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मंगलवार, 18 अप्रैल 2017

उसके लिए

किसी दिन

सूरज की पहली किरण

चाय की चुस्कियों के बीच

अखबार के पहले पन्ने पर

छपी खबर तुम्हें चौंकाएगी

"कल ढलती रात

एक पागल आशिक ने

कत्ल कर डाला

चाँद को"

सोमवार, 10 अप्रैल 2017

चदरिया

जिंदगी साफ़ महीन चादर-सी

धुली धुली हर सुबह

ढक लेती सब कुछ।

सिमटते हुए हर लम्हे को

एक मासूम तबस्सुम देकर

समा लेती खुद में।

अंतहीन तहों में लिपटी

चादर जिंदगी की।

दोहे

दोहे
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टूटा तारा कह गया, साथी से इक बात।

जब तक तन में आग है, जीत न पाए रात।।

पन्ना पन्ना पढ़ गए, जीवन एक किताब।

हर पन्ने पे दर्ज है, एक अबूझ हिसाब।।

इक दूजे को निरखलें, बात करे अब कौन।

क्षण के इस मधुमास में, प्रीत सिखाती मौन।।

पानी पी कौवा उड़ा, जगा गया विश्वास।

कंकर कंकर डालकर, बुझा सकोगे प्यास।।

प्यासी धरती मेघ को, ताक़ रही दिन रात।

करुणाकर अब दीजिये, रिमझिम की सौगात।।

जैसा मुझे लगता है

जैसा मुझे लगता है

वैसा तुम्हें भी लगता है क्या,

खुद से बोलते बोलते

थक कर मूक हो जाना

या फिर जैसे कि शब्द चुक गए हों।

शून्य में देखना ऐसे

जैसे मेले में खोया बालक

सिसकता हुआ देखता है भीड़ को

बहुत देर रोने के बाद।

जीवन छंदहीन कविता की तरह

रूबरू कराता शब्दों से

जो कभी कभी मजाक जान पड़ते हैं।

अल्ल सुबह से देर रात तक

रक्त में कुछ चलता है

छूता है एक एक धमनी एक एक शिरा को,

सोने जा रही ग्रन्थियों को जगाता है रोकता है

सुनो! देखो मैं यहीं हूँ।

सी-साॅ झूले पर बैठे बच्चे

एक पल के लिए पाते हैं समान तल

वरना एक ऊपर तो एक नीचे,

तब भी जुड़ाव तो रहता ही है सदा।

ये जुड़ाव, रक्त की अनचीह्नी आवाज,

शब्दों का चुक जाना-

तुम्हें भी लगता है क्या

जैसा मुझे लगता है।

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बरसात के बाद

थप-थप थप-थप

सौंधी खुशबू घोल जाता है

हर बारिश में कोई

मेरे स्मृति-जगत में।

रात भर करवटें बदल

झाड़ता हूँ पैरों की अंगुलियों पे चिपकी बालुई रेत

पर जाने क्यों हट नहीं पाती पूरी तरह

और मैं यूँही करवटें बदलता रहता हूँ रात भर,

हर बारिश में।

सूर्य

सूर्य - दो चित्र
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उदय
*****

प्रतिदिन तुम आते

हरते अँधेरा

पथ रौशन कर जाते।

बढ़ जाती आस्था

होता पुष्ट हौसला

तुम्हारे आने से।

जान गया हूँ अब

जब जब भी अँधेरा गहराएगा

तुम आओगे

पथ प्रकाशित कर जाओगे।

हे मेरे जीवन के सूर्य!

मेरा प्रणाम स्वीकार करो। ☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆

अस्त
*****

वो जो फुफकार रहा था सुबह

दहाड़ रहा था दिन में

उबल रहा था अपने ही तेज में।

न जाने क्यों उदास-सा

मुँह लटकाए खड़ा था

दूर क्षितिज के कोने।

आह रे जीवन!

वाह रे जीवन!

☆☆☆☆☆☆☆☆☆

मुड़ा हुआ पन्ना

किताब का वो पन्ना

जिसका कोना मुड़ा हुआ हो

केवल पन्ना नहीं होता।

वो होता है एक दस्तावेज

हमारे चलने और किसी मोड़ पर ठहरने का।

मन के भीतर किन किन गलियों से गुज़रे थे

किन किन गंधों को फिर से पाया था

या कि कौनसे नए- एकदम नए सपने ने

पहली दस्तक दी थी दिल पे

कौन कौनसे ज़बरन भुलाये चेहरे

बलात फिर आ बैठे यादों के झरोखे में

समेटे रहता है अपने में

किताब का वो पन्ना

जिसका कोना मुड़ा हुआ हो।