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शुक्रवार, 20 नवंबर 2015

पावन स्पर्श



नीरजा फिर उठी और उसने बाहर वाले कमरे में झाँका। उसे लगा कि अब तो पाँच बज ही गए होंगे। पिछली बार जब उसने देखा था तो पच्चीस मिनट कम थे। उसके बाद तो वह कितनी ही देर बीच वाले कमरे में बैठी रही थी। बाहर से आती हुई घर्रर्रर्रर्रर्र... की आवाज़ को सुनती रही। पडौस में किसी का मकान बन रहा था। शायद पत्थरों की घिसाई की मशीन से आने वाली आवाज़ थी ये। परसों वह खाना बनाने के बाद यूँही ज़रा दरवाजे तक गई थी। निरुद्देश्य दरवाजा खोल गली में देखने लगी। दाँयी ओर खाली पड़े प्लॉट में मज़दूर मुँह और नाक पर पट्टी बाँधे पत्थरों की घिसाई कर रहा था। मशीन से घर्रर्रर्रर्रर्र... की आवाज़ और चारों ओर पत्थर का पाउडर बिखर रहा था। नीरजा को वो आवाज़ सम्मोहित-सी करती रही। इंसान चाहे तो पत्थरों के स्वरूप में भी परिवर्तन करदे। कुछ देर बाद खुद ही झेंपती हुई उस सम्मोहन से बाहर निकल, दरवाजा बंद कर, अंदर आ गई। तीन बार उठ कर घड़ी देख चुकी थी। एक खयाल ये भी आया कि घड़ी का सैल तो कमजोर नहीं हो गया, फिर खुद ही ने उसे खारिज भी किया कि इतनी जल्दी तो नहीं होता। नीरजा की दिनचर्या इस घड़ी से संचालित होती थी। शादी के बारह साल बाद इस घड़ी से उसका ऐसा गठबंधन हो जाएगा उसने सोचा नहीं था।
एक सफल वकील राजीव को पति के रूप में पाकर उसने बहुत खुशी से अपनी गृहस्थी की यात्रा शुरू की थी। शादी से पहले राजीव जब उसे देखने आए तो उसने बड़े उत्साह से अपनी डायरी राजीव को दिखाई।
“अरे वाह! आप कविताएँ लिखती हैं!”
“हाँ, कॉलेज की मैग्ज़ीन में भी छपी हैं।”
“गुड,गुड,गुड...ये तो बहुत अच्छा है। कब लिखती हैं ये आप? ... मेरा मतलब इतना समय मिल जाता है आपको?”
“समय का क्या है, मिल ही जाता है।”
राजीव का उसकी कविताओं में इस तरह रुचि दिखाना उसे अच्छा लगा। शादी के बाद अपनी डायरी को सँभाल कर अपने साथ ले आई थी वो। जब मन करता कुछ लिखती, फिर इंतज़ार करती शाम का। चाय बनाते-बनाते उसके पैर थिरकते रहते, होठ कोई गीत गुनगुनाते रहते। चाय का प्याला राजीव को थमा कर खुद भी अपनी चाय लेकर बैठ जाती।
“आज मैंने एक कविता लिखी है, सुनाऊँ?” मुसकराते हुए वह राजीव से कहती। राजीव लंबी हूँ... करते हुए कहता, “गैस आ गई क्या? ...दिन में फोन कर दिया था मैंने।”
“हाँ, आ गई। ...सुनाऊँ कविता?” नीरजा कप नीचे रखते हुए कहती।
“यार, तो फोन तो करना था कि आ गई... मैं वहाँ परेशान हो रहा था,” राजीव चिढ़ता हुआ-सा कहता। एक लंबी चुप्पी पसर जाती। दिन पर दिन यह चुप्पी पसरती ही चली गई। चाय के प्यालों से खाने की थाली तक होते हुए घर के कोने-कोने में फैलती चली गई यही चुप्पी। कामकाज का दबाव और उसके कारण राजीव की व्यस्तता बढ़ती जा रही थी।
“अब लाइट ऑफ करके सो जाओ ना, बहुत रात हो गई है,” राजीव करवट बदल कर बड़बड़ाता।
“बस थोड़ी देर और, फिर सोती हूँ,” नीरजा अपनी डायरी में डूबी हुई बोलती।
