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सोमवार, 18 जनवरी 2016

बत्तू बाबा! इतिहास का क्या करोगे...?

चाय की चुस्की  लेते  ही नरेन को राहत महसूस हुई। हालाँकि चाय में दूध कम था और स्वाद भी कुछ खास नहीं था पर तीन घंटे के लगातार सफर के बाद इस चाय ने खस्ताहाल सड़क पर लगभग उछलती हुई प्राइवेट बस की कमरतोड़ यात्रा के घावों पर मरहम का काम किया। चाय पीते पीते नरेन ने चारों ओर नज़र दौड़ाई। दूर-दूर तक जंगल फैला हुआ था। कई तरह के पेड़, झाड़ियाँ और टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियाँ...। इस लगभग वीरान-सी जगह पर दो बड़े पत्थरों पर एक लकड़ी का पट्टा टिका कर बनाई हुई चाय की थड़ी की बनावट से साफ-साफ पता चल रहा था कि ये कोई पास के गाँव में रहने वाले व्यक्ति की है जो कि दिन में यहाकर घंटों के अंतराल में आने-जाने वाली इक्का-दुक्का बसों के यात्रियों को चाय बेचकर शाम होने तक अपना टीन-टप्पर लेकर घर लौट जाता होगा और रात भर ये दो बड़े पत्थर खड़े-खड़े पास पड़े उबली हुई चाय की पत्ती के ढेर  को एकटक घूरते हुए फिर से दिन के होने और अपने मालिक के आकर चाय की थड़ी सजाने का इंतज़ार करते होंगे। नरेन के चेहरे पर मुसकराहट आ गई। उसने चश्मा उतारा और दूर तक देखा। कुछ पेड़ उसे देखे हुए-से लग रहे थे पर ज़्यादातर शायद उसके लिए नए थे। कमीज के कोने से चश्मे के काँच को पौंछ कर उसने चश्मा फिर से पहन लिया। दूर जाती हुई कच्ची सड़क ना दिखे तो कौन मानेगा कि इसके आगे भी कोई गाँव होगा, बस्ती होगी, उसमें लोग रहते होंगे! तभी कंडक्टर ने 'चलो भाई चलो' की आवाज़ लगाई और एक-एक कर सारे यात्री फिर से बस में घुसने लगे। नरेन भी अंदर आकर धम-से अपनी सीट पर बैठ गया। किसी बुड्ढे की खाँसी की तरह खरखरा कर बस चल पड़ी। नरेन ने सोचा कि उपेन्दु के कहने पर वह इस गाँव के लिए बिना सोचे-समझे निकल तो पड़ा है पर यहाँ आकर क्या उसका कार्य सिद्ध हो पाएगा? ... क्या उसे वो जानकारी मिल पाएगी जो उसके दो वर्ष के परिश्रम को सफल कर सकेगी? नरेन इतिहास विषय का शोधार्थी है। उसने शोध के लिए बहुत ही अद्भुत प्रकरण चुना और वो था 'मध्यकालीन इतिहास में शौर्य साम्राज्य'। जब वह अंतिम वर्ष में था तभी से उसकी जिज्ञासा और कौतूहल 'शौर्य साम्राज्य' के लिए बढ़ने लगे। इतिहास में उपलब्ध तथ्यों और सूत्रों में 'शौर्य साम्राज्य' की भव्यता और महानता के पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध थे, किन्तु इस विशाल साम्राज्य के अंतिम चरण को लेकर कुछ बातें स्पष्ट नहीं थीं। इतिहासकारों में इसको लेकर विवाद हो ऐसा भी नहीं था, क्योंकि उस पर कभी कोई शोध कार्य हुआ ही नहीं था। बस इसी बात ने नरेन को प्रेरित किया और उसने प्रोफेसर जवाहर मिश्र के निर्देशन में इसी विषय पर शोध करने का निश्चय किया था।

