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सोमवार, 18 जनवरी 2016

बत्तू बाबा! इतिहास का क्या करोगे...?

चाय की चुस्की  लेते  ही नरेन को राहत महसूस हुई। हालाँकि चाय में दूध कम था और स्वाद भी कुछ खास नहीं था पर तीन घंटे के लगातार सफर के बाद इस चाय ने खस्ताहाल सड़क पर लगभग उछलती हुई प्राइवेट बस की कमरतोड़ यात्रा के घावों पर मरहम का काम किया। चाय पीते पीते नरेन ने चारों ओर नज़र दौड़ाई। दूर-दूर तक जंगल फैला हुआ था। कई तरह के पेड़, झाड़ियाँ और टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियाँ...। इस लगभग वीरान-सी जगह पर दो बड़े पत्थरों पर एक लकड़ी का पट्टा टिका कर बनाई हुई चाय की थड़ी की बनावट से साफ-साफ पता चल रहा था कि ये कोई पास के गाँव में रहने वाले व्यक्ति की है जो कि दिन में यहाकर घंटों के अंतराल में आने-जाने वाली इक्का-दुक्का बसों के यात्रियों को चाय बेचकर शाम होने तक अपना टीन-टप्पर लेकर घर लौट जाता होगा और रात भर ये दो बड़े पत्थर खड़े-खड़े पास पड़े उबली हुई चाय की पत्ती के ढेर  को एकटक घूरते हुए फिर से दिन के होने और अपने मालिक के आकर चाय की थड़ी सजाने का इंतज़ार करते होंगे। नरेन के चेहरे पर मुसकराहट आ गई। उसने चश्मा उतारा और दूर तक देखा। कुछ पेड़ उसे देखे हुए-से लग रहे थे पर ज़्यादातर शायद उसके लिए नए थे। कमीज के कोने से चश्मे के काँच को पौंछ कर उसने चश्मा फिर से पहन लिया। दूर जाती हुई कच्ची सड़क ना दिखे तो कौन मानेगा कि इसके आगे भी कोई गाँव होगा, बस्ती होगी, उसमें लोग रहते होंगे! तभी कंडक्टर ने 'चलो भाई चलो' की आवाज़ लगाई और एक-एक कर सारे यात्री फिर से बस में घुसने लगे। नरेन भी अंदर आकर धम-से अपनी सीट पर बैठ गया। किसी बुड्ढे की खाँसी की तरह खरखरा कर बस चल पड़ी। नरेन ने सोचा कि उपेन्दु के कहने पर वह इस गाँव के लिए बिना सोचे-समझे निकल तो पड़ा है पर यहाँ आकर क्या उसका कार्य सिद्ध हो पाएगा? ... क्या उसे वो जानकारी मिल पाएगी जो उसके दो वर्ष के परिश्रम को सफल कर सकेगी? नरेन इतिहास विषय का शोधार्थी है। उसने शोध के लिए बहुत ही अद्भुत प्रकरण चुना और वो था 'मध्यकालीन इतिहास में शौर्य साम्राज्य'। जब वह अंतिम वर्ष में था तभी से उसकी जिज्ञासा और कौतूहल 'शौर्य साम्राज्य' के लिए बढ़ने लगे। इतिहास में उपलब्ध तथ्यों और सूत्रों में 'शौर्य साम्राज्य' की भव्यता और महानता के पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध थे, किन्तु इस विशाल साम्राज्य के अंतिम चरण को लेकर कुछ बातें स्पष्ट नहीं थीं। इतिहासकारों में इसको लेकर विवाद हो ऐसा भी नहीं था, क्योंकि उस पर कभी कोई शोध कार्य हुआ ही नहीं था। बस इसी बात ने नरेन को प्रेरित किया और उसने प्रोफेसर जवाहर मिश्र के निर्देशन में इसी विषय पर शोध करने का निश्चय किया था।

उसके गाइड उससे बहुत खुश थे, कारण था उसका कार्य के प्रति निष्ठावान होना। लगभग डेढ़ वर्ष हो गए थे, उसने जाने कितने ग्रंथ खंगडाले और कितने पुस्तकालयों से घंटों ढूँढ कर, कितनी सारी पुस्तकें ला-लाकर पढ़ डाली थीं। उसके काम के जुनून को देखकर ही उसके साथ के दूसरे शोधार्थी उसे 'शौर्य साम्राज्य का भूत' कहते थे। एक दिन युनिवर्सिटी कैंटीन में चाय की चुस्कियाँ लेते हुए उसके दोस्त उपेन्दु ने कहा, "नरेन, मुझे ऐसा लगता है कि शौर्य साम्राज्य के किसी राजा का भूत लग गया है तुझ पर और अब वो तुझे नचा रहा है।" सारे दोस्त ठठा कर हँस पड़े थे। उसी दिन से दोस्त लोग उसे 'शौर्य साम्राज्य का भूत' कहकर छेड़ने लगे थे। पर नरेन केवल मुसकराता रहता। वह देर रात तक बैठ के सिलसिलेवार सब कुछ लिखता, फिर सुबह-सुबह  सारे नोट्स लेकर प्रोफेसर जवाहर मिश्र के घर पहुँच जाता। मिश्रजी एक प्रबुद्ध इतिहासकार थे। दुनिया भर  के जाने कितने विश्वविद्यालयों में उनकी लिखी हुई किताबें पढ़ी-पढ़ाई जाती थीं। नियमित दोनों वेला संध्या-पाठ करना और प्रात:कालीन पूजा के बाद आधा घंटा मौन रहना उनकी दिनचर्या के विशेष अंग थे। लगभग महीना भर पहले की बात है जब इसी क्रम में एक दिन नरेन सुबह-सुबह प्रोफेसर साहब के घर पहुँचा तो वे पूजा करके उठे ही थे और नियमानुसार अपने कमरे में मौन बैठे थे। नरेन को देखते ही उन्होने उसे बैठने का संकेत किया और स्वयं भीतर चले गए। थोड़ी देर बाद राघव काका ट्रे में एक कप चाय और पानी का एक गिलास ले आए। राघव काका उसे अच्छी तरह पहचानने लग गए थे। देखते ही मुसकराना और गर्दन को सहमति-सूचक अंदाज में हिला देना उनकी आदत थी। पाँच साल पहले प्रोफेसर साहब की पत्नी का निधन हो जाने के बाद से उनके दूर के रिश्तेदार राघव काका ही घर का सारा कामकाज और उनकी सेवा-चाकरी संभाले हुए थे। चाय खत्म कर नरेन फिर से अपने नोट्स पलटने लग गया। कुछ देर बाद प्रोफेसर साहब आए। नरेन ने उनके चरण-स्पर्श किए। उन्होने बैठते हुए नरेन के नोट्स उठा लिए और गंभीरता से उन्हें देखने लगे। बहुत देर तक वे पढ़ते रहे फिर बोले, "तुमने बहुत मेहनत की है नरेन, पर तुम जानते ही हो कि इतिहास बारबार पुनर्व्याख्यायित होता है और शोध कार्य की इसमे बड़ी भूमिका होती है। " "जी सर," नरेन प्रोफेसर साहब पर नज़र जमाता हुआ बोला। ऐसा वह तब हर बार करता था जब प्रोफेसर साहब उसके काम को देखकर उसे आगे के लिए गाइड करते थे। "कई बार इतिहास तथ्यों और ग्रन्थों में न मिलकर लोकजीवन और लोक परम्पराओं में बहता हुआ दिखाई देता है। शौर्य साम्राज्य के अंतिम चरण को लेकर तुमने बहुत कुछ सामग्री जुटाई है, पर फिर भी लोकजीवन से यदि कोई संदर्भ सूत्र इससे जुड़ा हुआ मिल जाए तो तुम्हारे काम को विश्वसनीयता का बहुत बड़ा आधार मिल जाएगा," कहकर प्रोफेसर साहब खड़े हो गए। नरेन ने मुसकराते हुए उनके चरण-स्पर्श किए और नोट्स लेकर बाहर निकल गया।

लोकजीवन में 'शौर्य साम्राज्य' कहाँ मिलेगा, अब वह इसी की खोज में लग गया। किताबें, किताबें और किताबें... ढेर सारी किताबें! कहीं कोई छोटा-सा संकेत भर मिल जाए... पर कहीं कुछ नहीं मिला। उपेन्दु भी किसी सेमिनार में पत्र-वाचन के लिए गया हुआ था। ऐसे ही लगभग महीना भर बीत गया। उपेन्दु के लौटते ही वह उसके हॉस्टल चला गया। बातों-बातों में उपेन्दु ने उसे बताया कि बहुत दूर किसी पहाड़ी क्षेत्र में एक गाँव है देवीकोट, वहाँ के आदिवासी हर कार्तिक पूर्णिमा को त्यौहार मनाते हैं और उसमें कोई बाबाजी कथा सुनाते हैं। वो कथा 'शौर्य साम्राज्य' के अंतिम चरण के राजाओं से संबन्धित है। उपेन्दु ने ये भी बताया कि उसे ये बात सेमिनार में उसी क्षेत्र से आए किसी अन्य शोधार्थी ने बताई थी, और ये भी कि वे बाबाजी लगभग दस-पंद्रह वर्षों से ये कथा सुनाते आ रहे हैं। नरेन तो खुशी से उछल पड़ा। उपेन्दु बोला, "यू आर सो लक्की नरेन। उस बंदे ने कहा था कि नेक्स्ट फ्राइडे को देवीकोट में कार्तिक पूर्णिमा का मेला लगेगा। आई थिंक, तुम्हें जाना ही चाहिए।" नरेन ने मुसकराते हुए गर्दन हिलाई और वहाँ जाने का निश्चय कर लिया। रास्ते का पता लगाकर दूसरे ही दिन वह उस गाँव के लिए निकल पड़ा। अब उसे विश्वास होने लगा कि उसकी मेहनत को विश्वसनीयता का प्रामाणिक लोक आधार मिल जाएगा।

