ने लगी। 
शीतला-सप्तमी पर सात दिनों का मेला लगता था। मेले में खूब सारे झूले, दुकानें, बड़ी चहल-पहल रहती थी।
“ललिता! मेले चलें!... खूब मज़ा आएगा... झूले खाएँगे... घूमेंगे,” रंगलाल ने पूछा।
“मम्मी भेजेगी नहीं, और फिर वहाँ सारे लड़के देखेंगे... मैं नहीं आऊँगी।”
“दोस्त है ना मेरी, मेरी बात नहीं मानेगी!... तुझे मेरी कसम है।” थोड़ी देर चुप्पी छा गई। रंगलाल मुँह लटकाए बैठा था।
“ठीक है, मैं आ जाऊँगी,” रंगलाल का उतरा मुँह देखकर ललिता बोली, “पर मैं झूले नहीं खाऊँगी।”
“सच्ची, पक्का आएगी?...” रंगलाल चहक कर बोला। तय हो गया कि रविवार को सुबह ग्यारह बजे ललिता मेला मैदान के बाहर वाली प्याऊ के पास पहुँच जाएगी। वहाँ से उसके साथ एक चक्कर मेले का लगा कर वह घर लौट आएगी। रंगलाल ने अतिरेक खुशी में उसके दोनों हाथ पकड़ लिए। हाथ छुड़ाते हुए ललिता बोली, “अच्छा, अब मैं चलती हूँ, बहुत देर हो गई।” रविवार को आने में जैसे बरसों लग गए। बहुत लंबा इंतज़ार। उस रोज़ सुबह-सुबह नहा-धोकर रंगलाल मेले की ओर भागा। पैरों में जैसे पंख लग गए हों। मेला मैदान के बाहर वाली प्याऊ पर आकर साँस ली। कई बार, कई लोगों से टाइम पूछा। साढ़े दस... पौने ग्यारह... ग्यारह...। रंगलाल थोड़ा पीछे को चलता हुआ देखने लगा कि ललिता कहाँ तक पहुँची होगी। फिर प्याऊ तक लौटा। कभी बैठा, कभी उठा। फिर सोचा कहीं आकर निकल तो नहीं गई!... मेले में जाकर देखना चाहिए। हालाँकि मन मानने को तैयार नहीं था पर फिर भी वह मेले में आगे तक गया और देखकर आया। इस बीच उसकी स्कूल के कई लड़के भी निकले।
“रंगलाल! आजा मेले में चलते हैं।”
“नहीं-नहीं, तुम लोग चलो, मैं थोड़ी देर में आता हूँ।”
थोड़ी देर... और देर... बहुत देर! रंगलाल रूँआसा हो उठा। लगा कि गले में कुछ दब-सा रहा है। भारी कदमों से रंगलाल घर की ओर घिसटने लगा। दिन भर ऊपर वाली कोठरी में औंधा मुँह किए पड़ा रहा। शाम को मन लगाने के लिए वह अपने पिता की बैंड-पार्टी के साथ बाजा बजाने का अभ्यास करने गया। प्रभुलाल ने सबको नए गाने का अंतरा गाकर सुनाया-

पहले भी तूने इक रोज़ ये कहा था, आऊँगी तू ना आई
वादा किया था सैयां बन के बदरिया, छाऊंगी तू ना छाई
मेरे प्यासे नैना तरसे, तू निकली ना घर से
कैसे बीती वो रात सुहानी, तू सुनले कहानी, ज़मीं आसमान से
ओ तेरे नैना हैं ज़रा बेईमान से

बैंड-पार्टी के सब लोग लड़खड़ाते हुए सुर पकड़ने लगे। रंगलाल भी बाजे में साँसे उँड़ेल रहा था।          

पों पों पों पों पों पों ऽऽऽ
पहले भी तूने इक रोज़ ये कहा था
पों पों पों पों पों पों ऽऽऽ
आऊँगी तू ना आई

रंगलाल की हिचकियाँ बंधने लगीं। आँखों से पानी छलकने लगा। लगा कि वह मेला मैदान के बाहर वाली प्याऊ के ऊपर बीचों-बीच खड़ा ज़ोर-ज़ोर से बाजा बजा रहा है।

मेरे प्यासे नैना तरसे, तू निकली ना घर से
पों पों पों पों पों पों ऽऽऽ

वह अपनी सारी ताकत लगाकर अपने फेफड़ों को फुलाता और बाजे को हवा से भर देता। उसकी साँस चुकती जा रही थी और बाजा बेसुरा होता जा रहा था। “कैसे बजा रहा है!... आराम से सुर को समझते हुए बजा,” प्रभुलाल अपने बेटे पर चिल्लाया। एक झटके से रंगलाल जैसे प्याऊ से नीचे गिर पड़ा। ललिता ऐसा ही करती थी। भँवर के घर पर खूब बातें कर लेती थी पर पर कहीं और मिलने के लिए नहीं आती। पूछो तो सौ बातें! “मम्मी ने आने नहीं दिया... घर पर मामाजी आ गए थे... स्कूल का काम बाकी था... क्या बोल कर घर से निकलूँ... ।” रंगलाल हर बार सोचता कि अब के तो गुस्से से फटकार ही देगा उसको, पर जैसे ही वह सामने आती उसका गुस्सा गायब हो जाता और वह उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में खो जाता। इधर एक बात और होने लगी थी कि रंगलाल जब-तब ललिता को छूने की कोशिश करने लगा था। कभी हाथ पर हाथ रख देना, कभी उसकी ठोड़ी पर हाथ रख कहना कि इधर तो देख, कभी चिपक कर पास बैठना... ऐसा ही बहुत कुछ। ललिता को छूते ही रंगलाल को ऐसा लगता जैसे रुई का बड़ा-सा फाया छू गया हो... रोम-रोम में बिजली दौड़ गई हो। एक ऐसा नशा जो सिर्फ खींचता था, समझ में नहीं आता था। ललिता को यह सब कुछ एकदम नया-सा और कुछ अजीब-सा भी लगता था। कभी-कभी वह झटके से खुद को रंगलाल से दूर कर लेती, पर कभी-कभी उसे यह अच्छा भी लगता था। रात को सोते समय जब वो छूना उसे याद आता तो उसकी छाती में धकधक होने लगती थी और वह तकिये को कस कर भींच आँखें बंद कर पड़ जाती। पल-पल, दिन-दिन दोनों एक अंजान सफर की ओर बढ़ रहे थे। सब कुछ होते हुए भी जैसे ललिता इस रिश्ते का भविष्य जानती थी। इसीलिए बीच-बीच में वह रंगलाल से दूरी बना लेती थी। पर रंगलाल की दीवानगी तो समंदर की तरह ठाठें मारती थी। जब ललिता कई-कई दिनों तक भँवर के यहाँ नहीं आती तो रंगलाल भँवर से मिन्नतें करके उसे ललिता के घर भेजता और उसे बुला कर लाने के लिए कहता, और फिर...! और फिर वही सब शुरू हो जाता।
इधर एक रोज़ प्रभुलाल ने घर में घुसते ही रंगलाल को बुलाया। “आज से तू भी चलेगा हमारे साथ शादी में बैंड बजाने के लिए,” कहते हुए उन्होने दो थैलियाँ रंगलाल को पकड़ाईं जिनमें उसके नाप की बैंड-मास्टर वाली ड्रैस थी। लाल वैलवेट का कोट और पैंट, जिनके किनारे पर सफ़ेद चमकीली गोट लगी हुई थी। वैसे ही रंग की तनी हुई कैप, पीतल का चमचमाता बैल्ट और काले जूते-सफ़ेद जुराब। गोटावत सेठ के बेटे की शादी थी। प्रभुलाल ने अपने बेटे को बैंड-पार्टी में अपने पास ही खड़ा कर रखा था। बारात कस्बे के बाज़ार से होते हुए बारातघर तक पहुँची। विशाल पंडाल सजा हुआ था। बारातघर के बाहर प्रभुलाल ने एक के बाद एक कई गाने बजाए। बाराती नाचने में मग्न थे। आखिर में बजा वो गाना- “ओ फिरकी वाली तू कल फिर आना...।” बजाते-बजाते रंगलाल उन्हीं बेईमान नैनों में डूब गया।