उसके गाइड उससे बहुत खुश थे, कारण था उसका कार्य के प्रति निष्ठावान होना। लगभग डेढ़ वर्ष हो गए थे, उसने जाने कितने ग्रंथ खंगडाले और कितने पुस्तकालयों से घंटों ढूँढ कर, कितनी सारी पुस्तकें ला-लाकर पढ़ डाली थीं। उसके काम के जुनून को देखकर ही उसके साथ के दूसरे शोधार्थी उसे 'शौर्य साम्राज्य का भूत' कहते थे। एक दिन युनिवर्सिटी कैंटीन में चाय की चुस्कियाँ लेते हुए उसके दोस्त उपेन्दु ने कहा, "नरेन, मुझे ऐसा लगता है कि शौर्य साम्राज्य के किसी राजा का भूत लग गया है तुझ पर और अब वो तुझे नचा रहा है।" सारे दोस्त ठठा कर हँस पड़े थे। उसी दिन से दोस्त लोग उसे 'शौर्य साम्राज्य का भूत' कहकर छेड़ने लगे थे। पर नरेन केवल मुसकराता रहता। वह देर रात तक बैठ के सिलसिलेवार सब कुछ लिखता, फिर सुबह-सुबह  सारे नोट्स लेकर प्रोफेसर जवाहर मिश्र के घर पहुँच जाता। मिश्रजी एक प्रबुद्ध इतिहासकार थे। दुनिया भर  के जाने कितने विश्वविद्यालयों में उनकी लिखी हुई किताबें पढ़ी-पढ़ाई जाती थीं। नियमित दोनों वेला संध्या-पाठ करना और प्रात:कालीन पूजा के बाद आधा घंटा मौन रहना उनकी दिनचर्या के विशेष अंग थे। लगभग महीना भर पहले की बात है जब इसी क्रम में एक दिन नरेन सुबह-सुबह प्रोफेसर साहब के घर पहुँचा तो वे पूजा करके उठे ही थे और नियमानुसार अपने कमरे में मौन बैठे थे। नरेन को देखते ही उन्होने उसे बैठने का संकेत किया और स्वयं भीतर चले गए। थोड़ी देर बाद राघव काका ट्रे में एक कप चाय और पानी का एक गिलास ले आए। राघव काका उसे अच्छी तरह पहचानने लग गए थे। देखते ही मुसकराना और गर्दन को सहमति-सूचक अंदाज में हिला देना उनकी आदत थी। पाँच साल पहले प्रोफेसर साहब की पत्नी का निधन हो जाने के बाद से उनके दूर के रिश्तेदार राघव काका ही घर का सारा कामकाज और उनकी सेवा-चाकरी संभाले हुए थे। चाय खत्म कर नरेन फिर से अपने नोट्स पलटने लग गया। कुछ देर बाद प्रोफेसर साहब आए। नरेन ने उनके चरण-स्पर्श किए। उन्होने बैठते हुए नरेन के नोट्स उठा लिए और गंभीरता से उन्हें देखने लगे। बहुत देर तक वे पढ़ते रहे फिर बोले, "तुमने बहुत मेहनत की है नरेन, पर तुम जानते ही हो कि इतिहास बारबार पुनर्व्याख्यायित होता है और शोध कार्य की इसमे बड़ी भूमिका होती है। " "जी सर," नरेन प्रोफेसर साहब पर नज़र जमाता हुआ बोला। ऐसा वह तब हर बार करता था जब प्रोफेसर साहब उसके काम को देखकर उसे आगे के लिए गाइड करते थे। "कई बार इतिहास तथ्यों और ग्रन्थों में न मिलकर लोकजीवन और लोक परम्पराओं में बहता हुआ दिखाई देता है। शौर्य साम्राज्य के अंतिम चरण को लेकर तुमने बहुत कुछ सामग्री जुटाई है, पर फिर भी लोकजीवन से यदि कोई संदर्भ सूत्र इससे जुड़ा हुआ मिल जाए तो तुम्हारे काम को विश्वसनीयता का बहुत बड़ा आधार मिल जाएगा," कहकर प्रोफेसर साहब खड़े हो गए। नरेन ने मुसकराते हुए उनके चरण-स्पर्श किए और नोट्स लेकर बाहर निकल गया।

