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रविवार, 24 दिसंबर 2017

ओवरटेक

फर्राटे से स्कूटी भगाते हुए वो आगे निकल जाती है, आगे... आगे... आगे ही आगे। हर किसी को ओवरटेक करती है। ... इतनी कहाँ की जल्दी है इसे... डर नहीं लगता क्या इसे!... सैकड़ों सवालों को ओवरटेक करती हुई आगे भागती है ये लड़की।
पहले ऐसे नहीं करती थी ये। डरती थी, धीरे-धीरे, आराम-आराम से स्कूटी चलाती हुई निकलती थी। दूसरे लोगों को खुद से आगे निकलने देती थी। पर जल्दी ही परेशान होने लगी। हर सड़क, हर रास्ते, हर चौराहे पर उसके साथ कुछ ऐसा होने लगा कि उसे लगा जैसे कोई उसे भद्दे तरीके से छू रहा हो। लोगबाग उसे ऊपर से नीचे तक घूरते हुए आगे निकलते और मुड़ मुड़कर घूरते ही जाते; जवान तो जवान, अधेड़ भी। कपड़ों को इधर-उधर से खींच कर वो आश्वस्त होने की कोशिश करती कि बदन का पोर पोर ढका रहे। फिर भी जब लोग उसकी स्कूटी से आगे निकलते हुए नजरों से ही उसके कपड़ों में घुसने लगते तो वो झुँझला कर रह जाती।
और तब ऐसे में एक दिन, एक सड़क के एक चौराहे पर उसे जाने क्या सूझी कि इससे पहले वो आदमी उसे घूरता वो फर्राटे से स्कूटी भगाती हुई उसे, इसे, हर घूरने वाले को ओवरटेक कर गई।
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शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

रफ नोट्स

8 दिसंबर 2017
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उस गाँव में कोई डाकिया नहीं जाता
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तब की बात कहते हैं सरकार, जब गाँव-कस्बों-शहरों की बस्तियों में डाकियों की चहल-पहल रहती थी।... और गाँव की तो पूछो मत सरकार...! हर आँगन में कुछ जोड़ी कान गली की आहट पर लगे रहते थे कि काश आज आ जाए डाकिया, लाए समाचार; समाचार- परदेसी पति के, दूर गए बेटे के, सम्बन्धियों के मरण-परण के।
तब एक दिन अचानक ऐसा सूरज उगा सरकार कि इस गाँव में डाकिये ने आना बंद कर दिया। एक दिन, दो दिन, हफ्ता, महीना... आवे ही नहीं! घर में कोई काम हो गया होगा, बीमार पड़ गया होगा मरगिल्ला-सा तो है ही, ट्रांसफोर हो गया होगा... ये सारे कयास गाँव के चौक, पनघट, गलियों और नई बहुओं के घूँघटों की फुसफुसाहट में उठे और आहिस्ता-आहिस्ता खतम हो गए सरकार। बस, वो दिन और आज का दिन... कोई भी डाकिया नहीं आया।

5 दिसम्बर 2017
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ख्वाबों की किताब का मुड़ा हुआ पन्ना
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"सुनो! तुम ख्वाब बहुत देखते हो।"

"अच्छा, क्यों देखते हो?"

"अच्छा, वो कौनसे ख्वाब हैं जो तुम्हें अक्सर याद आते हैं?"

"सुनो, बताओ ना।"

उसकी आँखें होले से मुसकुराई पर शायद इतना भर कह पाईं, "तुम सवाल बहुत करती हो।"

25 नवंबर 2017
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पंछी थे वे
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ढलती रात ने चाँद से कहा, "अब मैं चलूँ।"
चाँद उदास हो गया। तारों ने ठिठक कर नाचना बंद कर दिया।
चाँद पिघल कर धुँआ होने लगा और तारे रात के पीछे भागे...भागते गए...उड़ने लगे...पंछियों में तब्दील हो गए।

23 नवंबर 2017
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तुम...कहानियों पे कहानियाँ बुनते रहे, और मैं... उन पलों की बारिश में भीगता रहा। चले गए तुम, नहीं सुनी तुमने मेरी कहानी; बड़े छलिया हो।
दिल धड़कने का सबब याद आया
वो तेरी याद थी, अब याद आया

हाल-ए-दिल हम भी सुनाते लेकिन
जब वो रुख़सत हुए तब याद आया

मंगलवार, 18 अप्रैल 2017

उसके लिए

किसी दिन

सूरज की पहली किरण

चाय की चुस्कियों के बीच

अखबार के पहले पन्ने पर

छपी खबर तुम्हें चौंकाएगी

"कल ढलती रात

एक पागल आशिक ने

कत्ल कर डाला

चाँद को"

सोमवार, 10 अप्रैल 2017

चदरिया

जिंदगी साफ़ महीन चादर-सी

धुली धुली हर सुबह

ढक लेती सब कुछ।

सिमटते हुए हर लम्हे को

एक मासूम तबस्सुम देकर

समा लेती खुद में।

अंतहीन तहों में लिपटी

चादर जिंदगी की।

दोहे

दोहे
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टूटा तारा कह गया, साथी से इक बात।

जब तक तन में आग है, जीत न पाए रात।।

पन्ना पन्ना पढ़ गए, जीवन एक किताब।

हर पन्ने पे दर्ज है, एक अबूझ हिसाब।।

इक दूजे को निरखलें, बात करे अब कौन।

क्षण के इस मधुमास में, प्रीत सिखाती मौन।।

पानी पी कौवा उड़ा, जगा गया विश्वास।

कंकर कंकर डालकर, बुझा सकोगे प्यास।।

प्यासी धरती मेघ को, ताक़ रही दिन रात।

करुणाकर अब दीजिये, रिमझिम की सौगात।।

जैसा मुझे लगता है

जैसा मुझे लगता है

वैसा तुम्हें भी लगता है क्या,

खुद से बोलते बोलते

थक कर मूक हो जाना

या फिर जैसे कि शब्द चुक गए हों।

शून्य में देखना ऐसे

जैसे मेले में खोया बालक

सिसकता हुआ देखता है भीड़ को

बहुत देर रोने के बाद।

जीवन छंदहीन कविता की तरह

रूबरू कराता शब्दों से

जो कभी कभी मजाक जान पड़ते हैं।

अल्ल सुबह से देर रात तक

रक्त में कुछ चलता है

छूता है एक एक धमनी एक एक शिरा को,

सोने जा रही ग्रन्थियों को जगाता है रोकता है

सुनो! देखो मैं यहीं हूँ।

सी-साॅ झूले पर बैठे बच्चे

एक पल के लिए पाते हैं समान तल

वरना एक ऊपर तो एक नीचे,

तब भी जुड़ाव तो रहता ही है सदा।

ये जुड़ाव, रक्त की अनचीह्नी आवाज,

शब्दों का चुक जाना-

तुम्हें भी लगता है क्या

जैसा मुझे लगता है।

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बरसात के बाद

थप-थप थप-थप

सौंधी खुशबू घोल जाता है

हर बारिश में कोई

मेरे स्मृति-जगत में।

रात भर करवटें बदल

झाड़ता हूँ पैरों की अंगुलियों पे चिपकी बालुई रेत

पर जाने क्यों हट नहीं पाती पूरी तरह

और मैं यूँही करवटें बदलता रहता हूँ रात भर,

हर बारिश में।