ओ तेरे नैना हैं ज़रा बेईमान से
पों पों पों पों पों पों ऽऽऽ

और फिर वही हुआ। उसके पैर थिरकने लगे। प्रभुलाल को गुस्सा आया। पर वहाँ तो इसे सब लोग एक अजूबे की तरह देखने लगे। और देखते ही देखते नोटों की बरसात शुरू हो गई। घराती-बाराती सब झूम उठे। कुछ बारातियों ने जोश में आकर रंगलाल को बीचों-बीच खड़ा कर दिया। अब बीच में रंगलाल अपनी मस्ती में थिरक रहा था और उसके चारों ओर बाराती। गाना खत्म हुआ।

ढम ढमा ढम ढम ऽऽऽ

बैंड-पार्टी के ड्रम ने सम पर आकर गाने को विराम दिया। गोटावत सेठ ने रंगलाल को इशारे से अपने पास बुलाया, “ओ बाजा बाबू! ज़रा यहाँ आना।” सेठजी ने बीस रूपए का नोट रंगलाल को दिया और खूब शाबासी दी। सेठजी का ऐसा करना था कि चारों ओर से आवाज़ें लगना शुरू हो गईं, “अरे सुनो बाजा बाबू, ये लो अपना ईनाम।” नोटों की बरसात से प्रभुलाल की नाराजगी हवा हो गई। कई लोगों ने प्रभुलाल से भी कहा, “वाह बैंड-मास्टर जी, आपका बाजा बाबू तो कमाल का है।” प्रभुलाल अपने बेटे की पहली व्यावसायिक सफलता पर फूला नहीं समा रहा था। यहीं से रंगलाल को एक नया नाम मिला- बाजा बाबू। बैंड बुक करवाने वाले लोगों में से कई लोग तो कह भी देते थे, “बाजा बाबू को ज़रूर लाना।” रंगलाल को बहुत खुशी होती जब उसे लोग बाजा बाबू कहकर पुकारते। हर बारात में वह एक-दो गाने जमकर बजाता और जब उसे मस्ती चढ़ती तो उसके पैरों का थिरकना शुरू हो जाता और लोगबाग रूपए लुटाने लगते। रंगलाल शादियों में सजे हुए दूल्हा-दुल्हन को बड़े चाव से देखता था। सजी हुई दुल्हन उसे हमेशा बहुत सुंदर लगती। वह सोचता, “ललिता भी किसी दिन दुल्हन बनेगी... ऐसे ही सजेगी... कितनी खूबसूरत लगेगी... वह खूब मस्त बाजा बजाएगा... पर क्यों?... क्या वह ललिता का दूल्हा नहीं बनेगा...?” ऐसी ही ऊटपटाँग बातें उसके मन में चलती रहती थीं। बाजा बाबू की विशेष माँग और उससे बढ़ने वाली आमदनी को ध्यान में रखते हुए प्रभुलाल अपने बेटे को हर शादी-प्रोग्राम में ले जाने लगा।
स्कूल में परीक्षाएँ शुरू हो गई थीं। अब रंगलाल का ललिता से मिलना भी कम हो पाता था। एक बार बाज़ार से निकलते हुए उसने उसे नाहटा क्लोथ स्टोर में देखा था। साथ में बैठी औरत उसकी माँ होगी, उसने अंदाज़ा लगाया था। ललिता की नज़र जैसे ही उस पर पड़ी एक पल के लिए वह मुस्कराई, फिर उसने खुद को संयत कर लिया और नज़र फेर ली। परीक्षा खत्म हुई, छुट्टियाँ लग गईं। एक दिन अचानक भँवर ने बताया कि ललिता तो पूना चली गई है, अपने मामा के यहाँ। रंगलाल क्या कहता। उदास हुआ। सोचा, “मिल के भी नहीं गई... भँवर ने भी पहले नहीं बताया... अब जाने कब आएगी...!” सामने पड़ी ये... लंबी गर्मी की छुट्टियाँ! दिन को जब धूप सड़कों का डामर पिघलाने लगती और गरम लू की लपटें भाँय- भाँय करती किसी चुड़ैल-सी डोलती रहती थी, ऐसे में भी रंगलाल भँवर के घर इसी आस में पहुँच जाता कि शायद आज ललिता के आने की खबर मिलेगी। लेकिन हर बार निराशा भरी खबर बंद कमरे में पंखे के नीचे भी अंदर से उसे इतना जला डालती जितना बाहर चल रही लू की लपटें उसके शरीर को न जला पातीं। ऐसे में एक उसका बाजा ही था जो उसे ललिता के करीब होने का एहसास करवाता था।
यह सब तो रंगलाल जैसे-तैसे झेल जाता पर इधर हुई एक घटना ने उसे भीतर तक तोड़ दिया। एक दिन भरी दोपहर में उसके पिता बाहर से आए तो उनका चेहरा लाल तमतमा रहा था। खाना खाने बैठे और दो कौर ही लिए थे कि जोरदार उल्टी आई। रंगलाल और उसकी माँ तो बुरी तरह घबरा गए क्योंकि उल्टी पूरी खून से सनी हुई थी। चक्कर खाकर प्रभुलाल वहीं गिर पड़ा और बेहोश हो गया। अस्पताल में डॉक्टर ने बताया कि शराब ने उसके शरीर के अंदर घाव कर दिये हैं। कस्बे के छोटे-से अस्पताल में शायद प्रभुलाल को बचा पाने की क्षमता नहीं थी। तीसरे दिन सुबह-सुबह हुई खूनी उल्टी ने प्रभुलाल के जीवन-संगीत पर विराम लगा दिया। रंगलाल पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। जिस दिन भँवर उससे मिलने आया तो उसके गले लगकर वह खूब रोया। दुख जीवन-रूपी रंगमंच पर अचानक से सारे पर्दे बदल डाल देता है जिससे देखते ही देखते सारे किरदार और सारे दृश्य बदल जाते हैं। रिश्तेदार धीरे-धीरे कन्नी काटने लगे। बैंड-पार्टी के भी कुछ लोगों ने मिलकर अपनी नई पार्टी बनाने की गुपचुप शुरुआत करली। कल तक प्रभुलाल के साए में सब एक थे, वे ही आज उसके न रहने पर अपना भविष्य असुरक्षित महसूस करने लगे। कुछ तो कब के भीतर ही भीतर अपना नया ग्रुप बनाने को तैयार बैठे थे, बस किसी अच्छे मौके की तलाश में थे। अपने पिता के कुछ वफादार साथियों के सहारे रंगलाल ने बैंड-पार्टी को फिर से खड़ा किया। वे बहुत संघर्ष के दिन थे। खुद नए गाने सीखना, अपनी टीम के साथ उन्हें बजाने का अभ्यास करना और शादियों में जाकर बजाना; इन सबके अलावा चुपचाप आँसू बहाती माँ को हौसला देना भी उसी के जिम्मे था। बीच-बीच में मौका निकाल कर कभी-कभार वह भँवर के घर भी हो आता। ललिता की कोई खबर न थी। ऐसे ही अपशगुनी दिनों में एक दिन यह खबर भी आई कि ललिता आगे अब अपने मामा के यहाँ रहकर ही पढ़ेगी। वैसे भी कस्बे में हायर-सैकेन्डरी स्कूल के आगे पढ़ाई थी नहीं। भँवर के घर पर भी बातें चल रही थीं उसे शहर के हॉस्टल में रखकर आगे पढ़ाने की। जिस दिन भँवर भी चला गया उस दिन रंगलाल को लगा कि अब उसके लिए ललिता के घर का आखिरी दरवाजा भी बंद हो गया है। बाहर का अकेलापन उसके भीतर पसरने लगा। हर वक़्त चुप्पी उसके चेहरे पर अपना स्थायी निवास बना चुकी थी। बाजा बजाना जहाँ उसके लिए जीवन-यापन की मजबूरी थी वहीं दूसरी ओर अपने भीतर की प्यास बुझाने का जरिया भी थी।
मौसम गुजरते चले गए। पतझड़ों ने पत्ते झाड़कर पेड़ों को डरावना बना दिया पर बहारें कोई भी नई कौंपल उगाने में कामयाब नहीं हुई। दिन-महीने-साल और फिर एक के बाद एक कई सारे सालों के ढेर तले रंगलाल कुचल कर रह गया, जो बच रह गया था, वह था बाजा बाबू।नितांत औपचारिकता से अपनी बैंड-पार्टी को ढोना और सुबह से शाम और शाम से रात तक पहुँचना उसे थका डालता। इसी थकन और भीतर के अकेलेपन ने उसे शराब तक पहुँचाया। और जो भी हो शराब एक काम ज़रूर करती कि बरसों के घने अंधकार को चीरकर बाजा बाबू को रंगलाल बना देती और ललिता को उसके पास बैठा देती। वह कभी हँसता, कभी रोता और कभी आधी रात में बाजा बजाने लगता-