लोकजीवन में 'शौर्य साम्राज्य' कहाँ मिलेगा, अब वह इसी की खोज में लग गया। किताबें, किताबें और किताबें... ढेर सारी किताबें! कहीं कोई छोटा-सा संकेत भर मिल जाए... पर कहीं कुछ नहीं मिला। उपेन्दु भी किसी सेमिनार में पत्र-वाचन के लिए गया हुआ था। ऐसे ही लगभग महीना भर बीत गया। उपेन्दु के लौटते ही वह उसके हॉस्टल चला गया। बातों-बातों में उपेन्दु ने उसे बताया कि बहुत दूर किसी पहाड़ी क्षेत्र में एक गाँव है देवीकोट, वहाँ के आदिवासी हर कार्तिक पूर्णिमा को त्यौहार मनाते हैं और उसमें कोई बाबाजी कथा सुनाते हैं। वो कथा 'शौर्य साम्राज्य' के अंतिम चरण के राजाओं से संबन्धित है। उपेन्दु ने ये भी बताया कि उसे ये बात सेमिनार में उसी क्षेत्र से आए किसी अन्य शोधार्थी ने बताई थी, और ये भी कि वे बाबाजी लगभग दस-पंद्रह वर्षों से ये कथा सुनाते आ रहे हैं। नरेन तो खुशी से उछल पड़ा। उपेन्दु बोला, "यू आर सो लक्की नरेन। उस बंदे ने कहा था कि नेक्स्ट फ्राइडे को देवीकोट में कार्तिक पूर्णिमा का मेला लगेगा। आई थिंक, तुम्हें जाना ही चाहिए।" नरेन ने मुसकराते हुए गर्दन हिलाई और वहाँ जाने का निश्चय कर लिया। रास्ते का पता लगाकर दूसरे ही दिन वह उस गाँव के लिए निकल पड़ा। अब उसे विश्वास होने लगा कि उसकी मेहनत को विश्वसनीयता का प्रामाणिक लोक आधार मिल जाएगा।

बस एक घुमावदार मोड़ से पूरी की पूरी मुड़ कर एक पीली सूखी घास से ढके मैदान में आ खड़ी हुई। तेज गति से घूमने के कारण बस में बैठे लोग असंतुलित होकर इधर-उधर को लहरा गए। नरेन ने कंडक्टर से पूछ कर तसल्ली करी  कि देवीकोट गाँव यही है और बस से उतर गया। कंधे पर बैग लटकाकर चलने को हुआ तब खयाल आया कि जाऊंगा कहाँ? मैदान पार कर वह सीधा-सीधा चलता गया। खेतों के बीच से एक पगडंडी निकल कर वहाँ तक जा रही थी जहाँ एक पहाड़ी नदी बिना शोर किए बह रही थी। नदी के पास ही कुछ लोग खड़े दीख रहे थे। खेतों के पास कुछ बच्चे खेल रहे थे। नरेन ने रुक कर उनकी ओर हाथ हिलाया। बच्चे अपना खेल छोड़ कर उसे देखने लगे। वे आपस में हँसते हुए कुछ बोल रहे थे जिसे नरेन नहीं समझ पाया। बच्चों को पीछे छोड़ नरेन दूर खड़े उन लोगों तक पहुँचा और उनके पास जाकर नमस्कार किया। जवाब सभी ने हाथ जोड़ के दिया। उनके पूछने पर कि 'कौन हो और किसके यहाँ जाना है,' नरेन ने बाबाजी से मिलने की इच्छा बताई। पर वह तब आश्चर्य में पड़ गया जब उन्होंने कहा कि यहाँ तो कोई बाबाजी नहीं रहते। सूरज अपनी ढलान पर लुढ़कने को था। हवा में ठंडक महसूस होने लगी थी। "कहीं उपेन्दु को किसी ने गलत तो नहीं कह दिया," नरेन सोच में पड़ गया। उसने फिर से समझाया, "आपके गाँव में कल कार्तिक पूर्णिमा का मेला लगेगा ना..., उसमें वो बाबाजी एक कथा सुनाते हैं ना..., वही बाबाजी।" "अरे! बत्तू बाबा?.... हाँ-हाँ, कथा सुनाते हैं वो," कहकर एक आदमी मुसकराया और दूसरे लोग भी गर्दन हिलाकर 'हाँ-हाँ' कहने लगे। "पर वो तो कल सुबह ही आएंगे, आप रात में कहाँ जाओगे, बस तो मिलेगी नहीं अब," वही आदमी बोला। आपस में उन लोगों ने जाने क्या बात की फिर उसी आदमी ने आगे बढ़कर उसका हाथ थामा और बोला, "चलो, रात आप मेरे यहाँ रुक जाओ।" नरेन के पास कोई ओर रास्ता भी नहीं था, सो वह आदतन मुसकराया और उसके साथ चल पड़ा।