बस एक घुमावदार मोड़ से पूरी की पूरी मुड़ कर एक पीली सूखी घास से ढके मैदान में आ खड़ी हुई। तेज गति से घूमने के कारण बस में बैठे लोग असंतुलित होकर इधर-उधर को लहरा गए। नरेन ने कंडक्टर से पूछ कर तसल्ली करी  कि देवीकोट गाँव यही है और बस से उतर गया। कंधे पर बैग लटकाकर चलने को हुआ तब खयाल आया कि जाऊंगा कहाँ? मैदान पार कर वह सीधा-सीधा चलता गया। खेतों के बीच से एक पगडंडी निकल कर वहाँ तक जा रही थी जहाँ एक पहाड़ी नदी बिना शोर किए बह रही थी। नदी के पास ही कुछ लोग खड़े दीख रहे थे। खेतों के पास कुछ बच्चे खेल रहे थे। नरेन ने रुक कर उनकी ओर हाथ हिलाया। बच्चे अपना खेल छोड़ कर उसे देखने लगे। वे आपस में हँसते हुए कुछ बोल रहे थे जिसे नरेन नहीं समझ पाया। बच्चों को पीछे छोड़ नरेन दूर खड़े उन लोगों तक पहुँचा और उनके पास जाकर नमस्कार किया। जवाब सभी ने हाथ जोड़ के दिया। उनके पूछने पर कि 'कौन हो और किसके यहाँ जाना है,' नरेन ने बाबाजी से मिलने की इच्छा बताई। पर वह तब आश्चर्य में पड़ गया जब उन्होंने कहा कि यहाँ तो कोई बाबाजी नहीं रहते। सूरज अपनी ढलान पर लुढ़कने को था। हवा में ठंडक महसूस होने लगी थी। "कहीं उपेन्दु को किसी ने गलत तो नहीं कह दिया," नरेन सोच में पड़ गया। उसने फिर से समझाया, "आपके गाँव में कल कार्तिक पूर्णिमा का मेला लगेगा ना..., उसमें वो बाबाजी एक कथा सुनाते हैं ना..., वही बाबाजी।" "अरे! बत्तू बाबा?.... हाँ-हाँ, कथा सुनाते हैं वो," कहकर एक आदमी मुसकराया और दूसरे लोग भी गर्दन हिलाकर 'हाँ-हाँ' कहने लगे। "पर वो तो कल सुबह ही आएंगे, आप रात में कहाँ जाओगे, बस तो मिलेगी नहीं अब," वही आदमी बोला। आपस में उन लोगों ने जाने क्या बात की फिर उसी आदमी ने आगे बढ़कर उसका हाथ थामा और बोला, "चलो, रात आप मेरे यहाँ रुक जाओ।" नरेन के पास कोई ओर रास्ता भी नहीं था, सो वह आदतन मुसकराया और उसके साथ चल पड़ा।

जाने कैसे टेढ़े-मेढ़े रास्तों से गुज़र कर वो एक ऊँची-सी जगह पर पहुँचे। यहाँ आकर उसे वो झोंपड़ी दिखाई दी जो अब तक नहीं दीख रही थी। सब कुछ बड़ा रहस्यमय और रोमांचक लग रहा था। "मेरा नाम बैजनाथ है साहब। पास के गाँव से पाँच कक्षा पढ़ कर फॉरेस्ट अफसर के यहाँ अर्दली लगा हुआ हूँ। महीने में एक-दो दिन गाँव आता हूँ, बाकी समय साहब के बंगले पर ही ड्यूटी है," नरेन का मेजबान उसे अपना परिचय देता हुआ आगे-आगे चलता जा रहा था। झोंपड़ी पास आ गई थी। बैजनाथ तो उसके छोटे-से दरवाजे में झुककर भीतर घुस गया पर नरेन कुछ पल ठिठका हुआ बाहर ही खड़ा रहा। बैजनाथ लौटकर आया और बोला, "अरे साहब आओ ना अंदर, बाहर क्यों खड़े हो?" "हाँ-हाँ आता हूँ," कहता हुआ नरेन अंदर की ओर चल पड़ा। बैजनाथ ने उसे एक मोटी ऊनी दरी, जो किसी जानवर के बालों से बनी लग रही थी, पर बैठाया और खुद कभी पानी कभी चाय लाता रहा। नरेन को अंदर के कमरे से एक छोटी लड़की के हँसने का स्वर सुनाई दिया। जब उसने उसी ओर गर्दन घुमाई तो एक बच्ची ने गर्दन निकाल कर झाँका और खिलखिलाकर फिर अंदर हो गई। नरेन को लगा शायद ये वही बच्ची है जो उसे खेतों में दिखी थी, या फिर शायद कोई और ही हो। अनजाने आदिवासी भोजन का आनंद लेकर उसने सोने की इच्छा जताई। लगातार तीन दिन की यात्रा से वह बहुत थक गया था। बैजनाथ ने बिस्तर का इंतजाम किया। नरेन तो पड़ते ही सो गया। सुबह जब आँख खुली तो बैजनाथ चाय लेकर खड़ा था। चाय में शायद गुड़ डाला हुआ था इसलिए कुछ अलग-सा स्वाद आ रहा था, पर फिर भी बहुत अच्छा लग रहा था। चाय पीकर नरेन में एकदम ताजगी आ गई। वह जल्दी ही उठकर नहाने-धोने और तैयार होने के उपक्रम में लग गया। "खाना तो आज देवीथान पर पूजा के बाद ही होगा... सारे गाँव का खाना होता है," बैजनाथ ने कहा। "ठीक है, ठीक है," नरेन मुसकराकर बोला। सीढ़ीदार खेतों में से कभी उतरते कभी चढ़ते हुए दोनों चले जा रहे थे। नरेन ने चेहरा ऊपर उठाया तो सूरज आँखों में गड़ गया। पहाड़ी की घाटी वाला हिस्सा धूप में दमक रहा था। अब उसे दूर से आदिवासी वाद्ययंत्रों की घमक सुनाई देने लगी। शहनाई जैसा कोई तीखा स्वर गूँज रहा था पर उसमें शहनाई के साथ-साथ जैसे तारों की झीनी-झीनी मधुर झंकार मिश्रित कर दी गई हो। एक चौड़े चबूतरे पर देवीथान बना हुआ था। मंदिर पर चारों ओर हाथ से बनाई हुई झंडियाँ, फर्रियाँ झूल रही थीं। वहीं पीली धोती और पीला ही कुर्ता पहने एक बाबाजी कुछ लोगों को निर्देश दे रहे थे। नरेन ने चश्मे को थोड़ा आँखों की ओर दबाया और आगे बढ़कर बाबाजी के चरण स्पर्श किए। बाबाजी ने 'खुश रहो भई' कहते हुए उसके कंधों पर हाथ रखा। बैजनाथ ने प्रणाम करते हुए कल की सारी घटना बताई। तभी कुछ लोग आए और बाबाजी से बातें करने लगे। बाबाजी ने मुड़कर नरेन से कहा, "तुम बैठो यहीं," और स्वयं उन लोगों के साथ कहीं चल दिए। लोग मंदिर के आगे चटाइयाँ बिछा रहे थे, कोई अंदर से पीतल और काँसे की थालियों में सजे फल-फूल, बताशे, मिश्री और खीले लेकर आ रहे थे। नरेन कुछ देर तो दूर बैठा ये सब देखते रहा फिर धीरे-धीरे सरक कर उनके बीच आ गया और खुद भी काम में हाथ बंटाने लग गया। तभी उसका ध्यान पहाड़ियों से उतरते लोगों के छोटे-छोटे समूहों पर गया। 'घूँ-घूँ' करते हुए किसी गीत की-सी ध्वनि भी सुनाई दे रही थी जिसमें बीच-बीच में 'होय-होय' की आवाज़ के साथ नगाड़ों और थालियों के बजने की आवाज़ भी आ रही थी। थोड़ी ही देर में दृश्य एकदम साफ दिखाई देने लगा। आदमी, औरतों और बच्चों के झुंड के झुंड देवीथान के सामने वाले चौगान में आ गए। एक अजीब-सा उन्माद पूरे वातावरण में घुला हुआ था। ढ़ोल, नगाड़ों और शहनाई जैसे वाद्ययंत्रों की तीखी धुन घाटी में गूँज रही थी। नरेन भाग के अपने बैग में से कैमरा निकाल लाया और फोटो लेने लगा।