ओ तेरे नैना हैं ज़रा बेईमान से
पों पों पों पों पों पों ऽऽऽ

बजाते-बजाते उसकी आँखें मुँद जाती और उसके पैर थिरकने लग जाते। बाजे में साँसे उँड़ेलते उसके फेफड़े थक जाते, बाजा बेसुरा होने लगता और रंगलाल निढाल होकर पड़ जाता। मीठी नींद उसे घेर लेती।
इसी तरह पाँच बरस बीत गए। इन पाँच सालों में कस्बा भी शहरी होने लगा था। कई नई-नई बैंड-पार्टियाँ बन गईं। शादियाँ भी ठेके पर होने लगी। ठेकेदार ही हर चीज की व्यवस्था करता। टैंट, खाना, रोशनी, सजावट से लेकर दूल्हे के लिए घोड़ी और बैंड-पार्टी भी ठेकेदार ही लाता। अब सीधे कोई बैंड-पार्टी बुक नहीं करता। लोगों के कामकाज की भागदौड़ तो ज़रूर कम हुई मगर इसका सीधा असर बैंड-पार्टियों की कमाई पर हुआ। इन ठेकेदारों के आगे-पीछे डोलो तब कहीं जाकर कोई बुकिंग मिलती थी। ठेकेदार औने-पौने पैसे देकर चलता करता। कई बार तो बारात में बजाते समय लोगों से बख्शीश में मिले रुपए ठेकेदार से मिलने वाले रुपयों से ज़्यादा होते थे।
एक दिन मनोहरलाल का आदमी बुलाने आया। मनोहरलाल कस्बे में शादियों का सबसे बड़ा ठेकेदार था।
“अरे आ भई बाजा बाबू, परसों की एक बुकिंग है, आ जाणा,” मनोहरलाल बोला।
फीकी-सी हँसी हँसते हुए रंगलाल ने कहा, “इस बार तो पैसे बढ़ाओ साहब, इतने में पूरा नहीं पड़ता।”
“तेरे से रोज़ का मामला है इसलिए बुलाता हूँ, वरना अपनी शकल तो देख..., ऐसे ही भूत-पलीत की तरह उठ के आ जाता है,” मनोहरलाल गरजता हुआ बोला। “जोगियों जैसी तो दाढ़ी बढ़ा रखी है, बैंड-पार्टी की ड्रेस देखो तो वही बरसों पुराणी; आजकल शादी-ब्याह में इन सब चीजों का भी ध्यान रखणा पड़ता है,” मनोहरलाल ने कहा।
रंगलाल ने खुशामदी स्वर में कहा, “इस बार में सब ठीक कर लूँगा, बस आप पैसे बढ़ा देना।
“ठीक है, ठीक है, मैं देख लूँगा,” मनोहरलाल ने लापरवाही से जवाब दिया।
चलते-चलते रंगलाल ने पूछा, “किसके यहाँ की बुकिंग है?”
“अरे बहुत बड़ी पार्टी है। मुझे तो बोल रहे थे कि बैंड-पार्टी भी शहर से बुलवालो पर मैंने ही मना किया, वैसे आर्केस्टा पार्टी बुलाई है शहर से,” मनोहरलाल ने बताया। “तूने नाम सुण रखा होगा ना वकील धनपतराज जी का, उन्हीं की बेटी की शादी है; गजब खर्चा कर रहे हैं,” मनोहरलाल उत्साह से बोलता ही जा रहा था। रंगलाल पर तो जैसे बिजली गिर पड़ी हो। कौन क्या बोल रहा है, वह कहाँ से कहाँ को चल रहा है, उसे कुछ होश नहीं रहा। उसी बेहोशी जैसी हालत में जाने क्या बड़बड़ाता वह घर पहुँचा। बिस्तर पर औंधा पड़ गया। माथे को कभी तकिये के बाएँ कोने में दबाया तो कभी दाएँ कोने में, पर दर्द हल्का ना हुआ। “ललिता की शादी हो रही है और उसे पता ही नहीं चला... भँवर ने भी नहीं बताया... पर भँवर कौनसा यहाँ बैठा है जो उसे बताता... ललिता से मिलने का मन हो रहा है... कैसे मिलूँ... उसके घर जाऊँ... वहाँ कौन मिलने देगा...,” विचारों का जंजाल उसके चारों ओर फैल गया और वह एकदम अकेला, असहाय, छटपटा के रह गया। रात का इंतज़ार किए बगैर पीने बैठ गया। शराब अपने असर से बाहर हो चुकी थी। छत पर चढ़ गया। एकटक चाँद को देखने लगा। ये क्या! चाँद सफ़ेद झक्क मोती बिखेरने लगा! दूर... बहुत दूर... चाँद पर बैठी दिखाई दी ललिता। उसने हाथ बढ़ाया पर छू नहीं पाया। ललिता मुस्करा रही है... रंगलाल देख रहा है... देख रहा है... ललिता दुल्हन बनी हुई है... कितनी खूबसूरत लग रही है... वह उसके पास जाना चाहता है... उसे छूना चाहता है... पर बहुत भीड़ है उसके चारों ओर... कैसे जाए...! वह ललिता को पुकारता है... ललिताऽऽऽ!... बहुत शोर है चारों तरफ... ललिता उसकी आवाज़ भी नहीं सुन पा रही... वह इंतज़ार करेगा कि भीड़ हट जाए और वह ललिता से बात कर पाए... और फिर धीरे-धीरे रात की मदहोशी ने उसे अपने में समेट सुला लिया।
आखिर वो रात भी आई। बारातघर से दूल्हे राजा की बारात सजी। चमचमाती गाडियाँ, इधर-उधर चहक रहे सजे-धजे बाराती, जवान, बूढ़े, बच्चे, लड़कियाँ, औरतें। शहर से बड़े-बड़े लाउड स्पीकर वाली मशीन भी आई थी। एक खुली लॉरी में उसे बजाया जा रहा था। कान फोड़ने वाली जोरदार आवाज़ चारों ओर गूँज रही थी। उसके थोड़ा आगे पंजाबी ढ़ोल बज रहा था। ढ़ोल की ताल पर बाराती नाच रहे थे। बीच में सफ़ेद घोड़ी पर दूल्हे राजा सवार थे। उसके आगे बाजा बाबू की बैंड-पार्टी थी। दोनों ओर रंगीन रोशनी वाली गैस बत्तियाँ जल रही थीं। साक्षात इंद्रलोक की रौनक धरती पर उतर आई थी। बाजों की आवाज़ घनघना रही थी।