जाने कैसे टेढ़े-मेढ़े रास्तों से गुज़र कर वो एक ऊँची-सी जगह पर पहुँचे। यहाँ आकर उसे वो झोंपड़ी दिखाई दी जो अब तक नहीं दीख रही थी। सब कुछ बड़ा रहस्यमय और रोमांचक लग रहा था। "मेरा नाम बैजनाथ है साहब। पास के गाँव से पाँच कक्षा पढ़ कर फॉरेस्ट अफसर के यहाँ अर्दली लगा हुआ हूँ। महीने में एक-दो दिन गाँव आता हूँ, बाकी समय साहब के बंगले पर ही ड्यूटी है," नरेन का मेजबान उसे अपना परिचय देता हुआ आगे-आगे चलता जा रहा था। झोंपड़ी पास आ गई थी। बैजनाथ तो उसके छोटे-से दरवाजे में झुककर भीतर घुस गया पर नरेन कुछ पल ठिठका हुआ बाहर ही खड़ा रहा। बैजनाथ लौटकर आया और बोला, "अरे साहब आओ ना अंदर, बाहर क्यों खड़े हो?" "हाँ-हाँ आता हूँ," कहता हुआ नरेन अंदर की ओर चल पड़ा। बैजनाथ ने उसे एक मोटी ऊनी दरी, जो किसी जानवर के बालों से बनी लग रही थी, पर बैठाया और खुद कभी पानी कभी चाय लाता रहा। नरेन को अंदर के कमरे से एक छोटी लड़की के हँसने का स्वर सुनाई दिया। जब उसने उसी ओर गर्दन घुमाई तो एक बच्ची ने गर्दन निकाल कर झाँका और खिलखिलाकर फिर अंदर हो गई। नरेन को लगा शायद ये वही बच्ची है जो उसे खेतों में दिखी थी, या फिर शायद कोई और ही हो। अनजाने आदिवासी भोजन का आनंद लेकर उसने सोने की इच्छा जताई। लगातार तीन दिन की यात्रा से वह बहुत थक गया था। बैजनाथ ने बिस्तर का इंतजाम किया। नरेन तो पड़ते ही सो गया। सुबह जब आँख खुली तो बैजनाथ चाय लेकर खड़ा था। चाय में शायद गुड़ डाला हुआ था इसलिए कुछ अलग-सा स्वाद आ रहा था, पर फिर भी बहुत अच्छा लग रहा था। चाय पीकर नरेन में एकदम ताजगी आ गई। वह जल्दी ही उठकर नहाने-धोने और तैयार होने के उपक्रम में लग गया। "खाना तो आज देवीथान पर पूजा के बाद ही होगा... सारे गाँव का खाना होता है," बैजनाथ ने कहा। "ठीक है, ठीक है," नरेन मुसकराकर बोला। सीढ़ीदार खेतों में से कभी उतरते कभी चढ़ते हुए दोनों चले जा रहे थे। नरेन ने चेहरा ऊपर उठाया तो सूरज आँखों में गड़ गया। पहाड़ी की घाटी वाला हिस्सा धूप में दमक रहा था। अब उसे दूर से आदिवासी वाद्ययंत्रों की घमक सुनाई देने लगी। शहनाई जैसा कोई तीखा स्वर गूँज रहा था पर उसमें शहनाई के साथ-साथ जैसे तारों की झीनी-झीनी मधुर झंकार मिश्रित कर दी गई हो। एक चौड़े चबूतरे पर देवीथान बना हुआ था। मंदिर पर चारों ओर हाथ से बनाई हुई झंडियाँ, फर्रियाँ झूल रही थीं। वहीं पीली धोती और पीला ही कुर्ता पहने एक बाबाजी कुछ लोगों को निर्देश दे रहे थे। नरेन ने चश्मे को थोड़ा आँखों की ओर दबाया और आगे बढ़कर बाबाजी के चरण स्पर्श किए। बाबाजी ने 'खुश रहो भई' कहते हुए उसके कंधों पर हाथ रखा। बैजनाथ ने प्रणाम करते हुए कल की सारी घटना बताई। तभी कुछ लोग आए और बाबाजी से बातें करने लगे। बाबाजी ने मुड़कर नरेन से कहा, "तुम बैठो यहीं," और स्वयं उन लोगों के साथ कहीं चल दिए। लोग मंदिर के आगे चटाइयाँ बिछा रहे थे, कोई अंदर से पीतल और काँसे की थालियों में सजे फल-फूल, बताशे, मिश्री और खीले लेकर आ रहे थे। नरेन कुछ देर तो दूर बैठा ये सब देखते रहा फिर धीरे-धीरे सरक कर उनके बीच आ गया और खुद भी काम में हाथ बंटाने लग गया। तभी उसका ध्यान पहाड़ियों से उतरते लोगों के छोटे-छोटे समूहों पर गया। 