गुरुवार, 22 अगस्त 2019

उजाला

उजाला तैयार था

मुझ तक आने को

रुका रहा तब तक

जब तक मैंने बाँहें ना फैलाईं

अँधेरे के स्वागत में।

केटी
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गुरुवार, 11 जुलाई 2019

मन मेरा

एक घर है मन

आते हैं, जाते हैं मेहमान- विचार हैं।

कुछ मेहमान रहते लम्बे समय तक घर में

कुछ लौट जाते कुछ समय रहकर

कुछ केवल रखते पैर अंदर

और चल देते तुरंत उल्टे मुँह।

मेहमानों से होती घर में चहल-पहल

शान्त घर लगता अशान्त।

मैं देखता रहता हूँ आते जाते मेहमानों को

या कभी कभार खाली घर को भी

शायद देखना ही मेरी नियति है।

मेहमानों से ठुँसा पड़ा है घर

घर का मालिक मैं, दूर खड़ा हूँ घर से

जाऊँ कैसे भीतर।

केटी
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स्पर्श

कण-कण कर बदलता

बदलता जाता निरंतर

और एक वो क्षण ऐसा भी आता

कि बदल जाता समूचा मैं एक भीनी सुगंध में।

होता यह तब

जब साँसों के एकदम करीब आ

छू लेता वो मुझे।

केटी
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मंगलवार, 9 जुलाई 2019

पीड़ा

पेड़ जब उखड़ता है तेज अंधड़ में

गिर जाता धरती पर

अस्थमा के बलगम भरी छाती-सा हाँफता

लेता गहरी गहरी साँस

आखिरी साँस की इंतजार में।

किसी अदृश्य जड़ की बाल से भी बारीक कली

रह जाती जुड़ी धरती से

ठेठ गहरे पाताल में।

वो अदृश्य जड़ जो करती महसूस

खुद से बहुत दूर पड़े पेड़ का दुख

पर दिखती नहीं किसी को

कहती नहीं कुछ भी

दुख में बनती चिर सहभागिनी

वो... पीड़ा है।

केटी
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रविवार, 7 जुलाई 2019

जिन्दगी

जिन्दगी क्या है

कुछ नहीं

एक लम्बा इंतजार

एक सुनहरा धोखा

जिसे मन चाहे खाना बार बार।

जिन्दगी एक बंद ब्रैकेट

जिसे खोलने में गणित के नियम हार जाते हैं

या कि है ये ऐसी भूलभुलैया

जहाँ हर गली में भटकन है

अनंत भटकन, नहीं पहुँचती जो कहीं भी।

और इस जिन्दगी में मैं

जैसे बेनाम उदासियों के लिफाफे ढो रहा

घूमता है हर रोज यहाँ वहाँ

कोई अभिशप्त डाकिया।

केटी
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असीम की अठखेलियाँ

मन उलझता असीम से आई पहेलियों में

बूझता उनके हल

और खुशी से किलक उठता।

खुशी देती मन को उड़ान

उछलता मन, कूदता मन, नाचने लगता।

और फिर असीम बूढ़े बाबा सा

रखता मन रूपी बालक के गालों पर हाथ

हँसता, पेट भर हँसता और खोल देता राज

कि "बच्चे तेरा उत्तर गलत है!"

मन की गति थम जाती, होता उदास

सिसकने लगता।

रे मन! असीम की अटखेलियाँ हैं उसकी पहेलियाँ

तू हल बूझ, खोल दरवाजे

और प्रतीक्षा कर,

प्रतीक्षा उस पहेलीबाज की।

वही बताएगा हल सही था या गलत

उसके बाद खुश होना, नाचना, जी भर जश्न मनाना।

तब तक

सिर्फ पहेलियाँ हैं, बूझने की दौड़ है

और है प्रतीक्षा।

केटी
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शुक्रवार, 31 मई 2019

कलुआ की क्रांति-कविता (तीसरा भाग- चक्रव्यूह भेदन)

आसान होता है समंदर में उतर जाना
तब तक, जब तक कि ना हो सामना तूफान से।
ढोल, नगाड़े, शंख, तुरही के स्वर
करते आकर्षित सहज ही
किसी को भी रणभूमि में।
क्रांति के इस समर में कूद तो गया था कलुआ
पर अब था भयभीत
सामने खड़े थे चक्रव्यूह
सपनों का अंत निकट था।
कितना अद्भुत था वो दृश्य
क्रांति-योद्धा दिखा रहे थे जौहर
अलग-अलग दल बनाकर।
ये 'अ-वादी', ये 'ब-वादी', ये 'स-वादी', ये 'द-वादी'
कोई प्रति-वादी तो कोई निर्वादी
क्रांति भी थी खाँचों में बँटी हुई।
कलुए ने भरी हुंकार
सहम गई दिशाएँ
बिखर गए चारों ओर शब्द ही शब्द।
कुछ दलों ने किए आघात
कुछ ने अपनाया, कुछ ने सहलाया
जम रहे थे अब कलुआ के कदम।
लड़ने चलते हैं जो शोषण से
जाने कब लड़ने लग जाते हैं आपस में
बन जाते हैं खुद शोषण के यंत्र।
कविता से झरते हैं जिनके प्रेम के फूल
मन की बगिया उनकी
होती जर्जर नफरत से।

केटी
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