पों पों पों पों पों पों ऽऽऽ
आज मेरे यार की शादी है
लगता है जैसे सारे संसार की शादी है
पों पों पों पों पों पों ऽऽऽ
बाज़ार से होती हुई बारात वकील साहब की कोठी पर पहुँची। कोठी खुद दुल्हन की तरह सजी हुई थी। सामने ही बहुत बड़ा शामियाना लगा था। लाउड स्पीकर, पंजाबी ढोल और बैंड-पार्टी सभी जम के शोर मचा रहे थे। नोटों की बरसात हो रही थी। बाजा बाबू ने नया गाना छेड़ा-
पों पों पों पों पों पों ऽऽऽ
ओ फिरकी वाली, तू कल फिर आना
नहीं फिर जाना, तू अपनी ज़ुबान से
ओ तेरे नैना हैं ज़रा बेईमान से...

बारातियों में से कुछ नवयुवकों को यह गीत थोड़ा पुराने फैशन का लगा। या यूँ कहलो कि इसकी धुन पर उनसे नाचा नहीं जा रहा था।
“ए सुनो! कोई दूसरा गाना बजाओ,” एक ने कहा।
“कोई नया गाना बजाओ ना, वो डिस्को डांसर वाला आता है तुम्हें?” दूसरा बोला।
“अरे छोड़ो इसे, ये गाँव का बैंड है, कुछ नहीं आता इन्हें,” तीसरा बोला।
सब लड़के लॉरी के पास चले गए और लाउड स्पीकर से अपनी पसंद का गीत बजवाने लगे। इधर बाजा बाबू तो अपनी ही धुन में बाजा बजा रहा था।

पों पों पों पों पों पों ऽऽऽ
पहले भी तूने इक रोज़ ये कहा था
पों पों पों पों पों पों ऽऽऽ
आऊँगी तू ना आई

बाजा बाबू की आँखें मुँद गई और उसके पैर थिरकने लगे। बीच बारात में वह अकेला नाच रहा था। उसकी साँसें बाजे में समाती और एक चीत्कार बाजे से फूट पड़ता।

मेरे प्यासे नैना तरसे, तू निकली ना घर से
पों पों पों पों पों पों ऽऽऽ

इधर वकील साहब अपने समधियों और बारातियों को गले लगाकर, माला पहनाकर स्वागत कर रहे थे। कोठी के बड़े दरवाजे पर आकर औरतें मंगल-गीत गाने लगी थीं। पंजाबी ढोल और लाउड स्पीकर वाले सब शामियाने के एक कोने में बैठकर सुस्ताने लगे थे। बैंड-पार्टी के सब लोग भी बाजा बाबू की ओर देख रहे थे और सोच रहे थे कि अब बंद हो तो थोड़ा आराम मिले। पर बाजा बाबू तो बेसुध बजा रहा था। पेट से गले तक पहुँचती साँस पसलियों को चीरने लगी थी। बैंड-पार्टी के ड्रम ने कई बार सम पर विराम लगाकर गाने को बंद करने का संकेत दिया।

ढम ढमा ढम ढम ऽऽऽ

पर आज बाजा बाबू संगीत के अनुशासन को तोड़ कर रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था।

ओ तेरे नैना हैं ज़रा बेईमान से
पों पों पों पों पों पों ऽऽऽ

बाजा बाबू ने छाती में उठे दर्द को एक हाथ से दबाया और एक तरफ चल दिया। कुछ मकान छोड़ कर लंबी-सी चबूतरी पर जाकर पसर गया। वकील साहब ने आवाज़ लगाई, “लो भाई बाजा बाबू,” और कोट की जेब से सौ रुपये का नोट निकाला। बैंड-पार्टी के सबसे पुराने सदस्य राधेश्याम ने रंगलाल की ओर देखा और कहा, “जाओ बाजा बाबू, साहब ईनाम के लिए बुला रहे हैं।” जब उसने कोई जवाब नहीं दिया तो राधेश्याम खुद जाकर ईनाम ले आया और सीधे रंगलाल के पास पहुँचा। राधेश्याम ने सौ का नोट बाजा बाबू की तरफ करते हुए कहा, “इतना बड़ा ईनाम तो आज तक नहीं मिला।”