उसने देखा कि सभी परिवारों से आए हुए लोगों की लड़कियों के माथे पर टीका सजा हुआ, गले में लाल पहाड़ी फूलों की माला डाली हुई, और हाथों में एक पीली ध्वजा भी थी। सभी औरतें एक ओर समूह बना कर कुछ गाने लगीं। नरेन ने पूरा ध्यान लगाकर सुनने और समझने की कोशिश की पर उसे हर पंक्ति के अंत में दोहराए जाने वाले 'शिवप्यारी माता होय' के अलावा कुछ भी समझ में नहीं आया।  मालाएँ पहने हुए लड़कियाँ बीच में खड़ी हो गईं और स्त्री-पुरुषों ने चारों ओर घेरा बनाकर नाचना शुरू किया। नगाड़े की ताल बढ़ती ही जा रही थी। बीच-बीच में 'शिवप्यारी माता की जय हो' की जोरदार आवाज़ के साथ सभी लोग दोनों हाथ जोड़कर सर झुकाकर प्रणाम कर रहे थे। तभी बाबाजी वहाँ आए। उनके साथ लोग कुछ टोकरों में फूल-पत्ते भरकर लाए थे। बाबाजी ने एक लोटे से ज़मीन पर जल छिड़का और फिर वहाँ फूल-पत्ते बिछाए। फिर उन पर लड़कियों  को बैठाया गया। सबसे पहले बाबाजी ने मंदिर से आरती का दीया लाकर उन सभी लड़कियों की पूजा की, फिर बारी-बारी से सब लोगों ने आकर उन लड़कियों के चरण स्पर्श कर प्रणाम किया। नरेन ने देखा कई लोग प्रणाम के साथ ही रोते हुए कुछ बोल भी रहे थे, दोनों हाथ फैलाकर जैसे कुछ माँग रहे हों, मनौती जैसा ही कुछ। लड़कियों के पास ही एक चौकी पर बाबाजी बैठ गए और सामने बिछी चटाइयों पर गाँव के स्त्री-पुरुष बैठने लगे। नरेन भी बाबाजी के दायीं ओर पड़ी एक चटाई को सरका कर बैठ गया। बीच-बीच में वह अपने कैमरे से फोटो भी लेता जा रहा था। उसने देखा की सभी स्त्री-पुरुषों ने अपने हाथों में कुछ फूल-पत्ते दबा रखे हैं। बाबाजी ने जयकारा लगाया, 'शिवप्यारी माता की...,' सभी ने जयघोष किया 'जय हो।'

"तो भई, ये कथा है शिवप्यारी माता की," बाबाजी ने कमर पूरी झुकाई ओर कहना शुरू किया। "बहुत बरस पहले की बात है। लाल पहाड़ की पूरी तराई में महाराजा शौर्य सिंह का राज था। उनकी प्रजा बहुत सुखी थी। भई राजा हों तो...,"...... "शौर्य सिंह जैसे," सारे लोग एक साथ बोले। 'हरे नम,' कहते हुए बाबाजी ने कथा आगे बढ़ाई, "भई महाराज को अपनी प्रजा की सारी चिंता रहती, सारा समय प्रजा की ही सोचते। ऐसे ही महाराज के बड़े कंवर चंद्रभान सिंह। अपने पिताजी की आशीष  लेकर राजगद्दी संभाली और वैसा ही कामकाज किया। दूर-दूर देशों के राजा आते और चंद्रभान जी की मित्रता प्राप्त कर धन्य हो जाते। भई जो देखो, वो सुविधा राज में। बड़े-बड़े ज्ञानीजनों को अपने राज में बुलाकर प्रजा के पढ़ने के लिए गुरुकुल खोल दिए और नामी-गिरामी वैद्यों को बुलाकर राज के गाँव-गाँव में भेज दिया अपनी प्रजा की खातिर। तो भई बेटा हों तो....," "चंद्रभान जैसे," सभी ने ज़ोर से कहा। 'हरे नम' कहते हुए बाबाजी पूरी कमर को अपने घुटनों पर झुकाते हुए आगे बोले, "चंद्रभान के बाद वीरप्रताप सिंह और वीरप्रताप के बाद हुए राजशेखर सिंह, एक से बढ़कर एक प्रतापी राजा। राजशेखर के दो कंवर हुए ऋद्धिराज सिंह और सिद्धिराज सिंह। महाराज के सर जाने कौनसा पाप चढ़ा जो उनके दोनों कंवर सदा आपस में लड़ते ही रहें। बैर बढ़ा तो वो बढ़ा कि दोनों एक-दूजे के खून के प्यासे हो गए। तो भई बैर से बँटवारा भला, महाराज ने सोची। सो, दोनों भाइयों में राज का बँटवारा कर दिया। महाराज तो महारानी के साथ कैलाश पर्वत सिधा गए, सो वहीं शिव समाधि में लीन हो गए। इधर ऋद्धिराज और सिद्धिराज में रोज की लड़ाई। आश्विन मास की एक ठंडी रात में ऋद्धिराज ने सिद्धिराज के गढ़ को चारों ओर से घेर लिया। ऋद्धिराज की सेना बहुत बड़ी थी। सिद्धिराज समझ गए कि जो बाहर से कोई मदद मिले तो बचाव हो सके वरना तो हार तय है। दिन बीते, हफ़्ते बीते, महीना बीता। गढ़ के अंदर का सारा अनाज, खाने-पीने का सामान खत्म हो गया। प्रजा त्राहि-त्राहि करने लगी। अब सिद्धिराज ने सोच लिया कि लड़ कर मरने का समय आ गया। तो भई उन्होने अपने दरबारियों से बात की। सब जानते थे कि जो लड़ाई हुई तो पूरा कुनबा खत्म होगा, कोई नाम लेवा न बचेगा, पर दूजा कोई रस्ता भी न था। सो तय हो गया कि प्रभात बेला में गढ़ के फाटक खोल देंगे और युद्ध करेंगे।"

नरेन पल-पल रोमांचित होता हुआ सुनता जा रहा था। सब कुछ अद्भुत घट रहा था। शौर्य साम्राज्य कि कथा इस तरह लोक कथाओं का अंग होगी, उसे इसका अनुमान तक ना था।
"हरे नम, कातिक पूनों की रात थी। आकाश में पूरा चाँद निकला हुआ था। राजा सिद्धिराज सिंह महल की छत पर खड़े थे। तभी चाकर ने आकर खबर दी की महाराज बधाई हो, महारानी जी ने कन्या रत्न को जन्म दिया है। महाराज एक पल को खुश हुए फिर उदास हो गए। सोचा, भई क्या तकदीर लेकर आई है ये कन्या! आज पैदा हुई और कल ही सारा परिवार खत्म। तभी जोरदार काली, घघराती आँधी उठी। छबड़-छबड़ करके नभ को फाड़ने लगी। पूरा आसमान काली आँधी में डूब गया। चाँद-तारे सब छुप गए। सिद्धिराज घबरा गए। उनके मन में आया, हे प्रभु! ये कैसा अपशकुन है....! क्या दिखाना चाह रहे हो....! ये सर्वनाश की आँधी है....! काल तो गढ़ के बाहर खड़ा बस सूरज निकलने की बाट जोह रहा है," कहते हुए बाबाजी ने लंबा आलाप लेकर गाना शुरू किया-

हे.... कातिक पूनों की आधी रात होय...
हे.... काली घघराती आँधी साथ होय...
शिवप्यारी माता का औतार भयो होय...

नरेन भोंचक्का-सा पूरे दृश्य को कभी इधर से तो कभी उधर से देख रहा था। भजन की तीसरी पंक्ति पर सारे के सारे वाद्ययंत्र एक साथ घनघना उठे और सभी स्त्री-पुरुष खड़े होकर ज़ोर-ज़ोर से गाते हुए नाचने लगे। "शिवप्यारी माता की....," बाबाजी ने जयकारा लगाया। सभी लोग एक साथ बोले, "जय हो, जय हो।"
"हरे नम, तो भई राजा सिद्धिराज के घर उस रात शिवप्यारी माता का अवतार हुआ। जनम देकर माँ रो रही, दूर खड़ा बाप रो रहा, नाते-रिश्तेदार साँसे भर रहे। पर माता मन ही मन मुसकरा रही। उधर गढ़ के बाहर ऋद्धिराज भी प्रकृति का ये ताण्डव देख रहे। गुप्तचर ने आकर समाचार दिया, राजा सिद्धिराज के यहाँ राजकंवरी का जन्म हुआ है। सभी दरबारी हँसने लगे, कहने लगे, राजकंवरी नहीं परिवार का काल कहो। माता ने किया चमत्कार, ऋद्धिराज का मन पलटा। वे बोले, ये तो अनर्थ हो जाएगा, एक कन्या के सर युगों-युगों तक ये कलंक रहेगा। मेरे तो पूरे वंश का तारण ना हो सकेगा, प्रेत बनकर भटकेंगे सब। तुरंत हुकम दिया सैनिक को कि जाओ सिद्धिराज को संदेसा दो के हम मिलना चाहते हैं। भाई से भाई मिले। सिद्धिराज बोले, रात भर भी नहीं रुक सकते तो सीधे कह दिया होता, हम गढ़ का फाटक खोल रात में ही लड़कर अपनी जान दे देते। ऋद्धिराज बोले, नहीं भाई, अब युद्ध नहीं करना। तुम्हारे घर राजकंवरी हुई है, बधाई देनी है। देखते ही देखते ऋद्धिराज के चाकर फल, फूल, मिठाई, जेवर, कपड़ों के उपहारों से भरे सैकड़ों सोने-चाँदी के थाल हाथों में लिए महल में आने लगे। सिद्धिराज की आँखों में पानी भर आया। भाई से भाई गले मिल गए। सिद्धिराज भरे कंठ से बोले, भाई आप सचमुच बड़े ही हैं। पूरे गढ़ में शंख, घंटे और थालियों की आवाज़ गूँजने लगी। दूसरे दिन भरे दरबार में दोनों भाई एक साथ बैठे। ऋद्धिराज ने घोषणा की कि आज से राजकंवरी दोनों राज्यों की राजकंवरी होगी। बरसों का बैर पल भर में मिटा। शिवप्यारी माता ज्यों-ज्यों बड़ी होती गईं, भई त्यों-त्यों चमत्कार पे चमत्कार होते गए। दुखिया के सर पे हाथ रख दे तो उसका दुख-दारिद दूर हो जाए, खेतों में पैर धर दे  तो धरती माँ चौगुनी फसल खड़ी कर दे, गाय-भैंस देखने भर से दूध का अमृत छलकाने लग जावें। रिद्धिराज और सिद्धिराज दोनों राजाओं के राज में कंचन बरसने लगा, ऐसी माता की कृपा हुई। दूर-दूर देशों से लोगों की भीड़ की भीड़ माता के दरसन को आने लगी। सभी को धन्य करके माता पंद्रह बरस की उम्र में एक दिन गढ़ के तहखाने में बने मंदिर में गई, सो वहीं समाधि में लीन हो गईं। उसी रात माता ने प्रगट होकर आकाशवाणी करी कि आज से में हर कन्या के रूप में जनम लूँगी, जो कोई मेरा मान-ध्यान करेगा, उसका में खुद ध्यान रखूंगी और जो तनिक भी अपमान हुआ तो मेरा कोप लगेगा," कथा पूरी करते हुए बाबाजी ने खड़े होकर फिर से शिवप्यारी माता का जयकारा लगाया। सभी लोगों ने अपने हाथों में लिए फूल-पत्तों को जय-जयकार के साथ सामने बैठी कन्याओं की ओर उछाल दिया।

