कण-कण कर बदलता
बदलता जाता निरंतर
और एक वो क्षण ऐसा भी आता
कि बदल जाता समूचा मैं एक भीनी सुगंध में।
होता यह तब
जब साँसों के एकदम करीब आ
छू लेता वो मुझे।
केटी
****
कण-कण कर बदलता
बदलता जाता निरंतर
और एक वो क्षण ऐसा भी आता
कि बदल जाता समूचा मैं एक भीनी सुगंध में।
होता यह तब
जब साँसों के एकदम करीब आ
छू लेता वो मुझे।
केटी
****
पेड़ जब उखड़ता है तेज अंधड़ में
गिर जाता धरती पर
अस्थमा के बलगम भरी छाती-सा हाँफता
लेता गहरी गहरी साँस
आखिरी साँस की इंतजार में।
किसी अदृश्य जड़ की बाल से भी बारीक कली
रह जाती जुड़ी धरती से
ठेठ गहरे पाताल में।
वो अदृश्य जड़ जो करती महसूस
खुद से बहुत दूर पड़े पेड़ का दुख
पर दिखती नहीं किसी को
कहती नहीं कुछ भी
दुख में बनती चिर सहभागिनी
वो... पीड़ा है।
केटी
****
जिन्दगी क्या है
कुछ नहीं
एक लम्बा इंतजार
एक सुनहरा धोखा
जिसे मन चाहे खाना बार बार।
जिन्दगी एक बंद ब्रैकेट
जिसे खोलने में गणित के नियम हार जाते हैं
या कि है ये ऐसी भूलभुलैया
जहाँ हर गली में भटकन है
अनंत भटकन, नहीं पहुँचती जो कहीं भी।
और इस जिन्दगी में मैं
जैसे बेनाम उदासियों के लिफाफे ढो रहा
घूमता है हर रोज यहाँ वहाँ
कोई अभिशप्त डाकिया।
केटी
****
मन उलझता असीम से आई पहेलियों में
बूझता उनके हल
और खुशी से किलक उठता।
खुशी देती मन को उड़ान
उछलता मन, कूदता मन, नाचने लगता।
और फिर असीम बूढ़े बाबा सा
रखता मन रूपी बालक के गालों पर हाथ
हँसता, पेट भर हँसता और खोल देता राज
कि "बच्चे तेरा उत्तर गलत है!"
मन की गति थम जाती, होता उदास
सिसकने लगता।
रे मन! असीम की अटखेलियाँ हैं उसकी पहेलियाँ
तू हल बूझ, खोल दरवाजे
और प्रतीक्षा कर,
प्रतीक्षा उस पहेलीबाज की।
वही बताएगा हल सही था या गलत
उसके बाद खुश होना, नाचना, जी भर जश्न मनाना।
तब तक
सिर्फ पहेलियाँ हैं, बूझने की दौड़ है
और है प्रतीक्षा।
केटी
****
डाल ही दो गर पैर किसी राह में
चलना तो आ ही जाता है
होता है रास्तों का भी
कुछ अपना फर्ज।
क्रान्ति की भट्टी में तपता
गलता पिघलता
नित नए रूप धरता
बन गया कलुआ कालीदास 'क्रान्ति'।
शब्दों की गिज़ा से भरपूर
शब्द खाना, शब्द पीना
ओढ़ना बिछाना भी शब्द
शब्दों के खोल में जा बसना।
उसकी हर गति, यति करने लगी आचरण
किसी शब्द की भाँति
कभी अभिधा, कभी लक्षणा तो कभी व्यंजना।
डकारें भी आती
तो सुनाई देता
मार्क्स और लेनिन का उदघोष।
शब्दों की जुगाली करता
चल पड़ा वो क्रान्तिवीर
सब कुछ बदलने को।
हैरान हुआ कलुआ देखकर
राह खचाखच भरी थी क्रान्ति की
कई थे हमसफर।
कुछ चल रहे थे
कुछ दौड़ रहे थे
कुछ बूढ़े क्रान्तिकारी
थे जवानों के कन्धों पर सवार
मगर वाह रे क्रान्ति का जज्बा
फिर भी बढ़ रहे थे।
भीड़ बहुत थी
आगे बढ़ने के लिए जरूरी था
कुछ को हटाना।
सोच में डूब गया कलुआ
नहीं लौट सकता पीछे
आगे तो बढ़ना ही है
क्रान्ति पुकार रही है।
केटी
****