वहाँ उस ठंडी चबूतरी पर एक ओर साँसों की गर्मी से अभी भी दहकता हुआ बाजा पड़ा था और पास ही पड़ा था अपनी सारी साँसें बाजे में उँड़ेलने के बाद, बाजा बाबू का बेजान शरीर।

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रविवार, 27 मई 2018

प्रेम, अवनि और वातायन

पुस्तक-चर्चा
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कविता-संग्रह- प्रेम, अवनि और वातायन (मूल्य : 150 रु.)
रचनाकार- सुनीता गोदारा
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अगर कविता खुद की तलाश है तो...
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सुनीता के इस काव्य-संग्रह में कविताओं का दूसरा खण्ड है- अवनि अम्बर बीच। आईए आज इसी खण्ड की कविताओं पर चर्चा करते हैं। इस खण्ड में छोटी-बड़ी 26 कविताएँ हैं। सुनीता राजस्थान के सीमावर्ती जिले बाड़मेर के सुदूर ग्रामीण अंचल से आती हैं। यहीं वो सब कुछ था जो इनके मानस में समाया और संवेदना की तपन से शनै-शनै कविता में ढलता गया। और वो सब कुछ था वहाँ का प्राकृतिक व साँस्कृतिक परिवेश, जिसमें बालुई रेत के मखमली धोरे, गाँव की भोर, दोपहर, धूल भरी आँधियाँ, रहस्यमयी सुनसान शाम, ठंडी और साफ चमकदार रातें, त्योहारों की रौनक, परंपराओं की सौगात, बारिश के बाद की माटी की सौंधी खुशबु, बावड़ियाँ, खेजड़ी के दरख्त, कँटीली झाड़ियाँ, बकरियों के रेवड़ और समूची मरुधरा की अनबुझ प्यास थी।
अगर कविता इस संसार में खुद की तलाश है तो सुनीता बार-बार, या यूँ कह लें कि हर बार, खुद की तलाश में अपने मानस में बसे इसी प्राकृतिक सौन्दर्य तक चली आती हैं और 'अवनि अम्बर बीच' बसे जगत के इस भू-भाग को अपनी कविता से अभिव्यक्त करती हैं-
कौन कहता है कि
गाँव गाँव नहीं रहे
अभी भी गाँव की मिट्टी
सुगंध से भरपूर है।
रातों में जुगनुओं की चमचमाहट
फागुन में फाग के गीतों की गूँज
त्योहारों में रैवणो का आनंद।
इसी प्राकृतिक सौन्दर्य से उभरता है एक अद्भुत आनंद जो इस तरह कविता में रूपायित होता है-
दुनिया का सबसे मधुर संगीत
बज रहा वृक्ष से
शाखाओं का
सूखी पत्तियों का
डाल पर बैठे पंछियों का।
यह अनुभूति आज के इस भागदौड़ वाले जीवन में मनुष्य का ध्यान उस मधुर संगीत की ओर आकृष्ट करती है जो दया, करुणा और प्रेम का अजस्र स्रोत है। ऐसी कविता इस बात की साक्षी बनती है कि सुनीता मरु अंचल की उस प्राकृतिक-साँस्कृतिक सम्पदा में कितनी गहराई तक घुली-मिली हैं और उसकी प्रतीति को कविता में उतारने में किस हद तक सफल हुई हैं। एक बानगी और देखिए-
धूप ने चुपके से आ
कहा कानों में
आ मेरे साथ बैठ
जिन्दगी निखर जाएगी।
गाँव से शहर में आना जिन्दगी को एक झटके से बदल देता है। लंबी-चौड़ी सड़कें, भीड़ की चिल्ल-पौं, पसरे हुए बाजार, दिखावटी मुस्कराहटें, रिश्तों का बदलता अंदाज उनके मन को विचलित कर देता है और तब वे स्वयं को असहाय पाती हैं और सड़क किनारे खड़े पेड़ से खुद को अभिव्यक्त करती हैं-
सड़क किनारे खड़ा पेड़
रात के सन्नाटे में
बड़े ट्रकों की कर्कश आवाज से
मायूस हो उठता
सोचता कि मेरे भी पहिये लगे होते
तो सड़क से कहीं दूर जाकर
मैं भी चैन की साँस लेता।
इस खण्ड की कविताओं को पढ़कर ऐसा लगता है कि यही सुनीता का मूल स्वर है। इन तपते रेत के धोरों ने इन्हें तोहफे में दी है अपनी अनबुझ प्यास और दूर चमकती मृग-तृष्णा।
यहीं से चली है, यहीं लौट आती है सुनीता की कविता-
छाया है आलम उदासी का
दरख्तों के सीने में।
कुछ पहर
दूर शहर
खामोशी से
खुद को
पहचान लिया जाए।
केटी
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इस खण्ड की कविताओं पर आपके विचारों की प्रतीक्षा है।
शीघ्र ही इस पुस्तक के तीसरे कविता-खण्ड 'तीसरा वातायन' पर चर्चा करेंगे।
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शुक्रवार, 25 मई 2018