'घूँ-घूँ' करते हुए किसी गीत की-सी ध्वनि भी सुनाई दे रही थी जिसमें बीच-बीच में 'होय-होय' की आवाज़ के साथ नगाड़ों और थालियों के बजने की आवाज़ भी आ रही थी। थोड़ी ही देर में दृश्य एकदम साफ दिखाई देने लगा। आदमी, औरतों और बच्चों के झुंड के झुंड देवीथान के सामने वाले चौगान में आ गए। एक अजीब-सा उन्माद पूरे वातावरण में घुला हुआ था। ढ़ोल, नगाड़ों और शहनाई जैसे वाद्ययंत्रों की तीखी धुन घाटी में गूँज रही थी। नरेन भाग के अपने बैग में से कैमरा निकाल लाया और फोटो लेने लगा।

उसने देखा कि सभी परिवारों से आए हुए लोगों की लड़कियों के माथे पर टीका सजा हुआ, गले में लाल पहाड़ी फूलों की माला डाली हुई, और हाथों में एक पीली ध्वजा भी थी। सभी औरतें एक ओर समूह बना कर कुछ गाने लगीं। नरेन ने पूरा ध्यान लगाकर सुनने और समझने की कोशिश की पर उसे हर पंक्ति के अंत में दोहराए जाने वाले 'शिवप्यारी माता होय' के अलावा कुछ भी समझ में नहीं आया।  मालाएँ पहने हुए लड़कियाँ बीच में खड़ी हो गईं और स्त्री-पुरुषों ने चारों ओर घेरा बनाकर नाचना शुरू किया। नगाड़े की ताल बढ़ती ही जा रही थी। बीच-बीच में 'शिवप्यारी माता की जय हो' की जोरदार आवाज़ के साथ सभी लोग दोनों हाथ जोड़कर सर झुकाकर प्रणाम कर रहे थे। तभी बाबाजी वहाँ आए। उनके साथ लोग कुछ टोकरों में फूल-पत्ते भरकर लाए थे। बाबाजी ने एक लोटे से ज़मीन पर जल छिड़का और फिर वहाँ फूल-पत्ते बिछाए। फिर उन पर लड़कियों  को बैठाया गया। सबसे पहले बाबाजी ने मंदिर से आरती का दीया लाकर उन सभी लड़कियों की पूजा की, फिर बारी-बारी से सब लोगों ने आकर उन लड़कियों के चरण स्पर्श कर प्रणाम किया। नरेन ने देखा कई लोग प्रणाम के साथ ही रोते हुए कुछ बोल भी रहे थे, दोनों हाथ फैलाकर जैसे कुछ माँग रहे हों, मनौती जैसा ही कुछ। लड़कियों के पास ही एक चौकी पर बाबाजी बैठ गए और सामने बिछी चटाइयों पर गाँव के स्त्री-पुरुष बैठने लगे। नरेन भी बाबाजी के दायीं ओर पड़ी एक चटाई को सरका कर बैठ गया। बीच-बीच में वह अपने कैमरे से फोटो भी लेता जा रहा था। उसने देखा की सभी स्त्री-पुरुषों ने अपने हाथों में कुछ फूल-पत्ते दबा रखे हैं। बाबाजी ने जयकारा लगाया, 'शिवप्यारी माता की...,' सभी ने जयघोष किया 'जय हो।'

"तो भई, ये कथा है शिवप्यारी माता की," बाबाजी ने कमर पूरी झुकाई ओर कहना शुरू किया। "बहुत बरस पहले की बात है। लाल पहाड़ की पूरी तराई में महाराजा शौर्य सिंह का राज था। उनकी प्रजा बहुत सुखी थी। भई राजा हों तो...,"...... "शौर्य सिंह जैसे," सारे लोग एक साथ बोले। 