नरेन लगभग चेतना शून्य-सा सब कुछ देख-सुन रहा था। अब शायद सामुहिक भोज की तैयारी होने लगी। बत्तू बाबा उठ कर मंदिर के पीछे बनी एक झोंपड़ी में चले गए थे। नरेन भी उनके पीछे-पीछे आया। बाबाजी लेते हुए थे, शायद थक गए होंगे; उसे देखते ही उठ बैठे। "तुम भी भोजन करलो भई," बाबाजी ने कहा।
"बाबाजी, ये सब क्या है....! ....... आप क्यों ऐसा कर रहे हैं?" नरेन बोला।
"क्या हुआ?..... किसकी बात कर रहे हो?"
"यही, जो शौर्य साम्राज्य की कथा आप सुना रहे हो....."
"शौर्य साम्राज्य की नहीं, शिवप्यारी माता की कथा।"
"झूठ बोलते हैं आप। इन भोले-भाले अनपढ़ आदिवासियों को झूठी कथा सुनाकर ठग रहे हैं आप," नरेन ने आवेश में आकर कहा। बाबाजी कुछ पल को सकपका गए फिर बोले, "मैंने कोई झूठ नहीं कहा और ना ही मैं इनसे कुछ लेता हूँ।"
"झूठ! एकदम झूठ! मैं इतिहास जानता हूँ। सच तो ये है कि वो युद्ध हुआ था। उस रात सिद्धिराज के परिवार की औरतें गुप्त द्वार से भाग निकलीं और दूसरे दिन भयंकर युद्ध हुआ, जिसमें सिद्धिराज अपने सारे बेटों और सेना सहित मारे गए। यहाँ तक की कई वर्षों तक उन औरतों ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन काले वस्त्र धारण कर शोक मनाया," कहकर नरेन ने पूरे आत्मविश्वास और कुछ-कुछ दंभ के साथ बाबाजी को देखा।
बाबाजी शांतचित्त होकर नरेन को सुन रहे थे। "मैं नहीं जानता तुम कौन हो और यहाँ क्यों आए हो, बस मैं इतना जानता हूँ कि मैं जो कह रहा हूँ वो सही है और जो कर रहा हूँ वो भी सही है," बाबाजी नरेन को एकटक देखते हुए बोले।
नरेन पलटकर एक विषय-विशेषज्ञ की हैसियत से बोला, "आपके जो मन में आए वो करो, लेकिन बत्तू बाबा! इतिहास का क्या करोगे...?... उसे तो आप बदल नहीं सकते....आप शायद नहीं जानते हैं.....ये लोग भी नहीं जानते हैं, पर मैं जानता हूँ.... मैं वो पहला व्यक्ति हूँ जिसने इस पर शोध कार्य किया है।"
"पहला नहीं, दूसरा...," बत्तू बाबा शून्य में देखते हुए बोले। "हाँ, तुम शायद दूसरे व्यक्ति होगे, क्योंकि पहला व्यक्ति मैं हूँ। बरसों पहले मैंने भी इसी विषय पर शोध किया था। जैसे ही मैं इस तथ्य तक पहुँचा तो मेरे मन ने इसे स्वीकार करने से मना कर दिया। मेरा शोध कार्य पुस्तक के रूप में प्रकाशित होकर दूर-दूर तक उस अबोध कन्या को कलंक के रूप में प्रचारित करता। मैं पागल हो गया। वो मासूम कन्या मेरे सामने खड़ी हो गई कि मेरा क्या अपराध था, वो सब तो मर-खप गए, मुझे आज तक अपमानित क्यों होना पड़ रहा है? मैंने सारे कागजों को आग लगा दी, तब मुझे चैन पड़ा। और फिर जाने कैसे भटकता-भटकता मैं इन आदिवासियों के बीच आ गया। रोज़ इन आदिवासियों को राजा-महाराजाओं की बातें सुनाता था, सो इन्होने ही नाम धर दिया 'बत्तू बाबा'। मुझे लगा जो गलती इतिहास में हुई, उसे मैं सुधार सकता हूँ। बातों ही बातों में बन गई शिवप्यारी माता की बात। बात ने इतिहास बदला और कुछ बेहतर किया। अब सुकून है। गाँव में कन्याओं का मान-सम्मान देखता हूँ तो खुशी होती है। नहीं चाहिए मुझे इतिहास के वो काले पन्ने, जो मेरे आज और आने वाले कल पर मनहूसियत का साया बन जाएँ।" कुछ पल बाबाजी आवेश में काँपते रहे फिर कुछ लोगों की आवाज़ सुनकर बाहर चले गए।

नरेन को सब कुछ घूमता हुआ-सा नज़र आया। वह सिर्फ सुन रहा था। पैरों के नीचे से धरती जैसे बहुत तेज़ी से सरक रही हो। ढोल, नगाड़े और शंख की तीखी ध्वनि के बहाव में नशे में झूमता हुआ-सा, कुछ-कुछ सन्निपात-ज्वर के रोगी-सा बड़बड़ाता वो कहाँ का कहाँ चलता रहा। जाने कौन-कौन लोग उसका हाथ पकड़ कर क्या-क्या कहते रहे, उसे कुछ पता ही नहीं चला। और फिर अचानक उसका पूरा शरीर झटके से आगे को झुका, तब उसने चौंक कर चारों ओर देखा। वह बस में बैठा था और कंडक्टर बस के ड्राईवर को तेज़ ब्रेक लगाने पर गाली दे रहा था। उसने अपना बैग संभाला। बैग में उसके थीसिस-नोट्स, कैमरा और उसका सामान सुरक्षित था। उसके सर में तीव्र पीड़ा हो रही थी। खिड़की से बाहर देखते हुए मन बहलाने के लिए वो कुछ गुनगुनाने लगा। काफी देर बाद उसे खयाल आया कि वो क्या गुनगुना रहा है-
हे......कातिक पूनों की आधी रात होय...
हे..... काली घघराती आँधी साथ होय....
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शुक्रवार, 20 नवंबर 2015