प्रेम, अवनि और वातायन

(पुस्तक-चर्चा : भाग-1)
तपते धोरों में एक टुकड़ा छाँव की तलाश- प्रेम, अवनि और वातायन
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सुनीता गोदारा के प्रथम प्रकाशित काव्य-संग्रह को पढ़ते हुए उनकी कविताओं का आनंद लेने के साथ-साथ मन में एक जिज्ञासा उठी कि रेगिस्तानी धोरों में बकरियाँ चराती, ठेठ ग्रामीण अंचल में पली-बढ़ी इस रचनाकार की रचना-प्रक्रिया क्या रही होगी, कौनसे तत्व होंगे जो इसके भावों को शब्दों में बदलकर कविता का इन्द्रधनुष रचते होंगे!
सुनीता इस पुस्तक में अपनी कविताओं को तीन खंडों में विभाजित करती हैं। पहला खंड है- प्रेम में आकंठ।
आईए आज इसी खंड की कविताओं पर बात करते हैं।
इस खंड में 27 कविताएँ हैं। नवंबर 2012 से इनके कविता लिखने का आरंभ कदाचित इन्हीं कविताओं से हुआ होगा। इस खंड की सभी कविताएँ प्रेम की सघनता का अहसास है। वह प्रेम जो प्रतीक्षा के क्षणों में कभी यह कहलवाता है कि-
पर वह बावरी अपने चाँद के
इंतजार में खड़ी है
अपने घर की बालकनी में।
कभी वही प्रेम यादों के रूप में चारों ओर बिखर जाता है जिसे समेटते हुए कविता उभरती है कि-
सिर्फ तुम्हारी यादों को ही
अपने इर्द-गिर्द बिखेर रखा है
कविताओं में ढाल रही हूँ तुम्हें।
कभी इसी प्रेम के सतरंगी सपनों की थाह पाने मन उमड़ पड़ता है और तब सुनीता की कविता कहने लगती है कि-
लहरों की तरह
कभी शान्त
कभी तूफान से
अपने ख्वाबों में
प्रिय प्रेम का रंग भर दूँ।
प्रतीक्षा, मिलन, विरह, अपेक्षा और समर्पण जैसे विविध भावों में विस्तार पाता यह कविता खंड प्रेम की भीनी-भीनी सुगंध से सुवासित एक पुष्प-गुच्छ की भाँति है।
सुनीता की कुछ कविताओं में वैयक्तिकता का प्रभाव अधिक है जो कि कविता के प्रभाव को कमजोर करता है। यह मानते हुए कि कविता नितान्त व्यक्तिगत क्षण में व्यक्तिगत अनुभूति है, इस बात को भी समझना होगा कि अपने पाठक तक जाकर उसे 'व्यष्टि से समष्टि' में रूपांतरित होना ही चाहिए। रचनाकार का अनुभव पाठक के अनुभव से तादात्म्य बैठा ले तो वह रचना पाठक को अपनी-सी लगने लगती है और वही उसकी सार्थकता भी है।
एक नवोदित कवयित्री के रूप में सुनीता अपनी कविताओं से हमें आश्वस्त करती हैं कि वे विपुल संभावनाएँ रखती हैं। रेगिस्तान में बेरे (कूए) बहुत ऊंडे (गहरे) होते हैं और राजस्थानी में कहावत है- 'बेरा बरोबर मिनख ऊंडा'।
सुनीता अपनी कविताओं में वो गहराई रखती हैं और प्रेम में आकंठ डूब कविता लिखती हैं।
तलाशते रहते हैं
कुछ सवालों के जवाब
बरसों-बरस बेवजह
बजाए इसके
क्यों नहीं रच देते
बिन सवालों की
एक प्यार भरी दुनिया।
बहुत-बहुत शुभकामनाएँ।
अगले भाग में चर्चा करेंगे इसी पुस्तक के दूसरे खंड की जिसका नाम है- अवनि अम्बर बीच।
केटी
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सभी मित्रों से आग्रह है कि इस पुस्तक की कविताओं को पढ़कर एक सार्थक विमर्श करें। आप सबके विचारों और प्रतिक्रियाओं का स्वागत और प्रतीक्षा है।
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शुक्रवार, 27 अप्रैल 2018

गुलमोहर तले

गुलमोहर तले
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सुनो तो!

लौटोगी जब बाजार से

लाओगी क्या मेरे लिए

कुछ अनछुए छंद, कुछ बेमानी तुक

और एक गगरी भाव-रस?

बैठा रहूँगा  तब तक मैं

इसी गुलमोहर के पेड़ के नीचे

करता रहूँगा प्रतीक्षा

देखता रहूँगा दूर मैदान में

अपनी छाया को हर पल लम्बा होता।

रविवार, 28 जनवरी 2018

रफ नोट्स

28 जनवरी 2018
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भटकन
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मुझे उसके घर जाना अच्छा लगता है। शाम के समय और भी अच्छा। शाम भी वो जो रात से कुछ पल की दूरी पर हो। उसके घर से लौटते वक्त मुझे रोमांच-सा हो आता है। उसके घर से शुरू होती है अंतहीन गलियों की एक भूलभुलैया।
कभी अचानक लगता है कि अब उस मकान के पास गली खत्म हो जाएगी और सामने होगी जानी-पहचानी चौड़ी-सी सड़क, जहाँ से आगे सब रास्ते बँधी-बँधाई लीक पर चलते हैं; पर मेरा यह खयाल उस मकान के पास आते ही धुँआ हो जाता है जब वहाँ से एक दूसरी गली शुरू हो जाती है। तब मैं चहक कर बोल उठता हूँ, " ओहो! तो यह मकान उस गली का आखिरी मकान नहीं था बल्कि इस नई गली का पहला मकान था।"
हर गली का अपना एक मिजाज होता है जो वहाँ से गुजरने पर मेरे अंदर उतरता है। वहाँ के लोगों, घरों के बाहर खेलते बच्चों और मकानों को मैं उतनी ही अजनबियत से देखता हूँ जितना कि कोई बच्चा जन्मते ही अपनी टकोरे-सी गोल गोल आँखों को घुमाते हुए आसपास की दुनिया को देखता है। मैं कयास लगाता हूँ कि बस यह गली आखिरी है, फिर चौड़ी सड़क- जानी पहचानी। शाम रात में तब्दील हो चुकी होती है और इन गलियों की भटकन रोम रोम में नशा बनकर बहने लगती है। और फिर आ ही जाती है वो चौड़ी सड़क... पर मैं सड़क के किनारे खड़ा किसी पियक्कड़ शराबी की तरह सोच रहा होता हूँ, "बस एक पैग और हो जाता"... "एक गली और होती।"

8 दिसंबर 2017
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उस गाँव में कोई डाकिया नहीं जाता
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तब की बात कहते हैं सरकार, जब गाँव-कस्बों-शहरों की बस्तियों में डाकियों की चहल-पहल रहती थी।... और गाँव की तो पूछो मत सरकार...! हर आँगन में कुछ जोड़ी कान गली की आहट पर लगे रहते थे कि काश आज आ जाए डाकिया, लाए समाचार; समाचार- परदेसी पति के, दूर गए बेटे के, सम्बन्धियों के मरण-परण के।
तब एक दिन अचानक ऐसा सूरज उगा सरकार कि इस गाँव में डाकिये ने आना बंद कर दिया। एक दिन, दो दिन, हफ्ता, महीना... आवे ही नहीं! घर में कोई काम हो गया होगा, बीमार पड़ गया होगा मरगिल्ला-सा तो है ही, ट्रांसफोर हो गया होगा... ये सारे कयास गाँव के चौक, पनघट, गलियों और नई बहुओं के घूँघटों की फुसफुसाहट में उठे और आहिस्ता-आहिस्ता खतम हो गए सरकार। बस, वो दिन और आज का दिन... कोई भी डाकिया नहीं आया।

5 दिसम्बर 2017
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ख्वाबों की किताब का मुड़ा हुआ पन्ना
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"सुनो! तुम ख्वाब बहुत देखते हो।"

"अच्छा, क्यों देखते हो?"

"अच्छा, वो कौनसे ख्वाब हैं जो तुम्हें अक्सर याद आते हैं?"