'हरे नम,' कहते हुए बाबाजी ने कथा आगे बढ़ाई, "भई महाराज को अपनी प्रजा की सारी चिंता रहती, सारा समय प्रजा की ही सोचते। ऐसे ही महाराज के बड़े कंवर चंद्रभान सिंह। अपने पिताजी की आशीष  लेकर राजगद्दी संभाली और वैसा ही कामकाज किया। दूर-दूर देशों के राजा आते और चंद्रभान जी की मित्रता प्राप्त कर धन्य हो जाते। भई जो देखो, वो सुविधा राज में। बड़े-बड़े ज्ञानीजनों को अपने राज में बुलाकर प्रजा के पढ़ने के लिए गुरुकुल खोल दिए और नामी-गिरामी वैद्यों को बुलाकर राज के गाँव-गाँव में भेज दिया अपनी प्रजा की खातिर। तो भई बेटा हों तो....," "चंद्रभान जैसे," सभी ने ज़ोर से कहा। 'हरे नम' कहते हुए बाबाजी पूरी कमर को अपने घुटनों पर झुकाते हुए आगे बोले, "चंद्रभान के बाद वीरप्रताप सिंह और वीरप्रताप के बाद हुए राजशेखर सिंह, एक से बढ़कर एक प्रतापी राजा। राजशेखर के दो कंवर हुए ऋद्धिराज सिंह और सिद्धिराज सिंह। महाराज के सर जाने कौनसा पाप चढ़ा जो उनके दोनों कंवर सदा आपस में लड़ते ही रहें। बैर बढ़ा तो वो बढ़ा कि दोनों एक-दूजे के खून के प्यासे हो गए। तो भई बैर से बँटवारा भला, महाराज ने सोची। सो, दोनों भाइयों में राज का बँटवारा कर दिया। महाराज तो महारानी के साथ कैलाश पर्वत सिधा गए, सो वहीं शिव समाधि में लीन हो गए। इधर ऋद्धिराज और सिद्धिराज में रोज की लड़ाई। आश्विन मास की एक ठंडी रात में ऋद्धिराज ने सिद्धिराज के गढ़ को चारों ओर से घेर लिया। ऋद्धिराज की सेना बहुत बड़ी थी। सिद्धिराज समझ गए कि जो बाहर से कोई मदद मिले तो बचाव हो सके वरना तो हार तय है। दिन बीते, हफ़्ते बीते, महीना बीता। गढ़ के अंदर का सारा अनाज, खाने-पीने का सामान खत्म हो गया। प्रजा त्राहि-त्राहि करने लगी। अब सिद्धिराज ने सोच लिया कि लड़ कर मरने का समय आ गया। तो भई उन्होने अपने दरबारियों से बात की। सब जानते थे कि जो लड़ाई हुई तो पूरा कुनबा खत्म होगा, कोई नाम लेवा न बचेगा, पर दूजा कोई रस्ता भी न था। सो तय हो गया कि प्रभात बेला में गढ़ के फाटक खोल देंगे और युद्ध करेंगे।"

नरेन पल-पल रोमांचित होता हुआ सुनता जा रहा था। सब कुछ अद्भुत घट रहा था। शौर्य साम्राज्य कि कथा इस तरह लोक कथाओं का अंग होगी, उसे इसका अनुमान तक ना था।
"हरे नम, कातिक पूनों की रात थी। आकाश में पूरा चाँद निकला हुआ था। राजा सिद्धिराज सिंह महल की छत पर खड़े थे। तभी चाकर ने आकर खबर दी की महाराज बधाई हो, महारानी जी ने कन्या रत्न को जन्म दिया है। महाराज एक पल को खुश हुए फिर उदास हो गए। सोचा, भई क्या तकदीर लेकर आई है ये कन्या! आज पैदा हुई और कल ही सारा परिवार खत्म। तभी जोरदार काली, घघराती आँधी उठी। छबड़-छबड़ करके नभ को फाड़ने लगी। पूरा आसमान काली आँधी में डूब गया। चाँद-तारे सब छुप गए। सिद्धिराज घबरा गए। उनके मन में आया, हे प्रभु! ये कैसा अपशकुन है....! क्या दिखाना चाह रहे हो....! ये सर्वनाश की आँधी है....! काल तो गढ़ के बाहर खड़ा बस सूरज निकलने की बाट जोह रहा है," कहते हुए बाबाजी ने लंबा आलाप लेकर गाना शुरू किया-

हे.... कातिक पूनों की आधी रात होय...
हे.... काली घघराती आँधी साथ होय...
शिवप्यारी माता का औतार भयो होय...