झल्ला कर राजीव उठ बैठता, “तुम्हारे पास तो दिन भर फालतू समय बहुत है, लिखती रहना, अब मुझे सोने दो।” कमरे में अँधेरा... अँधेरा में छटपटाती नीरजा... फालतू समय... फालतू काम! रात का अँधेरा नीरजा के मन में घुस जाता और तब उसे अचानक लगता कि कुछ फिसल रहा है... क्या?... ठीक से नहीं दीख रहा पर फिसल ज़रूर रहा है... फालतू काम! रात, सुबह, दोपहर, शाम जाने कितनी बार उसने यही महसूस किया। धीरे-धीरे जाने कब सब कुछ बदलता चला गया। फिसलती हुई जिंदगी को जमा कर पकड़े रखने के क्रम में कब वह इस घड़ी से बंध गई, पता ही नहीं चला। हर काम के लिए घड़ी में एक समय नियत था और घड़ी के काँटों के हर कोण पर उसकी दिनचर्या सधी हुई थी।
नीरजा फिर उठी और बाहर वाले कमरे तक आई। ओहो! ... पाँच-बीस! घड़ी देखकर वह बड़बड़ाई। जल्दी से उसने थैला पकड़ा और सब्जी लेने निकल गई। पाँच बजते ही वह सब्जी लेने जाया करती थी। तेज़ कदमों से गली पार कर वह सड़क पर आई। सड़क के किनारे-किनारे चलते हुए सोचने लगी कि क्या-क्या लेना है। ... आटे की चक्की... प्रॉपर्टी डीलर का ऑफिस... ऑटो रिपेयर सेंटर... सब के बाहर हमेशा जैसी हलचल थी। इस समय करीब-करीब वही लोग दिखाई पड़ते थे जो हमेशा दीखते थे। नीरजा इन सबके प्रति उदासीन भाव से चलती जाती थी। शायद नित्य के एक-से दृश्य ने उसे उन सबके प्रति उदासीन बना दिया था। कुछ ही देर में वह सड़क पार कर सब्जी भंडार तक पहुँच गई। सब्जी वाला अपने चिर परिचित अंदाज में मुसकराया। हँसते समय उसके दोनों गाल ऊपर की ओर उठ जाते थे। नीरजा को हर बार उसका मुसकराता चेहरा अपने ड्राइंग रूम में पड़े लाफिंग बुद्धा की मूर्ति जैसा जान पड़ता था। बिना कुछ बोले वह सब्जियाँ छाँटने लगी। पास में ही एक बुजुर्ग अपना थैला लेकर निकल रहे थे। औपचारिकतावश किसी ने उनसे पूछा होगा, “और अंकल, क्या हालचाल हैं?” जवाब में उन्होंने एक शानदार ठहाका लगाया और बोले-
सुबह धकेली हो गई शाम
चलता है जीवन अविराम
सब्जी तुलवाते हुए नीरजा ने चौंक कर पीछे देखा। हल्के हरे रंग का लंबा सूती कुर्ता और सफ़ेद पायजामा पहने एक पकी उम्र का आदमी नज़र आया। वह अब भी अपने चेहरे के साथ-साथ पूरे शरीर को दाएँ-बाएँ झुलाते हुए बराबर हँसे जा रहे थे। आज से पहले नीरजा ने कभी उन्हें यहाँ नहीं देखा था। एक बार उसने सोचा कि सब्जी वाले से पूछे उनके बारे में, फिर उसने कुछ सोच कर ऐसा नहीं किया। “ज़रा जल्दी करो ना भैया, कितने पैसे हुए?” सब्जी वाले को कहती हुई नीरजा एक बार फिर पीछे मुड़ कर देखने लगी। वो आदमी लंबे-लंबे डग भरता हुआ दुकान से बाहर जा रहा था। सब्जी का हिसाब करके नीरजा बाहर को लपकी। अचानक सब्जी वाले ने आवाज़ दी, “मैडम, अपना थैला तो ले जाइए।” नीरजा को बड़ा अटपटा लगा। वह खिसियाते हुए मुसकराई और सब्जी का थैला लेकर बाहर निकली। सड़क पार करके एक बार फिर आगे तक देखा। वो बहुत आगे चल रहे थे। नीरजा ने अपनी चाल तेज़ की पर वो महादेव आटा-चक्की के पास वाली गली में मुड़कर गायब हो गए। नीरजा परेशान हो गई। “ऐसे अचानक कहाँ चले गए वो!... गायब ही हो गए!... पर मुझे उनसे क्या करना था!... बात करनी थी!... नहीं, कुछ नहीं!...” विचारों में डूबती-तैरती नीरजा कब घर पहुँच गई, पता ही नहीं चला। सब्जी काटते हुए, खाना बनाते हुए, .... और शायद बर्तन धोते हुए भी उसने दोहराया