"सुनो, बताओ ना।"

उसकी आँखें होले से मुसकुराई पर शायद इतना भर कह पाईं, "तुम सवाल बहुत करती हो।"

25 नवंबर 2017
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पंछी थे वे
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ढलती रात ने चाँद से कहा, "अब मैं चलूँ।"
चाँद उदास हो गया। तारों ने ठिठक कर नाचना बंद कर दिया।
चाँद पिघल कर धुँआ होने लगा और तारे रात के पीछे भागे...भागते गए...उड़ने लगे...पंछियों में तब्दील हो गए।

23 नवंबर 2017
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तुम...कहानियों पे कहानियाँ बुनते रहे, और मैं... उन पलों की बारिश में भीगता रहा। चले गए तुम, नहीं सुनी तुमने मेरी कहानी; बड़े छलिया हो।
दिल धड़कने का सबब याद आया
वो तेरी याद थी, अब याद आया

हाल-ए-दिल हम भी सुनाते लेकिन
जब वो रुख़सत हुए तब याद आया

सोमवार, 22 जनवरी 2018

हैप्पी न्यू इयर

आज दिलीप नगर सोसाइटी के बच्चे बड़े उत्साह में थे। शाम होते ही सब के सब खेल के मैदान में इकट्ठा हो गए। सनी ने कहा, “दोस्तो! इस बार हम सब मिलकर नए साल का फंक्शन मनाएंगे। उस में सोसाइटी के सब लोगों को बुलाएँगे।” रॉबिन, गुड्डा, भव्य, चेष्टा, दीप्ति, शानू सभी खुशी से चिल्ला उठे... “बहुत मज़ा आएगा, खूब डांस करेंगे, पटाखे छोड़ेंगे।”  
      “पर दोस्तो, इसके लिए पैसा भी तो चाहिए,” भव्य ने शंका प्रकट की। “हाँ पैसा तो चाहिए,” सभी ने भव्य का समर्थन किया। थोड़ी देर के लिए सभी बच्चे चिंतित हो गए। तभी चेष्टा ने कहा, “क्यों न हम अपनी पॉकेट मनी से थोड़ा थोड़ा पैसा इकट्ठा करें।” “अरे हाँ, ये तो हो सकता है,” सबने कहा। रॉबिन ने मुँह बनाया, लेकिन फिर वो भी मान गया। तय तो हो गया मगर कार्यक्रम कहाँ होगा, कैसे होगा, ये बात बच्चों के समझ में नहीं आई। शानू ने कहा, “मैं पापा से पूछकर आ जाता हूँ।” सबने उसे रोक लिया क्योंकि बच्चे नहीं चाहते थे कि ये बात बड़ों को पहले से पता चले। अचानक गुड्डा को याद आया, “अरे क्यों न हम पंकज भैया की मदद लें।” पंकज कॉलेज में पढ़ता था पर गली के बच्चों को बहुत प्यार करता था। कभी-कभार वो इनके खेल में भी शामिल हो जाता था। चेष्टा ने कहा, “ठीक है, मैं पंकज भैया को बुलाकर लाती हूँ।” थोड़ी देर में वो पंकज भैया के साथ आ गई।
      पंकज ने आते ही बच्चों से कहा, “अरे क्या बात है, आज बड़े चुपचाप से बैठे हो, मुझे क्यों बुलाया है।” बच्चों ने जब पूरी बात पंकज को बताई तो वो बहुत खुश हुआ। “देखो, सबसे पहले पैसे इकट्ठे करो फिर बजट बनाओ कि कितने गुब्बारे लाने हैं, कितने पटाखे और कितनी मिठाई,” पंकज ने समझाया। “जब पैसे इकट्ठे करलो तो मुझे बुला लेना, मैं समझा दूंगा कि आगे क्या करना है,” ऐसा कहकर पंकज चला गया। सारे बच्चे हिसाब-किताब में लग गए। आखिर में तय हुआ कि सब लोग पचास-पचास रुपये लेकर आएंगे। भव्य ने कहा, “यार मैंने तो अपनी सारी पॉकेट मनी पहले ही खर्च करदी, अब तो सिर्फ दस रुपये बचे हैं।” चेष्टा बोली, “कोई बात नहीं, मेरे गुल्लक में एक सो साठ रुपये हैं, अभी मुझसे लेलो, फिर जमा करके लौटा देना।” इस तरह बच्चों का जोड़-तोड़ चलता रहा। अंधेरा होने को आ गया था, ठंड भी बढ़ रही थी। दूसरे दिन शाम को पैसे लेकर आने कि बात पक्की करके सब बच्चे अपने घरों की ओर लौट गए। जाते जाते भी फंक्शन की ही बातें हो रही थी।
      दूसरे दिन शाम को सभी बच्चे पैसे लेकर आए थे। शानू ने पैसे इकट्ठे किए , पूरे चार सौ पचास रुपये हो गए। वो अपने साथ पैन और डायरी लाया था। उसने बच्चों के नाम और उनसे लिए गए रुपये डायरी में लिख लिए। अब बजट बनाना था। इसके लिए पंकज भैया को बुलाया गया। पर शायद पंकज घर पर नहीं था तो बच्चों ने सोचा कुछ देर खेल लिया जाए। जबसे इस कार्यक्रम की बात उठी थी, उनका खेलना ही बंद हो गया था। छुपम-छुपाई का खेल शुरू हो गया। जब दीप्ति की बारी आई खोजने की तो बाकी सारे बच्चों ने इशारों-इशारों में सोसाइटी के बाहर बनी कच्ची बस्ती की ओर छुपने का प्लान बना लिया। यहाँ बबूल की झाड़ियों और गंदगी से भरी हुई ज़मीन पर कुछ कच्ची-पक्की झौपड़ियाँ बनी हुई थी।
      ठीक-ठाक पता भी नहीं था कि ये कौन लोग हैं और कबसे यहाँ पर हैं। यहाँ जगह-जगह कचरे के ढेर लगे हुए थे, बदबूदार पानी मकानों के पास से बह रहा था। कुछ बच्चे वहीं भागदौड़ मचा रहे थे। उनके बदन पर फटे-पुराने कपड़े थे। रॉबिन ने पहचाना, “अरे ये तो वही बच्चे हैं जो हमारे यहाँ रोटी मांगने आते हैं।” गुड्डा बोला, “ मैंने इन्हें पॉलीथीन की थैलियाँ बीनते हुए भी देखा है।” चेष्टा ने नाक-भौं सिकोड़ते हुए कहा, “छी, कितने गंदे हैं ये, चलो यहाँ से।” सब बच्चे सोसाइटी के मैदान में आ गए। वहाँ दीप्ति और पंकज उनका इंतज़ार कर रहे थे। पंकज ने कहा, “अरे कहाँ चले गए थे तुम सब लोग।” जब गुड्डा ने कच्ची बस्ती की बात बताई तो पंकज ने सबको डाँठा और आगे से वहाँ ना जाने की हिदायत दी। “अच्छा वो तुम्हारे हैप्पी न्यू इयर के कार्यक्रम का क्या हुआ,” पंकज ने पूछा। शानू ने सारा हिसाब बताया। पंकज ने बजट बनाया और सारा सामान लाने की ज़िम्मेदारी ली। बच्चों से मैदान को साफ करने और होली के बचे हुए रंगों से रंगोली बनाने का कहकर पंकज चला गया।  