नरेन भोंचक्का-सा पूरे दृश्य को कभी इधर से तो कभी उधर से देख रहा था। भजन की तीसरी पंक्ति पर सारे के सारे वाद्ययंत्र एक साथ घनघना उठे और सभी स्त्री-पुरुष खड़े होकर ज़ोर-ज़ोर से गाते हुए नाचने लगे। "शिवप्यारी माता की....," बाबाजी ने जयकारा लगाया। सभी लोग एक साथ बोले, "जय हो, जय हो।"
"हरे नम, तो भई राजा सिद्धिराज के घर उस रात शिवप्यारी माता का अवतार हुआ। जनम देकर माँ रो रही, दूर खड़ा बाप रो रहा, नाते-रिश्तेदार साँसे भर रहे। पर माता मन ही मन मुसकरा रही। उधर गढ़ के बाहर ऋद्धिराज भी प्रकृति का ये ताण्डव देख रहे। गुप्तचर ने आकर समाचार दिया, राजा सिद्धिराज के यहाँ राजकंवरी का जन्म हुआ है। सभी दरबारी हँसने लगे, कहने लगे, राजकंवरी नहीं परिवार का काल कहो। माता ने किया चमत्कार, ऋद्धिराज का मन पलटा। वे बोले, ये तो अनर्थ हो जाएगा, एक कन्या के सर युगों-युगों तक ये कलंक रहेगा। मेरे तो पूरे वंश का तारण ना हो सकेगा, प्रेत बनकर भटकेंगे सब। तुरंत हुकम दिया सैनिक को कि जाओ सिद्धिराज को संदेसा दो के हम मिलना चाहते हैं। भाई से भाई मिले। सिद्धिराज बोले, रात भर भी नहीं रुक सकते तो सीधे कह दिया होता, हम गढ़ का फाटक खोल रात में ही लड़कर अपनी जान दे देते। ऋद्धिराज बोले, नहीं भाई, अब युद्ध नहीं करना। तुम्हारे घर राजकंवरी हुई है, बधाई देनी है। देखते ही देखते ऋद्धिराज के चाकर फल, फूल, मिठाई, जेवर, कपड़ों के उपहारों से भरे सैकड़ों सोने-चाँदी के थाल हाथों में लिए महल में आने लगे। सिद्धिराज की आँखों में पानी भर आया। भाई से भाई गले मिल गए। सिद्धिराज भरे कंठ से बोले, भाई आप सचमुच बड़े ही हैं। पूरे गढ़ में शंख, घंटे और थालियों की आवाज़ गूँजने लगी। दूसरे दिन भरे दरबार में दोनों भाई एक साथ बैठे। ऋद्धिराज ने घोषणा की कि आज से राजकंवरी दोनों राज्यों की राजकंवरी होगी। बरसों का बैर पल भर में मिटा। शिवप्यारी माता ज्यों-ज्यों बड़ी होती गईं, भई त्यों-त्यों चमत्कार पे चमत्कार होते गए। दुखिया के सर पे हाथ रख दे तो उसका दुख-दारिद दूर हो जाए, खेतों में पैर धर दे  तो धरती माँ चौगुनी फसल खड़ी कर दे, गाय-भैंस देखने भर से दूध का अमृत छलकाने लग जावें। रिद्धिराज और सिद्धिराज दोनों राजाओं के राज में कंचन बरसने लगा, ऐसी माता की कृपा हुई। दूर-दूर देशों से लोगों की भीड़ की भीड़ माता के दरसन को आने लगी। सभी को धन्य करके माता पंद्रह बरस की उम्र में एक दिन गढ़ के तहखाने में बने मंदिर में गई, सो वहीं समाधि में लीन हो गईं। उसी रात माता ने प्रगट होकर आकाशवाणी करी कि आज से में हर कन्या के रूप में जनम लूँगी, जो कोई मेरा मान-ध्यान करेगा, उसका में खुद ध्यान रखूंगी और जो तनिक भी अपमान हुआ तो मेरा कोप लगेगा," कथा पूरी करते हुए बाबाजी ने खड़े होकर फिर से शिवप्यारी माता का जयकारा लगाया। सभी लोगों ने अपने हाथों में लिए फूल-पत्तों को जय-जयकार के साथ सामने बैठी कन्याओं की ओर उछाल दिया।

नरेन लगभग चेतना शून्य-सा सब कुछ देख-सुन रहा था। अब शायद सामुहिक भोज की तैयारी होने लगी। बत्तू बाबा उठ कर मंदिर के पीछे बनी एक झोंपड़ी में चले गए थे। नरेन भी उनके पीछे-पीछे आया। बाबाजी लेते हुए थे, शायद थक गए होंगे; उसे देखते ही उठ बैठे। "तुम भी भोजन करलो भई," बाबाजी ने कहा।
"बाबाजी, ये सब क्या है....! ....... आप क्यों ऐसा कर रहे हैं?" नरेन बोला।
"क्या हुआ?..... किसकी बात कर रहे हो?"
"यही, जो शौर्य साम्राज्य की कथा आप सुना रहे हो....."