था- “सुबह धकेली हो गई शाम, चलता है जीवन अविराम।” एक-दो बार उसने झटक कर इसे अपने से दूर भी करना चाहा पर फिर थोड़ी देर बाद इन्हीं पंक्तियों को दोहराने लग गई। रसोई साफ कर नीरजा बाहर वाले कमरे में आई। रात के नौ-तीस हो गए थे। लगभग इसी समय उसका सारा काम खत्म हो जाता था। राजीव लॉबी में ही पसरे हुए टीवी चैनलों को घुमाते रहते या कभी अपने कमरे में बैठ फाइलों से उलझ रहे होते। आधा घंटा नीरजा वहीं लेटी हुई इंतज़ार करती कि राजीव कॉफी माँगे तो वह बनाकर दे। जैसे ही घड़ी के काँटे रात के दस बजने का संकेत करते नीरजा उठ बैठती और सोने के कमरे में चल देती; पर आज जाने क्यूँ वह घड़ी के उस सख्त अनुशासन को तोड़, दस के पहले ही सोने के कमरे में चली गई। इधर-उधर अलमारियों में कुछ ढूँढने लगी। थोड़ी देर बाद झुँझला कर बैठ गई। “कहाँ रखदी होगी डायरी...!” अलमारियों की ओर देखते हुए खुद से ही बोली। एक बार फिर उठी और अलमारी में रखे सामान को इधर-उधर करने लगी। “क्या देख रही हो?” राजीव ने कमरे में घुसते हुए पूछा। “नहीं, कुछ खास नहीं... ऐसे ही ज़रा...,” नीरजा चौंक कर इस तरह बोली जैसे उसकी चोरी पकड़ी गई हो। लाइट ऑफ करके वह भी लेट गई। सोने की कोशिश में उसके भीतर कुछ जागने लगा था। कानों में किसी रहस्यमयी संगीत की तरह वही पंक्तियाँ गूँज रही थी। नीरजा को लगा कि वह किसी बहुत बड़े आँगन में आ खड़ी हुई है और उन पंक्तियों के सारे शब्द छोटे-छोटे बच्चों की तरह किलक-किलक कर उसे बुला रहे हैं- “आओ, आओ, पकड़ो हमें।” नीरजा भी चंचलता से उछल कर उनके पीछे भागने लगी। एक को, दूसरे को, तीसरे को... सभी को पकड़ने की कोशिश करने लगी। क्या-क्या होता रहा उस रात नीरजा को ठीक-ठीक कुछ याद नहीं रहा। उसे कई तरह के सतरंगी शब्द अपने पास से गुजरते हुए महसूस हुए। शायद वह कई बार उठी भी थी और उठ कर कमरे में घूमी भी थी। आज लंबे समय बाद रात नहीं गुज़री, बल्कि वह खुद रात के पहाड़ पर चढ़कर भोर की नन्ही-सी किरण तक पहुँच गई थी।
सुबह चाय बनाकर कुछ भागते हुए कदमों से सोने के कमरे में आकर नीरजा कुछ तलाशने लगी। टेपरिकॉर्डर के पास पड़ी मेडिकल स्लिप के पीछे लिखी हुई पंक्तियाँ अब उसके हाथ में थी-
सुबह धकेली हो गई शाम
चलता है जीवन अविराम
उत्तर नहीं यहाँ कोई भी
प्रश्न खड़े हैं यहाँ तमाम
रात को जाने कब वह ये लिख गई थी। उसे सब याद आया कि कैसे उसने लिखने के लिए कुछ तलाशा, कुछ ना मिला तो उपाध्याय जी की बेटी की शादी के कार्ड के पीछे लिखने की कोशिश की, कागज़ चिकना होने के कारण नहीं लिखा गया, और तब दिखी ये मेडिकल स्लिप, और इसी के पीछे उसने कुछ लिख डाला। इस समय इन पंक्तियों को वह इतने ही प्यार से निहार रही थी जैसे कोई माँ अपने गोदी के बच्चे को ममता से भर कर बार-बार देखती है। उसे यूँ लग रहा था जैसे मन रुई के फाहे-सा हल्का हो गया हो, या बरसों गहन मौन तपस्या में रहकर किसी तपस्वी ने जैसे कुछ शब्दों से अपना मौन तोड़ा हो और उन शब्दों की अद्भुत प्रतिध्वनि जैसे दिशाओं पर कोई पवित्र छिड़काव कर रही हो। नीरजा को बहुत अच्छा लग रहा था पर साथ ही मन जैसे उलझता जा रहा हो कि अब?... अब क्या करूँ?”