      पंकज के जाते ही बच्चों ने एक दूसरे की ओर देखा और मैदान साफ करने लग गए। शानू ने कहा, “सब लोग पहले मैदान से बड़े पत्थर और कांटे उठा कर एक तरफ ढेर लगा दो। हालाँकि बच्चे काम तो कर रहे थे लेकिन उनका मन उसी बस्ती में अटका हुआ था। रॉबिन ने कहा, “उन बच्चों के कपड़े कितने गंदे और फटे हुए थे।” भव्य बोला, “ये लोग नहाते नहीं हैं क्या?” गुड्डा ने कहा, “उनको भी शामिल करलें अपने साथ?” इस पर एक बार तो सभी हँस पड़े फिर बातें करने लगे। “क्या ये बच्चे भी हैप्पी न्यू इयर मनाते होंगे,” चेष्टा बोली। इस तरह उन बच्चों की बातें करते करते सब ने काम छोड़ दिया और वहीं मैदान में बैठ गए। शानू बोला, “इस तरह तो हो चुका हमारा प्रोग्राम, अभी आधा मैदान भी साफ नहीं हुआ है, पंकज भैया को पता चलेगा तो कितने नाराज़ होंगे।” दीप्ति ने सुझाव दिया कि अगर वे बच्चे नहा-धोकर साफ सुथरे कपड़े पहन लें तो उन्हें साथ में शामिल किया जा सकता है। इस पर सब बच्चे खड़े हो गए। “हाँ-हाँ, हम अपने पैसों से साबुन और तेल खरीद कर लाएँगे और उन बच्चों को दे देंगे,” चेष्टा बोली। सनी ने कहा, “ हम अपने पुराने कपड़े भी उन्हें दे सकते हैं।” रॉबिन दौड़ कर गया और पंकज भैया को बुला लाया। सनी ने पंकज को सारी बातें बताई और मदद करने को कहा। “अगर पैसे उन पर खर्च कर दोगे तो तुम्हारे हैप्पी न्यू इयर फंक्शन का क्या होगा,” पंकज ने पूछा। “नहीं-नहीं हमें उन बच्चों को अपने साथ शामिल करना ही है,” सभी ने एक साथ कहा। सब बच्चे पंकज के साथ चल पड़े। चौराहे की दुकान से पाँच नहाने के साबुन की टिकिया और पाँच छोटी शीशी तेल लेकर वे कच्ची बस्ती पहुँच गए। वहाँ पहुँच कर पंकज ने उन बच्चों को बुलाया और उनसे अपने घर वालों को बुलाने के लिए कहा। थोड़ी ही देर में चार-पाँच औरतें और कुछ आदमी उन बच्चों के साथ वहाँ आए। “क्या हुआ साहब जी, हमारे बच्चों ने कोई बदमाशी की है क्या,” एक औरत ने सहमते हुए पूछा। एक आदमी तो गुस्से से उन बच्चों पर चिल्लाने लगा, “कभी अगर साहब लोगों की शिकायत आई तो तुम सबकी टांगें तोड़ दूंगा,” ऐसा कहते हुए वो हाथ जोड़कर माफी मांगने लगा। सोसाइटी के सभी बच्चे ये नज़ारा देखकर हैरान हो रहे थे।
      पंकज ने उन लोगों को समझाया और कहा, “देखो, जैसा आप लोग समझ रहे हो वैसा कुछ नहीं है। हम कोई शिकायत लेकर नहीं आए है। हमारी सोसाइटी के बच्चे चाहते हैं कि नए साल के फंक्शन में आप लोगों के बच्चे भी इन लोगों के साथ शामिल हों। लेकिन इससे पहले आप इन्हें साफ सफाई से रखें। इनको रोज़ सुबह साबुन से नहला कर सिर पर तेल लगाकर बालों में कंघी करें। इनके बढ़े हुए नाखून काटें।” एक औरत ने सिर झुकाते हुए कहा, “साहब हम गरीब लोग साबुन तेल के लिए पैसा कहाँ से लाएँ? ये तो अमीर लोगों के शौक हैं।” साफ सफाई से रहना कोई शौक-मौज की बात नहीं है और ना ही इसमें इतना ज़्यादा पैसा खर्च होता है। ये देखो, इन बच्चों ने आपके बच्चों के लिए पैसे इकट्ठे करके साबुन और तेल खरीदा है, अब आप लोग भी सफाई से रहना और इन बच्चों को भी सफाई से रखना। हम कल फिर आएंगे, इन बच्चों के लिए कपड़े भी लाएँगे,” ऐसा कहकर पंकज सोसाइटी के बच्चों को लेकर लौट गया। लौटते वक़्त चेष्टा ने उन बच्चों को हाथ हिलाकर टाटा किया। इस पर कुछ संकोच से उन बच्चों ने एक दूसरे को देखा फिर वे भी मुस्करा के हाथ हिलाने लगे।
      दूसरे दिन जब सभी बच्चे अपने पुराने कपड़े, चप्पल और जूते लेकर वहाँ आए तो उन बच्चों को देखकर हैरान रह गए। उनका तो रूप ही बदल गया था। नहा-धोकर वे साफ सुथरे लग रहे थे। रॉबिन ने सबको कपड़े बाँटे, सनी ने सब बच्चों को नाप के हिसाब से चप्पल और जूते बाँट दिये। वे बच्चे अपने अपने घरों की और भागे और फटाफट नए कपड़े और जूते पहन कर आ गए। “अब तुम सब लोग हमारे साथ चलो, हम सब मिलकर खेलेंगे,” भव्य ने कहा। सबके सब सोसाइटी के मैदान में आ गए। सबने अपने अपने नाम बताए। थोड़ी ही देर में उनमें अच्छी दोस्ती हो गई। सबने मिलकर कई खेल खेले। शाम हो गई। सब अपने घरों को जाने की तैयारी करने लगे। कच्ची बस्ती के बच्चे भी लौटने लगे। तभी पंकज आ गया। उनको देखकर बोला, “अरे वाह! तुम लोग तो पहचान में ही नहीं आ रहे हो। शाबास! अब हमेशा इसी तरह साफ सुथरे रहना, और हाँ, कल शाम को आना मत भूलना, सब मिलकर हैप्पी न्यू इयर फंक्शन की तैयारी करेंगे।” सोसाइटी के बच्चे खड़े थे और कच्ची बस्ती के उनके नए दोस्त रामू, गोपाल, मीना और राजू अपने घर को लौट रहे थे। वे बार-बार मुड़ते और हाथ हिलाते। सोसाइटी के भी सारे बच्चे उन्हीं को देखते हुए हाथ हिला रहे थे। आज उन्होंने नए दोस्त बनाए थे। धीरे-धीरे सभी बच्चे अपने घरों की ओर बढ्ने लगे।

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