पावन स्पर्श



नीरजा फिर उठी और उसने बाहर वाले कमरे में झाँका। उसे लगा कि अब तो पाँच बज ही गए होंगे। पिछली बार जब उसने देखा था तो पच्चीस मिनट कम थे। उसके बाद तो वह कितनी ही देर बीच वाले कमरे में बैठी रही थी। बाहर से आती हुई घर्रर्रर्रर्रर्र... की आवाज़ को सुनती रही। पडौस में किसी का मकान बन रहा था। शायद पत्थरों की घिसाई की मशीन से आने वाली आवाज़ थी ये। परसों वह खाना बनाने के बाद यूँही ज़रा दरवाजे तक गई थी। निरुद्देश्य दरवाजा खोल गली में देखने लगी। दाँयी ओर खाली पड़े प्लॉट में मज़दूर मुँह और नाक पर पट्टी बाँधे पत्थरों की घिसाई कर रहा था। मशीन से घर्रर्रर्रर्रर्र... की आवाज़ और चारों ओर पत्थर का पाउडर बिखर रहा था। नीरजा को वो आवाज़ सम्मोहित-सी करती रही। इंसान चाहे तो पत्थरों के स्वरूप में भी परिवर्तन करदे। कुछ देर बाद खुद ही झेंपती हुई उस सम्मोहन से बाहर निकल, दरवाजा बंद कर, अंदर आ गई। तीन बार उठ कर घड़ी देख चुकी थी। एक खयाल ये भी आया कि घड़ी का सैल तो कमजोर नहीं हो गया, फिर खुद ही ने उसे खारिज भी किया कि इतनी जल्दी तो नहीं होता। नीरजा की दिनचर्या इस घड़ी से संचालित होती थी। शादी के बारह साल बाद इस घड़ी से उसका ऐसा गठबंधन हो जाएगा उसने सोचा नहीं था।
एक सफल वकील राजीव को पति के रूप में पाकर उसने बहुत खुशी से अपनी गृहस्थी की यात्रा शुरू की थी। शादी से पहले राजीव जब उसे देखने आए तो उसने बड़े उत्साह से अपनी डायरी राजीव को दिखाई।
“अरे वाह! आप कविताएँ लिखती हैं!”
“हाँ, कॉलेज की मैग्ज़ीन में भी छपी हैं।”
“गुड,गुड,गुड...ये तो बहुत अच्छा है। कब लिखती हैं ये आप? ... मेरा मतलब इतना समय मिल जाता है आपको?”
“समय का क्या है, मिल ही जाता है।”
राजीव का उसकी कविताओं में इस तरह रुचि दिखाना उसे अच्छा लगा। शादी के बाद अपनी डायरी को सँभाल कर अपने साथ ले आई थी वो। जब मन करता कुछ लिखती, फिर इंतज़ार करती शाम का। चाय बनाते-बनाते उसके पैर थिरकते रहते, होठ कोई गीत गुनगुनाते रहते। चाय का प्याला राजीव को थमा कर खुद भी अपनी चाय लेकर बैठ जाती।
“आज मैंने एक कविता लिखी है, सुनाऊँ?” मुसकराते हुए वह राजीव से कहती। राजीव लंबी हूँ... करते हुए कहता, “गैस आ गई क्या? ...दिन में फोन कर दिया था मैंने।”
“हाँ, आ गई। ...सुनाऊँ कविता?” नीरजा कप नीचे रखते हुए कहती।
“यार, तो फोन तो करना था कि आ गई... मैं वहाँ परेशान हो रहा था,” राजीव चिढ़ता हुआ-सा कहता। एक लंबी चुप्पी पसर जाती। दिन पर दिन यह चुप्पी पसरती ही चली गई। चाय के प्यालों से खाने की थाली तक होते हुए घर के कोने-कोने में फैलती चली गई यही चुप्पी। कामकाज का दबाव और उसके कारण राजीव की व्यस्तता बढ़ती जा रही थी।
“अब लाइट ऑफ करके सो जाओ ना, बहुत रात हो गई है,” राजीव करवट बदल कर बड़बड़ाता।
“बस थोड़ी देर और, फिर सोती हूँ,” नीरजा अपनी डायरी में डूबी हुई बोलती।
झल्ला कर राजीव उठ बैठता, “तुम्हारे पास तो दिन भर फालतू समय बहुत है, लिखती रहना, अब मुझे सोने दो।” कमरे में अँधेरा... अँधेरा में छटपटाती नीरजा... फालतू समय... फालतू काम! रात का अँधेरा नीरजा के मन में घुस जाता और तब उसे अचानक लगता कि कुछ फिसल रहा है... क्या?... ठीक से नहीं दीख रहा पर फिसल ज़रूर रहा है... फालतू काम! रात, सुबह, दोपहर, शाम जाने कितनी बार उसने यही महसूस किया। धीरे-धीरे जाने कब सब कुछ बदलता चला गया। फिसलती हुई जिंदगी को जमा कर पकड़े रखने के क्रम में कब वह इस घड़ी से बंध गई, पता ही नहीं चला। हर काम के लिए घड़ी में एक समय नियत था और घड़ी के काँटों के हर कोण पर उसकी दिनचर्या सधी हुई थी।
नीरजा फिर उठी और बाहर वाले कमरे तक आई। ओहो! ... पाँच-बीस! घड़ी देखकर वह बड़बड़ाई। जल्दी से उसने थैला पकड़ा और सब्जी लेने निकल गई। पाँच बजते ही वह सब्जी लेने जाया करती थी। तेज़ कदमों से गली पार कर वह सड़क पर आई। सड़क के किनारे-किनारे चलते हुए सोचने लगी कि क्या-क्या लेना है। ... आटे की चक्की... प्रॉपर्टी डीलर का ऑफिस... ऑटो रिपेयर सेंटर... सब के बाहर हमेशा जैसी हलचल थी। इस समय करीब-करीब वही लोग दिखाई पड़ते थे जो हमेशा दीखते थे। नीरजा इन सबके प्रति उदासीन भाव से चलती जाती थी। शायद नित्य के एक-से दृश्य ने उसे उन सबके प्रति उदासीन बना दिया था। कुछ ही देर में वह सड़क पार कर सब्जी भंडार तक पहुँच गई। सब्जी वाला अपने चिर परिचित अंदाज में मुसकराया। हँसते समय उसके दोनों गाल ऊपर की ओर उठ जाते थे। नीरजा को हर बार उसका मुसकराता चेहरा अपने ड्राइंग रूम में पड़े लाफिंग बुद्धा की मूर्ति जैसा जान पड़ता था। बिना कुछ बोले वह सब्जियाँ छाँटने लगी। पास में ही एक बुजुर्ग अपना थैला लेकर निकल रहे थे। औपचारिकतावश किसी ने उनसे पूछा होगा, “और अंकल, क्या हालचाल हैं?” जवाब में उन्होंने एक शानदार ठहाका लगाया और बोले-
सुबह धकेली हो गई शाम
चलता है जीवन अविराम
सब्जी तुलवाते हुए नीरजा ने चौंक कर पीछे देखा। हल्के हरे रंग का लंबा सूती कुर्ता और सफ़ेद पायजामा पहने एक पकी उम्र का आदमी नज़र आया। वह अब भी अपने चेहरे के साथ-साथ पूरे शरीर को दाएँ-बाएँ झुलाते हुए बराबर हँसे जा रहे थे। आज से पहले नीरजा ने कभी उन्हें यहाँ नहीं देखा था। एक बार उसने सोचा कि सब्जी वाले से पूछे उनके बारे में, फिर उसने कुछ सोच कर ऐसा नहीं किया। “ज़रा जल्दी करो ना भैया, कितने पैसे हुए?” सब्जी वाले को कहती हुई नीरजा एक बार फिर पीछे मुड़ कर देखने लगी। वो आदमी लंबे-लंबे डग भरता हुआ दुकान से बाहर जा रहा था। सब्जी का हिसाब करके नीरजा बाहर को लपकी। अचानक सब्जी वाले ने आवाज़ दी, “मैडम, अपना थैला तो ले जाइए।” नीरजा को बड़ा अटपटा लगा। वह खिसियाते हुए मुसकराई और सब्जी का थैला लेकर बाहर निकली। सड़क पार करके एक बार फिर आगे तक देखा। वो बहुत आगे चल रहे थे। नीरजा ने अपनी चाल तेज़ की पर वो महादेव आटा-चक्की के पास वाली गली में मुड़कर गायब हो गए। नीरजा परेशान हो गई। “ऐसे अचानक कहाँ चले गए वो!... गायब ही हो गए!... पर मुझे उनसे क्या करना था!... बात करनी थी!... नहीं, कुछ नहीं!...” विचारों में डूबती-तैरती नीरजा कब घर पहुँच गई, पता ही नहीं चला। सब्जी काटते हुए, खाना बनाते हुए, .... और शायद बर्तन धोते हुए भी उसने दोहराया था- “सुबह धकेली हो गई शाम, चलता है जीवन अविराम।” एक-दो बार उसने झटक कर इसे अपने से दूर भी करना चाहा पर फिर थोड़ी देर बाद इन्हीं पंक्तियों को दोहराने लग गई। रसोई साफ कर नीरजा बाहर वाले कमरे में आई। रात के नौ-तीस हो गए थे। लगभग इसी समय उसका सारा काम खत्म हो जाता था। राजीव लॉबी में ही पसरे हुए टीवी चैनलों को घुमाते रहते या कभी अपने कमरे में बैठ फाइलों से उलझ रहे होते। आधा घंटा नीरजा वहीं लेटी हुई इंतज़ार करती कि राजीव कॉफी माँगे तो वह बनाकर दे। जैसे ही घड़ी के काँटे रात के दस बजने का संकेत करते नीरजा उठ बैठती और सोने के कमरे में चल देती; पर आज जाने क्यूँ वह घड़ी के उस सख्त अनुशासन को तोड़, दस के पहले ही सोने के कमरे में चली गई। इधर-उधर अलमारियों में कुछ ढूँढने लगी। थोड़ी देर बाद झुँझला कर बैठ गई। “कहाँ रखदी होगी डायरी...!” अलमारियों की ओर देखते हुए खुद से ही बोली। एक बार फिर उठी और अलमारी में रखे सामान को इधर-उधर करने लगी। “क्या देख रही हो?” राजीव ने कमरे में घुसते हुए पूछा। “नहीं, कुछ खास नहीं... ऐसे ही ज़रा...,” नीरजा चौंक कर इस तरह बोली जैसे उसकी चोरी पकड़ी गई हो। लाइट ऑफ करके वह भी लेट गई। सोने की कोशिश में उसके भीतर कुछ जागने लगा था। कानों में किसी रहस्यमयी संगीत की तरह वही पंक्तियाँ गूँज रही थी। नीरजा को लगा कि वह किसी बहुत बड़े आँगन में आ खड़ी हुई है और उन पंक्तियों के सारे शब्द छोटे-छोटे बच्चों की तरह किलक-किलक कर उसे बुला रहे हैं- “आओ, आओ, पकड़ो हमें।” नीरजा भी चंचलता से उछल कर उनके पीछे भागने लगी। एक को, दूसरे को, तीसरे को... सभी को पकड़ने की कोशिश करने लगी। क्या-क्या होता रहा उस रात नीरजा को ठीक-ठीक कुछ याद नहीं रहा। उसे कई तरह के सतरंगी शब्द अपने पास से गुजरते हुए महसूस हुए। शायद वह कई बार उठी भी थी और उठ कर कमरे में घूमी भी थी। आज लंबे समय बाद रात नहीं गुज़री, बल्कि वह खुद रात के पहाड़ पर चढ़कर भोर की नन्ही-सी किरण तक पहुँच गई थी।
