उजाला तैयार था
मुझ तक आने को
रुका रहा तब तक
जब तक मैंने बाँहें ना फैलाईं
अँधेरे के स्वागत में।
केटी
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उजाला तैयार था
मुझ तक आने को
रुका रहा तब तक
जब तक मैंने बाँहें ना फैलाईं
अँधेरे के स्वागत में।
केटी
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एक घर है मन
आते हैं, जाते हैं मेहमान- विचार हैं।
कुछ मेहमान रहते लम्बे समय तक घर में
कुछ लौट जाते कुछ समय रहकर
कुछ केवल रखते पैर अंदर
और चल देते तुरंत उल्टे मुँह।
मेहमानों से होती घर में चहल-पहल
शान्त घर लगता अशान्त।
मैं देखता रहता हूँ आते जाते मेहमानों को
या कभी कभार खाली घर को भी
शायद देखना ही मेरी नियति है।
मेहमानों से ठुँसा पड़ा है घर
घर का मालिक मैं, दूर खड़ा हूँ घर से
जाऊँ कैसे भीतर।
केटी
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कण-कण कर बदलता
बदलता जाता निरंतर
और एक वो क्षण ऐसा भी आता
कि बदल जाता समूचा मैं एक भीनी सुगंध में।
होता यह तब
जब साँसों के एकदम करीब आ
छू लेता वो मुझे।
केटी
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पेड़ जब उखड़ता है तेज अंधड़ में
गिर जाता धरती पर
अस्थमा के बलगम भरी छाती-सा हाँफता
लेता गहरी गहरी साँस
आखिरी साँस की इंतजार में।
किसी अदृश्य जड़ की बाल से भी बारीक कली
रह जाती जुड़ी धरती से
ठेठ गहरे पाताल में।
वो अदृश्य जड़ जो करती महसूस
खुद से बहुत दूर पड़े पेड़ का दुख
पर दिखती नहीं किसी को
कहती नहीं कुछ भी
दुख में बनती चिर सहभागिनी
वो... पीड़ा है।
केटी
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जिन्दगी क्या है
कुछ नहीं
एक लम्बा इंतजार
एक सुनहरा धोखा
जिसे मन चाहे खाना बार बार।
जिन्दगी एक बंद ब्रैकेट
जिसे खोलने में गणित के नियम हार जाते हैं
या कि है ये ऐसी भूलभुलैया
जहाँ हर गली में भटकन है
अनंत भटकन, नहीं पहुँचती जो कहीं भी।
और इस जिन्दगी में मैं
जैसे बेनाम उदासियों के लिफाफे ढो रहा
घूमता है हर रोज यहाँ वहाँ
कोई अभिशप्त डाकिया।
केटी
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मन उलझता असीम से आई पहेलियों में
बूझता उनके हल
और खुशी से किलक उठता।
खुशी देती मन को उड़ान
उछलता मन, कूदता मन, नाचने लगता।
और फिर असीम बूढ़े बाबा सा
रखता मन रूपी बालक के गालों पर हाथ
हँसता, पेट भर हँसता और खोल देता राज
कि "बच्चे तेरा उत्तर गलत है!"
मन की गति थम जाती, होता उदास
सिसकने लगता।
रे मन! असीम की अटखेलियाँ हैं उसकी पहेलियाँ
तू हल बूझ, खोल दरवाजे
और प्रतीक्षा कर,
प्रतीक्षा उस पहेलीबाज की।
वही बताएगा हल सही था या गलत
उसके बाद खुश होना, नाचना, जी भर जश्न मनाना।
तब तक
सिर्फ पहेलियाँ हैं, बूझने की दौड़ है
और है प्रतीक्षा।
केटी
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