मंगलवार, 10 सितंबर 2019

संकल्प

संकल्प
******

प्रेम गीत रचा जाएगा

किन्तु उससे पहले सुननी होगी

युद्ध की दास्तान

झेलने होंगे अनेकों घाव।

युद्ध के लिए

करने होंगे पार न जाने कितने बीहड़

क्रान्ति के आखर माँडते हुए

रंगने होंगे न जाने कितने आँगन

कितने नुक्कड़ों पर गुँजाने होंगे आह्वान के गीत

बजाते हुए डफ, मिलाते हुए ताल।

हर चीज मिट जाए

पर यह संकल्प जिन्दा रहेगा

कि कुछ भी हो जाए ऐ दोस्त!

ये सफर तय किया जाएगा

और आखिर एक दिन

प्रेम गीत रचा जाएगा।

केटी
****

शुक्रवार, 6 सितंबर 2019

जिज्ञासा

बच्चा जब घुटनों पर चलता है

सरकता, किलकता, मचलता रहता है

अचानक ठहर कर घुमाता है गर्दन

लक्ष्य करता किसी चीज को

अपलक ताकता रहता है।

वो चाहे खुद की परछाई हो

बूढ़ी दादी या मैं-मैं करती बकरी

या कोई टूटा हुआ खिलोना।

अपलक ताकते बच्चे की आँख

हो जाती फैल कर अंडाकार,

पुतलियाँ बदल जाती एक प्रश्नवाचक चिह्न में

वहीं से शुरू होता सफर

जिज्ञासा के 'जि' का।

केटी
****

गुरुवार, 22 अगस्त 2019

उजाला

उजाला तैयार था

मुझ तक आने को

रुका रहा तब तक

जब तक मैंने बाँहें ना फैलाईं

अँधेरे के स्वागत में।

केटी
****

गुरुवार, 11 जुलाई 2019

मन मेरा

एक घर है मन

आते हैं, जाते हैं मेहमान- विचार हैं।

कुछ मेहमान रहते लम्बे समय तक घर में

कुछ लौट जाते कुछ समय रहकर

कुछ केवल रखते पैर अंदर

और चल देते तुरंत उल्टे मुँह।

मेहमानों से होती घर में चहल-पहल

शान्त घर लगता अशान्त।

मैं देखता रहता हूँ आते जाते मेहमानों को

या कभी कभार खाली घर को भी

शायद देखना ही मेरी नियति है।

मेहमानों से ठुँसा पड़ा है घर

घर का मालिक मैं, दूर खड़ा हूँ घर से

जाऊँ कैसे भीतर।

केटी
****

स्पर्श

कण-कण कर बदलता

बदलता जाता निरंतर

और एक वो क्षण ऐसा भी आता

कि बदल जाता समूचा मैं एक भीनी सुगंध में।

होता यह तब

जब साँसों के एकदम करीब आ

छू लेता वो मुझे।

केटी
****

मंगलवार, 9 जुलाई 2019

पीड़ा

पेड़ जब उखड़ता है तेज अंधड़ में

गिर जाता धरती पर

अस्थमा के बलगम भरी छाती-सा हाँफता

लेता गहरी गहरी साँस

आखिरी साँस की इंतजार में।

किसी अदृश्य जड़ की बाल से भी बारीक कली

रह जाती जुड़ी धरती से

ठेठ गहरे पाताल में।

वो अदृश्य जड़ जो करती महसूस

खुद से बहुत दूर पड़े पेड़ का दुख

पर दिखती नहीं किसी को

कहती नहीं कुछ भी

दुख में बनती चिर सहभागिनी

वो... पीड़ा है।

केटी
****

रविवार, 7 जुलाई 2019

जिन्दगी

जिन्दगी क्या है

कुछ नहीं

एक लम्बा इंतजार

एक सुनहरा धोखा

जिसे मन चाहे खाना बार बार।

जिन्दगी एक बंद ब्रैकेट

जिसे खोलने में गणित के नियम हार जाते हैं

या कि है ये ऐसी भूलभुलैया

जहाँ हर गली में भटकन है

अनंत भटकन, नहीं पहुँचती जो कहीं भी।

और इस जिन्दगी में मैं

जैसे बेनाम उदासियों के लिफाफे ढो रहा

घूमता है हर रोज यहाँ वहाँ

कोई अभिशप्त डाकिया।

केटी
****