सुबह चाय बनाकर कुछ भागते हुए कदमों से सोने के कमरे में आकर नीरजा कुछ तलाशने लगी। टेपरिकॉर्डर के पास पड़ी मेडिकल स्लिप के पीछे लिखी हुई पंक्तियाँ अब उसके हाथ में थी-
सुबह धकेली हो गई शाम
चलता है जीवन अविराम
उत्तर नहीं यहाँ कोई भी
प्रश्न खड़े हैं यहाँ तमाम
रात को जाने कब वह ये लिख गई थी। उसे सब याद आया कि कैसे उसने लिखने के लिए कुछ तलाशा, कुछ ना मिला तो उपाध्याय जी की बेटी की शादी के कार्ड के पीछे लिखने की कोशिश की, कागज़ चिकना होने के कारण नहीं लिखा गया, और तब दिखी ये मेडिकल स्लिप, और इसी के पीछे उसने कुछ लिख डाला। इस समय इन पंक्तियों को वह इतने ही प्यार से निहार रही थी जैसे कोई माँ अपने गोदी के बच्चे को ममता से भर कर बार-बार देखती है। उसे यूँ लग रहा था जैसे मन रुई के फाहे-सा हल्का हो गया हो, या बरसों गहन मौन तपस्या में रहकर किसी तपस्वी ने जैसे कुछ शब्दों से अपना मौन तोड़ा हो और उन शब्दों की अद्भुत प्रतिध्वनि जैसे दिशाओं पर कोई पवित्र छिड़काव कर रही हो। नीरजा को बहुत अच्छा लग रहा था पर साथ ही मन जैसे उलझता जा रहा हो कि अब?... अब क्या करूँ?”
दिन के सारे काम पानी पर बहते हुए-से गुजरते जा रहे थे। आज तो पक्का घड़ी खराब हो ही गई, ऐसा उसे लगा, क्योंकि पाँच बज ही नहीं रहे थे। दिन का काम निबटा कर ज़रा देर बैठी। कुछ देर सोचती रही फिर अचानक उठ बैठी और अंदर के कमरे में गई। अलमारियों से सारा सामान तसल्ली से उतार कर नीचे फैलाने लगी। नीचे, बहुत नीचे- दबी हुई मिली उसे अपनी डायरी। डायरी को पाकर उसे ऐसा लगा जैसे बरसों बाद बचपन की सखियाँ अचानक से आमने-सामने हो गई हों। एक साँस में सारे पेज पलटती गई। अतीत के ना जाने कितने ही पल डायरी में टंगे स्याही-बिन्दुओं के सहारे से उभरने लगे। अलमारी को व्यवस्थित कर बाहर वाले कमरे में आई। “अरे! ये क्या!... पाँच-दस हो गए!” नीरजा बुदबुदाई। इस समय का भी कुछ पता ही नहीं चलता, कब किसी चंचल हिरनौटे-सा भागने लगता है और कब कछुए की चाल पकड़ लेता है। वह जल्दी से गली पार कर सब्जी की दुकान को चल पड़ी। सड़क के दृश्य लगभग रोज़ के-से थे पर फिर भी उसे हवाओं में कुछ नयापन लगा। खुद में भी वह एक ताजगी का एहसास कर रही थी। कुछ नया था आज उसके पास। सब्जी लेते समय नीरजा बार-बार सड़क की ओर देख रही थी। चलते-चलते सब्जी वाले से पूछ ही लिया, “ भैया, कल वो अंकल आए थे ना, लंबे-से, वो कौन हैं, कहाँ रहते हैं?” सब्जी वाले कुछ देर सोचा फिर कहा, हाँ-हाँ आप शायद मनोहर अंकल का कह रही हैं, वे इधर ही आटा-चक्की के पीछे की तरफ कहीं रहते हैं।” अच्छा-अच्छा कहकर नीरजा बाहर को चली। सड़क पार करके दूसरी ओर आ गई और किनारे-किनारे चलने लगी। तभी उसकी नज़र पड़ी सामने से आते हुए उन्हीं बुजुर्ग पर। आज भी वो कल की ही तरह ढीला और लंबा हल्के हरे रंग का कुर्ता और सफ़ेद पायजामा पहने हुए थे। नीरजा वहीं ठहर गई।
“नमस्ते अंकल,” नीरजा ने झुकते हुए कहा।
“नमस्ते जी... आपको पहचाना नहीं बेटा,” बुजुर्ग कुछ संकोच से बोले।
“हम इधर दो गली छोड़ कर रहते हैं। कल शाम सब्जी वाले के यहाँ आपकी कविता की वो दो लाइनें सुनी थीं... बहुत अच्छी लगीं,” नीरजा एक साँस में कह गई।
“कविता...? ओह! अच्छा-अच्छा वो...,” कहते हुए उन्होंने वैसा ही शानदार ठहाका लगाया और देर तक उनका शरीर दाएँ-बाएँ झूलता रहा। नीरजा को अपने उतावलेपन पर खुद अचरज हो रहा था। “अंकल वो कविता आपने लिखी है?” उसने पूछा। कुछ देर के लिए वो बुजुर्ग एक रहस्यमयी मुसकान के साथ उसे देखते रहे, फिर बोले, “आप भी कविता लिखती हैं?” उनका यह पूछना एक ओर जहाँ प्रश्न था वहीं दूसरी ओर ये ध्वनि-संकेत भी था कि इसका उत्तर हाँ है।
“नहीं-नहीं... मैं... हाँ, ऐसे ही कभी-कभी...,” नीरजा अचकचाते हुए बोली।
“नहीं भी और हाँ भी! तब तो आप पक्का कविता लिखती ही हैं,” कहकर बुजुर्ग ने फिर वैसा ही ठहाका लगाया।
नीरजा को अब खुद अपनी हालत पर तरस आने लगा था। जब मन के पर्दे उठने लगते हैं तो भीतर छुपे दृश्य सामने वाले को दिखाई देने लगते हैं और बड़े यत्न से ढक के रखे गए अंतस-चित्रों का यूँ अचानक से किसी के सामने बेनकाब हो जाना घबराहट और भय पैदा कर ही देते हैं। नीरजा ने प्रयत्नपूर्वक मुसकरा कर कहा, “अंकल, मैंने उसी कविता को कुछ आगे बढ़ाया है।”
“अरे वाह! सुनाओ तो,” कहते हुए वृद्ध की आँखों में बालक-सी जिज्ञासा उभर आई। नीरजा ने एक नज़र चारों ओर देखा फिर सुनाया-
सुबह धकेली हो गई शाम
चलता है जीवन अविराम
उत्तर नहीं यहाँ कोई भी
प्रश्न खड़े हैं यहाँ तमाम
उन बुजुर्ग ने तुरंत नीरजा के सर पर हाथ रख दिया, “सच में बेटा, आप तो बहुत अच्छा लिखती हैं।” नीरजा ने सब्जी का थैला एक हाथ से दूसरे हाथ में लेते हुए कहा, “बहुत पहले लिखा करती थी, ये तो आज वर्षों बाद लिखा है अंकल। शादी से पहले मम्मी-पापा को ये सब अच्छा लगता था, फ्रेंड-सर्किल भी वैसा ही था... पर अब यहाँ वैसा माहौल ही नहीं है,” कहकर नीरजा थोड़ा झिझकी और एक पल के लिए उसके मन में आया कि कहीं उसने कुछ गलत तो नहीं कह दिया।
बुजुर्ग ने किसी तरह अपनी हँसी रोकते हुए कहा, “मतलब आप कविता की धक्कामार गाड़ी हो।” नीरजा की आँखों में प्रश्नवाचक चिह्न चमका तो बुजुर्ग आगे बोले, “कोई सुने तो लिखूँ, कोई पढे तो लिखूँ, कोई तारीफ करे तो लिखूँ... ये कविता की धक्कामार गाड़ी ना हुई तो और क्या हुई?” नीरजा सुन्न खड़ी रही। सच्चाई इस तरह खुलकर उससे सवाल-जवाब करने लगेगी, उसे अनुमान ना था। “पर फिर भी यह बहुत बड़ी बात है कि आप आज भी लिख लेती हैं। एक बार जड़ता हावी हो गई तो उसी तरह रहने की आदत हो जाएगी बेटा, और फिर सबके बीच ऐसी अकेली हो जाओगी कि जीवन भार लगने लगेगा,” कहते हुए वे एकदम गंभीर हो गए। दूर कहीं देखते हुए-से वे फिर बोले, “एक दिन मैं भी वहीं खड़ा था, जहाँ आज आप हो बेटा, तब मुझे किसी ने सचेत किया था एक कविता सुनाकर”-
जब तक रहती चेतनता
तब तक रहती अहिल्या।
ज्यों-ज्यों चेतनता खोती
त्यों-त्यों जड़ता छाती जाती
बन जाती सिला किसी एक दिन।
तब शुरू होती प्रतीक्षा
एक लंबी, बहुत लंबी- प्रतीक्षा
किसी के पावन स्पर्श की।
बुजुर्ग शाम के बढ़ते धुँधलके में किसी खोए हुए पल के साक्षी बने हुए थे। नीरजा कविता के हर कंपन को अपने भीतर महसूस कर रही थी। उसकी चेतनता करवट ले रही थी। “आज आपको इसकी बहुत ज़रूरत है। आपको ये कविता सुनाकर मैं जैसे उऋण हो गया। “अच्छा बेटा अब मैं चलता हूँ,” उन्होंने शांत भाव से नीरजा के सर पर फिर एक बार हाथ रखते हुए कहा। लंबे-लंबे डग भरते हुए वे फिर सड़क पर आगे को बढ़ गए। नीरजा का हृदय गद्गद था। नमस्ते अंकल कहकर नीरजा मुसकराई और घर की ओर बढ़ने लगी। दूर किसी गली में बजते हुए बैंड की आवाज़ सुनाई दे रही थी। सड़क के उस पार चार-पाँच दुकानों पर रंग-बिरंगी लाइटों की सजावट की हुई थी। रंगीन रोशनी बिखेरते नन्हे-मुन्ने बल्ब देखकर उसे एक पुराने गाने की धुन याद आई। बहुत कोशिश करने पर भी उसे गाने के बोल याद नहीं आए, किन्तु फिर भी नीरजा बड़ी मस्ती में गाने की धुन ही गुनगुनाती हुई आगे को बढ़ गई। 

