मंगलवार, 1 जनवरी 2019

अपरिभाषित

अपरिभाषित
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अतीत के कुछ पल ऐसे

जो अटक गए जाने कैसे

कि जाते ही नहीं बीत

लगते ही नहीं अतीत

हर पल रहते सामने

वो गहरी आँखों से देखना

बंद लबों में मुस्कराना

बहुत कुछ कहकर भी कुछ न कह पाना

क्या कहूँ इन पलों को

वर्तमान या अतीत, या और कुछ

खोजो पारिभाषिक ग्रन्थों में

इनके लिए कोई नाम

तब तक मैं पुकारता रहूँगा इन्हें

'प्यार' कहकर।

केटी
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शनिवार, 22 दिसंबर 2018

सब कुछ खत्म होने की घड़ी

वर्णमाला केआखिरी अक्षर के कैद होने तक

इंतज़ार करना तुम

या फिर पाब्लो नेरुदा को पढ़ते रहना

उसके उद्धरणों को विमर्श के मंचों पर धकेलते रहना

करना अपनी विद्वता पर गर्व

फूलकर जमीन से ढाई इंच ऊपर उठ जाना

वही आखिरी घड़ी होगी

जब तुम लटका दिए जाओगे

इतिहास के धूसर पन्नों में रह जाएँगे

तुम्हारे छटपटाते पाँव।

धरती की आखिरी लड़की के रौंदे जाने तक

तुम बाँसुरी बजाते रहना

या सिमोन द बुआर के 'सैकेण्ड सैक्स' में डूबकर

लाना कुछ फैमिनिज्म के मोती

आक्रोश और ओज का छौंक लगाना कवि सम्मेलन के मंचों पर

जब खबर छपेगी उस आखिरी लड़की की

तब तुम मर जाओगे

हाथों में मोमबत्तियाँ लिए तुम्हारी लाश

खड़ी होगी शहर के चौराहे पर।

केटी
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ज से जीवन

हम पढ़ाते हैं उन्हें

क से कबूतर

और वे बन जाते

क से किसान

म से मजदूर

ब से बेरोजगार

या कोई कोई ड से डाॅन भी।

काश हम उन्हें पढ़ाते कुछ और

सिखाते ज से जीवन जीना।

...

पर क्या ये हमें भी आता है...!

केटी
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गुरुवार, 29 नवंबर 2018

आशा

बहुत सुहाना ये जीवन है

ईश्वर का उपहार समझना,

आनेवाला कल तेरा है

मेरा ये उद्गार समझना,

जीता जिसने क्या पाया

और हारा जिसने क्या खोया,

राह शेष है, मुझे है चलना

सृष्टि का ये सार समझना।

केटी
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सोमवार, 1 अक्टूबर 2018

रावण

जी उठता है हर बार

फिर भी

मारो उसे बार बार

वो जो रावण है

छुप के रहता है हमारे मन की लंका में

केटी
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रविवार, 30 सितंबर 2018

कामना-काॅम्प्लेक्स

(1)
पापा! आप और मम्मी हर रोज

छत से देखा करते थे चाँद,

अब वो क्यों नहीं दिखता?

गुड़िया! तेरे होने के साथ ही

सड़क पार बनने लगा था 'कामना-काॅम्प्लेक्स'

तेरे बड़े होने तक वो इतना बड़ा हो गया

कि ढक लिया उसने

तेरे हिस्से का आकाश, तेरे हिस्से का चाँद।

(2)
अभी कुछ दिन पहले तक

जब बिके नहीं थे इसके फ्लैट

बेसमेंट में इसके रहता था

दिहाड़ी मजदूर श्यामुआ का परिवार।

दिन की मजदूरी, रात की चौकीदारी

बदले में थी रहने को ठौर

मालिक की कृपा और कुछ पैसा भी।

एक दिन बहुत धूमधाम हुई

श्यामुआ के पूरे परिवार ने सजाई

कामना-काॅम्प्लेक्स पर बिजली की लड़ियाँ

कई बड़े लोग आए, खाना-पीना हुआ

फ्लैटों में परिवार बस गए

उसी रात श्यामुआ, उसकी बीवी और तीन बच्चे

सड़क पार फुटपाथ पर बसा रहे थे

अपना नया घर।

चन्द्र-दर्शन

चन्द्र-दर्शन
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पंचमी का चाँद भी

इतना बड़ा होता है क्या!

पूर्णिमा के बराबर न सही

पर कुछ कुछ वैसा ही

या पाव भर कटा हुआ कहलो।

देखते ही ध्यान आता है वो हिस्सा

जो है ही नहीं।

इसी में छुपी है

पंचमी से पूर्णिमा तक की भावी यात्रा

दस तिथियाँ, दस दिन-रात

कितनी बार उगने और कितनी ही बार बुझने की पीड़ा

पूर्णता को पाने की चिरंतन अकुलाहट।

काले आसमान में टँगा हुआ

ये पाव भर कटा हुआ चाँद

करवा गया मूर्त में अमूर्त के दर्शन,

पंचमी का यह चाँद

कोई दार्शनिक तो नहीं शैलेन्द्र ढड्डा?