"शौर्य साम्राज्य की नहीं, शिवप्यारी माता की कथा।"
"झूठ बोलते हैं आप। इन भोले-भाले अनपढ़ आदिवासियों को झूठी कथा सुनाकर ठग रहे हैं आप," नरेन ने आवेश में आकर कहा। बाबाजी कुछ पल को सकपका गए फिर बोले, "मैंने कोई झूठ नहीं कहा और ना ही मैं इनसे कुछ लेता हूँ।"
"झूठ! एकदम झूठ! मैं इतिहास जानता हूँ। सच तो ये है कि वो युद्ध हुआ था। उस रात सिद्धिराज के परिवार की औरतें गुप्त द्वार से भाग निकलीं और दूसरे दिन भयंकर युद्ध हुआ, जिसमें सिद्धिराज अपने सारे बेटों और सेना सहित मारे गए। यहाँ तक की कई वर्षों तक उन औरतों ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन काले वस्त्र धारण कर शोक मनाया," कहकर नरेन ने पूरे आत्मविश्वास और कुछ-कुछ दंभ के साथ बाबाजी को देखा।
बाबाजी शांतचित्त होकर नरेन को सुन रहे थे। "मैं नहीं जानता तुम कौन हो और यहाँ क्यों आए हो, बस मैं इतना जानता हूँ कि मैं जो कह रहा हूँ वो सही है और जो कर रहा हूँ वो भी सही है," बाबाजी नरेन को एकटक देखते हुए बोले।
नरेन पलटकर एक विषय-विशेषज्ञ की हैसियत से बोला, "आपके जो मन में आए वो करो, लेकिन बत्तू बाबा! इतिहास का क्या करोगे...?... उसे तो आप बदल नहीं सकते....आप शायद नहीं जानते हैं.....ये लोग भी नहीं जानते हैं, पर मैं जानता हूँ.... मैं वो पहला व्यक्ति हूँ जिसने इस पर शोध कार्य किया है।"
"पहला नहीं, दूसरा...," बत्तू बाबा शून्य में देखते हुए बोले। "हाँ, तुम शायद दूसरे व्यक्ति होगे, क्योंकि पहला व्यक्ति मैं हूँ। बरसों पहले मैंने भी इसी विषय पर शोध किया था। जैसे ही मैं इस तथ्य तक पहुँचा तो मेरे मन ने इसे स्वीकार करने से मना कर दिया। मेरा शोध कार्य पुस्तक के रूप में प्रकाशित होकर दूर-दूर तक उस अबोध कन्या को कलंक के रूप में प्रचारित करता। मैं पागल हो गया। वो मासूम कन्या मेरे सामने खड़ी हो गई कि मेरा क्या अपराध था, वो सब तो मर-खप गए, मुझे आज तक अपमानित क्यों होना पड़ रहा है? मैंने सारे कागजों को आग लगा दी, तब मुझे चैन पड़ा। और फिर जाने कैसे भटकता-भटकता मैं इन आदिवासियों के बीच आ गया। रोज़ इन आदिवासियों को राजा-महाराजाओं की बातें सुनाता था, सो इन्होने ही नाम धर दिया 'बत्तू बाबा'। मुझे लगा जो गलती इतिहास में हुई, उसे मैं सुधार सकता हूँ। बातों ही बातों में बन गई शिवप्यारी माता की बात। बात ने इतिहास बदला और कुछ बेहतर किया। अब सुकून है। गाँव में कन्याओं का मान-सम्मान देखता हूँ तो खुशी होती है। नहीं चाहिए मुझे इतिहास के वो काले पन्ने, जो मेरे आज और आने वाले कल पर मनहूसियत का साया बन जाएँ।" कुछ पल बाबाजी आवेश में काँपते रहे फिर कुछ लोगों की आवाज़ सुनकर बाहर चले गए।

नरेन को सब कुछ घूमता हुआ-सा नज़र आया। वह सिर्फ सुन रहा था। पैरों के नीचे से धरती जैसे बहुत तेज़ी से सरक रही हो। ढोल, नगाड़े और शंख की तीखी ध्वनि के बहाव में नशे में झूमता हुआ-सा, कुछ-कुछ सन्निपात-ज्वर के रोगी-सा बड़बड़ाता वो कहाँ का कहाँ चलता रहा। जाने कौन-कौन लोग उसका हाथ पकड़ कर क्या-क्या कहते रहे, उसे कुछ पता ही नहीं चला। और फिर अचानक उसका पूरा शरीर झटके से आगे को झुका, तब उसने चौंक कर चारों ओर देखा। वह बस में बैठा था और कंडक्टर बस के ड्राईवर को तेज़ ब्रेक लगाने पर गाली दे रहा था। उसने अपना बैग संभाला। बैग में उसके थीसिस-नोट्स, कैमरा और उसका सामान सुरक्षित था। उसके सर में तीव्र पीड़ा हो रही थी। खिड़की से बाहर देखते हुए मन बहलाने के लिए वो कुछ गुनगुनाने लगा। काफी देर बाद उसे खयाल आया कि वो क्या गुनगुना रहा है-
हे......कातिक पूनों की आधी रात होय...
हे..... काली घघराती आँधी साथ होय....
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