शनिवार, 22 अगस्त 2015

अबे, तू खवि है क्या!

जैसे ही हम अपनी दैनिक सांध्य-बैठक में पहुँचे तो देखा, तीन-चार यार लोग गुरू के इर्द-गिर बैठ, अखबार पर धरी हुई नमकीन मुंगफली के दानों को मसल कर खा रहे हैं जिससे अखबार पर काफी भूरे-भूरे छिलके बिखर गए हैं। यह बैठक काशी की चाय की थड़ी के पिछले भाग में, जहाँ कुछ टूटे-जंग खाए हुए लोहे के जालीदार स्टूल, एक के ऊपर एक रखे हुए किसी पुराने ट्रक के टायर और दो चौड़े पत्थर रखे हुए हैं, स्थापित है। ये कबसे है, ये जानने के लिए तो पुरातत्व विभाग को ही पहल करनी पड़ेगी। 

बैठक के सर्वमान्य और स्वयंभू अध्यक्ष होते हैं, जानकी गुरू। मोहल्ले का हर जवान होता लड़का जब पहली-पहली बार कजरारी आँखों का शिकार होता, तो घायल पंछी की तरह मार्गदर्शन के लिए अपना धड़कता दिल लेकर जाने किस अज्ञात प्रेरणा से जानकी गुरू की शरण में आ पहुँचता। पुराने शागिर्दों की सिफ़ारिश और आगंतुक के सेवा भाव (चा-पानी, नमकीन) से प्रभावित हो जानकी गुरू उसका पथ प्रशस्त करते। पहले केस-हिस्ट्री जानी जाती- लड़की किस गली की है, कौनसे स्कूल में पढ़ती है, आना-जाना स्कूल बस से है या खुद के वाईकल से..........आदि। प्रेम-पत्र, व्हाट्स एप्प के मैसेज, फेसबुक के स्टेटस आदि कैसे हों, कौनसी भाषा का प्रयोग त्वरित प्रभावी होगा; गुरू सब जानते हैं। कई ठुकराए, जुतियाए हुए आशिक भी आते हैं। तब जानकी गुरू केस-स्टडी के पहले चरण पर ही बोल पड़ते हैं, "अबे साले ढक्कन, सैंट पेट्रिक्स में पढ़ने वाली को लेटर लिखा हिन्दी में, मामला तो फिलौफ होना ही था।"

ढीले-ढाले मैले चीकट कुर्ते-पायजामे और लाल पट्टियों वाली चप्पल पहने मंझौले कद के जानकी गुरू हर क्षेत्र के जानकार हैं। वो चाहे दर्शन-शास्त्र हो, राजनीति, इतिहास, खेल, फिल्म, साहित्य या और कोई भी क्षेत्र; जानकी गुरू पूरे अधिकार से उसमें घुस जाते और किसी के भी समस्त पूर्व ज्ञान को धत्ता बताते हुए नए सिद्धान्त का प्रतिपादन कर जाते और सामने वाले के पास नतमस्तक होने के सिवा कोई चारा नहीं बचता। तब शागिर्दों के मुँह पर चमक देखने लायक होती और उनमें से कोई एक थोड़ा पीछे को झुककर काशी को चाय का इशारा कर देता।

मुझे आता देख यार लोग मुँह दबा कर हँसने लगे और कनखियों से गुरू को मेरी ओर इशारा करने लगे। मैं समझ गया, आज ज़रूर कुछ गड़बड़ है। सकपकाते हुए लोहे का जालीदार स्टूल सरकाया, जिसका एक पैर छोटा होने से किसी के बैठते ही ये भड़ाक से एक ओर को डिगता है और बैठने वाले का अस्तित्व हिलता हुआ जान पड़ता है। गुरू ने एक पूरी नज़र मुझ पर गड़ाई तो मुझे वो पल याद आ गया जब बरसों-बरस पहले नई-नई जवानी के आलम में मैंने साथ पढ़ने वाली बेला को मेले में एक तरफ लेकर आइसक्रीम खिला दी थी, बिना गुरू के संज्ञान में लाए। दरअसल गुरू का मूलतः मानना था कि हम सब साले ढक्कन हैं, किस समय पर, कौनसा काम, कैसे करना चाहिए, इसका हमें ज्ञान नहीं है। खैर, वो जवानी तो पीछे छूट गई पर आज ऐसा क्या हो गया, मैं सोच में पड़ा कयास लगाने लगा।

तभी गुरू ने एक ओर मुँह करके ढेर सारा पीला थूक उछाला। फिर स्थितप्रज्ञ नेत्रों से थूक के बुलबुलों को निहारते रहे, गोया क्षणभंगुर जीवन के अस्तित्व का कोई साम्य तलाश रहे हों। थूक की पीलास ने बता दिया कि चाय के एक-दो दौर के साथ किसी मुद्दे पर चर्चा हो चुकी है और हम थोड़ी देर से पहुँच पाए हैं।

गुरू ने अपनी हथेली के शुक्र पर्वत से अपने होठों पर बचे थूक को पोंछते हुए गर्दन घुमा तपाक से मुझसे पूछा, "अबे साले ढक्कन, तू खवि है क्या?" इस पर सारे शागिर्द खी-खी करके  हँस पड़े। मैंने कहा, "क्यों गुरू, ऐसा क्यों पूछ रहे हो...!" फिर अचानक मेरा ध्यान खत्म हो रही मुंगफलियों के दानों के नीचे बिछे अखबार पर गया जिसमें उस कवि सम्मेलन की तस्वीर मय खबर छपी दिखाई दे रही थी, जिसमें मैं कल ही कविता पाठ करके आया था। अब सारा माजरा समझ में आ गया। मैंने मुंगफली के छिलकों को झटकते हुए खबर को पढ़ा तो कवियों की सूची में अपना नाम भी नज़र आया। मैं शर्म से रक्तिम कपोल और नत-नयनों से कुछ संप्रेषित करने की कोशिश में अस्फुट स्वर में बोला, "वो ........ वो तो गुरू यूँही ........ मित्रों ने कह दिया ........ तो मैंने पढ़ दी।"

गुरू किसी मुर्गी की तरह गर्दन को दबा, दाँतों को कम से कम खोल कर, पतली-सी 'फिक्क' हँसी हँस पड़े, जो वो अक्सर तब हँसा करते थे जब उन्हें किसी पर बहुत तरस आ जाए। "अबे साले ढक्कन, बाप न मारी मेंढकी, बेटा तीरंदाज!"

----------------------------------------------------  (क्रमश:)     

गुरुवार, 13 अगस्त 2015

बहादुर बंटी

जंगल के उस पार एक नदी बहती थी। नदी में रहती थी बहुत सारी मछलियाँ। नीले, लाल, सुनहरे पंखों वाली कई मछलियाँ। नदी के तल में हरी चट्टानों के बीच मछलियों का महल था। दिन भर वे सब नदी में खेलती फिरती और रात को अपने महल में आ जातीं। 

सब मछलियाँ बहुत खुश थीं, पर सोनू मछली कई दिनों से उदास थी। उसका छोटा बेटा बंटी आजकल अजीब-अजीब बातें कर रहा था। अभी परसों की ही बात है, उसके सारे भाई तो सो रहे थे, रात भी काफी हो चुकी थी, पर वो जग रहा था। सोनू ने प्यार से पूछा, "क्या बात है बेटा!, नींद क्यों नहीं आ रही!" "माँ, मेरा यहाँ मन नहीं लगता, मैं यहाँ बोर हो गया हूँ," बंटी बोला। सोनू हँस पड़ी। "दिन भर तो अपने दोस्तों के साथ खेलता रहता है और ऊपर से कहता है कि यहाँ मन नहीं लगता।" बंटी कुछ बड़बड़ाया फिर करवट बदल कर सो गया। दूसरे दिन भी बंटी कुछ अनमना-सा लगा, खेलने भी नहीं गया। शाम को सोनू ने बंटी से जब पूछा तो वो बोला, "माँ, मैं समुद्र देखना चाहता हूँ। मैंने सुना है कि समुद्र बहुत बड़ा होता है। वहाँ तरह-तरह की मछलियाँ होंगी, मैं नए-नए दोस्त बनाऊँगा, नयी-नयी जगहें  देखूंगा। माँ, तुम मुझे भेजोगी ना।" सोनू घबरा कर बोली, "नहीं-नहीं बेटा, समुद्र बहुत दूर है। वहाँ बहुत खतरे हैं और तू तो अभी बहुत छोटा है, मैं तुझे नहीं जाने दूँगी।" उस समय तो बंटी कुछ नहीं बोला, पर शाम को उसने खाना नहीं खाया, किसी से बोला भी नहीं और सो गया। सुबह जल्दी ही वो कहीं बाहर निकल गया। जब दोपहर तक वो घर नहीं लौटा तो सोनू को चिंता हो गई। वो बंटी को ढूँढने लगी। आज तो वो अपने दोस्तों के साथ भी नहीं था। दूर हरी बेलों के झुरमुट के नीचे बंटी अकेला बैठा था। सोनू ने उसे आवाज़ दी, "बंटी, तू यहाँ है और मैं तुझे कहाँ-कहाँ खोज आई हूँ।" बंटी कुछ नहीं बोला, बस उठा और घर को चल दिया। सोनू अपने बेटे की इस अनोखी ज़िद से परेशान थी। डरती भी थी कि सच में अगर वो कहीं चला गया तो जाने क्या होगा। रात को वो प्यार से बंटी को सुलाने लगी। उसके नाजुक-नाजुक पंखों को सहलाने लगी। बंटी बोला, "माँ, मैंने तय कर लिया है कि मैं समुद्र देखने जाऊंगा। तू डरना मत, मैं सही सलामत घर लौट कर आ जाऊंगा। तू बिलकुल भी मत डरना।" सोनू ने गहरी साँस लेकर कहा, "ठीक हे बेटा, जब तूने तय कर ही लिया है तो चले जाना।" बंटी खुशी से उछल पड़ा। समुद्र यात्रा के रंगीन सपने देखते हुए कब उसे नींद आ गई, उसे पता ही नहीं चला। दूसरे दिन सुबह ही बंटी अपने भाईयों, दोस्तों और माँ से विदा लेकर समुद्र यात्रा पर निकल पड़ा। बंटी बहुत उत्साह में था। नदी की धार के साथ तैरता हुआ वो काफी आगे निकल आया। रास्ते में तरह-तरह की मछलियाँ उसे मिलीं। कोई उसे अंजान समझ कर ठगी-सी देखती रहती और कोई छोटा, प्यारा बच्चा समझ कर मुसकरा देती। उसने भी उन्हें देख कर अपने पंख हिलाए। कुछ आगे चलकर बंटी को रुकना पड़ा। यहाँ से दो रास्ते अलग-अलग हो रहे थे। दाईं ओर वाले रास्ते का पानी कुछ हरे-हरे रंग का था और बाईं ओर वाला रास्ता कुछ नीला-नीला-सा था। बंटी कुछ समझ नहीं पाया कि अब उसे क्या करना चाहिए। वो बस अंदाज़ से दाएँ रास्ते की ओर चल पड़ा। ये पानी उसे कुछ अलग-सा नज़र आया। हरा पानी आगे चलकर बदबूदार हो गया। उसे उबकाई-सी आने लगी। बदबू से बचने के लिए उसने किनारा पकड़ लिया। कभी-कभी वो पानी के ऊपर आ जाता। बाहर का नज़ारा ऐसा था, जैसा उसने पहले कभी नहीं देखा। अपनी नदी में जब-जब वो नदी के ऊपर आता तो वही पेड़ और वही जंगल दिखाई देता था। कभी कभार इक्का-दुक्का आदमी भी दिखाई देता, पर माँ ने समझा रखा था, "आदमी से दूर रहना, ये पकड़ के ले जाते हैं;" इसलिए आदमियों को देखते ही वो गहरे पानी में गोता लगा जाता। नदी के बाहर बड़े-बड़े मकान बने हुए थे। पास में ही छोटे-छोटे बच्चे खेल रहे थे। बच्चों को देख कर बंटी रुक गया। वो उनका खेल देखने लगा। बच्चे इधर-उधर भाग रहे थे। कभी एक-दूसरे को पकड़ते, कभी ज़ोर से हँस पड़ते और फिर से भागने लगते। बंटी भी एक बार उनके साथ-साथ हँसा। शायद एक-दो बच्चों ने नदी की तरफ देखा भी, पर फिर से वे खेलने में मस्त हो गए। तभी बंटी को लगा, उसे बहुत देर हो गई है, आगे चलना चाहिए। उसने गहरे पानी में डुबकी लगाई और आगे बढ़ गया। रास्ते में उसे एक बूढ़ी मछली मिली। बंटी उसके पास गया और बोला, " अम्मा, यहाँ से समुद्र कितनी दूर है?" बूढ़ी मछली ने पलकें झपकाई फिर बोली, " अरे! तुम कौन हो! तुम्हें तो पहले यहाँ नहीं देखा...!"
 "मैं बंटी हूँ, बहुत दूर से आया हूँ और समुद्र देखने जा रहा हूँ।"
"समुद्र यहाँ से बहुत दूर है, संभल के जाना बेटा।" 
"तुम भी मेरी माँ की तरह हो," बंटी बुदबुदाया और आगे बढ़ गया। उसने देखा उसी की उम्र की तीन-चार मछलियाँ पानी में खेल रही थी। एक मछली मोटी-मोटी-सी थी। वो थोड़ा-सा भागने पर थक जाती। एक मछली नीली आँखों वाली थी। बंटी रुक गया। वे सब उसके पास आ गए। "तुम कौन हो भाई", मोटी मछली ने पूछा। 
"मैं बंटी हूँ, और तुम्हारा नाम क्या है?" 
सभी ने अपने-अपने नाम बताए। बंटी को नए दोस्त मिल गए। बंटी को उन्होने अपने खेल में मिला लिया। वो बहुत खुश हुआ। बहुत देर तक खेलने के बाद वे अपने घरों को लौटने लगे। उन्होने बंटी से भी घर चलने को कहा। "नहीं दोस्तो, अभी मुझे बहुत दूर जाना है, चलता हूँ," बंटी बोला। फिर उसने मुड़ कर कहा, "लौटते वक़्त ज़रूर मिलूँगा दोस्तो।" बंटी दुगुने उत्साह से आगे बढ़ रहा था। पानी में किसी रंगीन पत्थर को उठाता और उछाल देता। उसे यात्रा में बड़ा आनंद आ रहा था।
 "अरे वाह! इतना सारा खाना!" बंटी को भूख लगी हुई थी, वो खाने पर टूट पड़ा। खाते-खाते अचानक उसके गले में बहुत तेज़ दर्द हुआ, जैसे कोई तीखी चीज़ गड़ गई हो। वो बेचैन हो उठा। उसने जीभ को घुमा-घुमा कर उस तीखी चीज़ को निकालने की बहुत कोशिश की, पर वो कुछ ना कर पाया। अब तो उसका दर्द बढ्ने लगा। वो ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा। उसने माँ को पुकारा पर माँ तो बहुत दूर थी। वो बुरी तरह छटपटा रहा था। एक तेज़ झटके से किसी ने उसे उछल कर कहीं फैंक दिया। बंटी को साँस भी नहीं आ रही थी, वो बेहोश हो गया। वो कितनी देर बेहोश रहा उसे ध्यान भी नहीं। अजीब-अजीब-सी आवाज़ें, धुंधले-धुंधले साए उसके आसपास से गुज़र रहे थे। जब उसे होश आया, उसने अपने आपको एक चमकदार कटघरे में पाया। वहाँ उसके जैसी कई सुनहरी मछलियाँ थीं। वहाँ का पानी एकदम साफ और खुशबूदार था। उसमें खाना भी था। बंटी को थोड़ी तसल्ली हुई। उसका सर भारी हो रहा था। कुछ खाना खाकर उसने आगे बढ़ने के लिए छलांग लगाई। उसका बदन मानो किसी अदृश्य चट्टान से जा टकराया। उसने उलट-पलट कर देखा तो उसे चारों ओर दीवार नज़र आई। "ये मैं कहाँ आ गया," बंटी ने घबराते हुए सोचा। बंटी सुबक-सुबक कर रोने लगा। तभी चारों ओर तेज़ रोशनी हुई। सब मछलियाँ डर के मारे चुप हो गईं।    
बंटी ने देखा एक बच्चा उनकी ओर आया। उसने कटघरे को ऊपर से खोला और खाने की चीज़ें डालने लगा। बच्चा मुसकरा रहा था। वो उनसे कुछ कह रहा था। कुछ देर बाद वहाँ बहुत सारे लोग आए। बंटी कटघरे में एकदम नीचे चला गया। उसे माँ की बहुत याद आई। वे लोग कभी ज़ोर से हँसते और जाने क्या-क्या बोल रहे थे। बंटी को लगा वो अब कभी घर नहीं लौट पाएगा। माँ और अपने भाइयों को कभी नहीं देख पाएगा। वो रोते-रोते बेहाल हो गया। ऐसे ही कई दिन बीत गए। वो सिर्फ रोता रहता था। कई दिनों तक उसने कुछ नहीं खाया। वो बहुत कमजोर हो गया था। एकदम सुस्त, कटघरे के एक कोने में पड़ा रहता।  

और फिर एक दिन वही बच्चा एक आदमी के साथ वहाँ आया। वे लोग उसकी ओर इशारा करके कुछ बातें कर रहे थे। बड़ा आदमी ज़ोर-ज़ोर से कुछ बोल रहा था। बच्चा पैर पटक-पटक के रो रहा था। बंटी के कुछ समझ में नहीं आया। अचानक उस आदमी ने कटघरे को ऊपर से खोला, पानी में हाथ डालकर बंटी को पकड़ा और खिड़की से बाहर उछल दिया। बंटी फड़फड़ाते हुए नीचे बह रहे एक गंदे नाले में जा गिरा। वहाँ पानी कम और कीचड़ ज़्यादा था। पूरा नाला गंदगी से भरा हुआ था। उसे अपनी नदी का साफ-सुथरा पानी याद आया। पर उसे खुशी भी हुई कि कम से कम अब वो उस कटघरे से तो बाहर आ गया। उसने अपने पंख फड़फड़ाए और तेज़ी से तैरने लगा। कई दिन और कई रात वो इसी तरह आगे बढ़ता रहा। उस पल तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा जब उसने सामने बहती हुई नदी देखी। नाले का पानी नदी में गिर रहा था। वो भी छप्प से नदी में गिर गया। बंटी ज़ोर से चिल्लाया, "मिल गई, मिल गई, मुझे मेरी नदी मिल गई।" 
उसने आँखेँ मसलते हुए देखा, उसकी माँ और सारे भाई चारों ओर खड़े थे। सोनू ने बंटी के सर को सहलाते हुए पूछा, "क्या हुआ बेटा, चिल्ला क्यों रहे हो! कोई बुरा सपना देखा क्या?" बंटी तो कुछ बोल ही नहीं पाया। वो तो अपने घर में ही था। "वो हरे पानी वाली नदी, वो मोटी मछली, वो बूढ़ी मछली, वे खेलते हुए बच्चे और वो कटघरा.............," बंटी बुदबुदाया। माँ मुसकराई फिए बोली, "लगता है मेरा बहादुर बंटी सपने में समुद्र की सैर कर रहा था। बंटी शरमा गया और अपनी माँ से लिपट कर सो गया। 
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