दिन के सारे काम पानी पर बहते हुए-से गुजरते जा रहे थे। आज तो पक्का घड़ी खराब हो ही गई, ऐसा उसे लगा, क्योंकि पाँच बज ही नहीं रहे थे। दिन का काम निबटा कर ज़रा देर बैठी। कुछ देर सोचती रही फिर अचानक उठ बैठी और अंदर के कमरे में गई। अलमारियों से सारा सामान तसल्ली से उतार कर नीचे फैलाने लगी। नीचे, बहुत नीचे- दबी हुई मिली उसे अपनी डायरी। डायरी को पाकर उसे ऐसा लगा जैसे बरसों बाद बचपन की सखियाँ अचानक से आमने-सामने हो गई हों। एक साँस में सारे पेज पलटती गई। अतीत के ना जाने कितने ही पल डायरी में टंगे स्याही-बिन्दुओं के सहारे से उभरने लगे। अलमारी को व्यवस्थित कर बाहर वाले कमरे में आई। “अरे! ये क्या!... पाँच-दस हो गए!” नीरजा बुदबुदाई। इस समय का भी कुछ पता ही नहीं चलता, कब किसी चंचल हिरनौटे-सा भागने लगता है और कब कछुए की चाल पकड़ लेता है। वह जल्दी से गली पार कर सब्जी की दुकान को चल पड़ी। सड़क के दृश्य लगभग रोज़ के-से थे पर फिर भी उसे हवाओं में कुछ नयापन लगा। खुद में भी वह एक ताजगी का एहसास कर रही थी। कुछ नया था आज उसके पास। सब्जी लेते समय नीरजा बार-बार सड़क की ओर देख रही थी। चलते-चलते सब्जी वाले से पूछ ही लिया, “ भैया, कल वो अंकल आए थे ना, लंबे-से, वो कौन हैं, कहाँ रहते हैं?” सब्जी वाले कुछ देर सोचा फिर कहा, हाँ-हाँ आप शायद मनोहर अंकल का कह रही हैं, वे इधर ही आटा-चक्की के पीछे की तरफ कहीं रहते हैं।” अच्छा-अच्छा कहकर नीरजा बाहर को चली। सड़क पार करके दूसरी ओर आ गई और किनारे-किनारे चलने लगी। तभी उसकी नज़र पड़ी सामने से आते हुए उन्हीं बुजुर्ग पर। आज भी वो कल की ही तरह ढीला और लंबा हल्के हरे रंग का कुर्ता और सफ़ेद पायजामा पहने हुए थे। नीरजा वहीं ठहर गई।
“नमस्ते अंकल,” नीरजा ने झुकते हुए कहा।
“नमस्ते जी... आपको पहचाना नहीं बेटा,” बुजुर्ग कुछ संकोच से बोले।
“हम इधर दो गली छोड़ कर रहते हैं। कल शाम सब्जी वाले के यहाँ आपकी कविता की वो दो लाइनें सुनी थीं... बहुत अच्छी लगीं,” नीरजा एक साँस में कह गई।
“कविता...? ओह! अच्छा-अच्छा वो...,” कहते हुए उन्होंने वैसा ही शानदार ठहाका लगाया और देर तक उनका शरीर दाएँ-बाएँ झूलता रहा। नीरजा को अपने उतावलेपन पर खुद अचरज हो रहा था। “अंकल वो कविता आपने लिखी है?” उसने पूछा। कुछ देर के लिए वो बुजुर्ग एक रहस्यमयी मुसकान के साथ उसे देखते रहे, फिर बोले, “आप भी कविता लिखती हैं?” उनका यह पूछना एक ओर जहाँ प्रश्न था वहीं दूसरी ओर ये ध्वनि-संकेत भी था कि इसका उत्तर हाँ है।
“नहीं-नहीं... मैं... हाँ, ऐसे ही कभी-कभी...,” नीरजा अचकचाते हुए बोली।
“नहीं भी और हाँ भी! तब तो आप पक्का कविता लिखती ही हैं,” कहकर बुजुर्ग ने फिर वैसा ही ठहाका लगाया।
नीरजा को अब खुद अपनी हालत पर तरस आने लगा था। जब मन के पर्दे उठने लगते हैं तो भीतर छुपे दृश्य सामने वाले को दिखाई देने लगते हैं और बड़े यत्न से ढक के रखे गए अंतस-चित्रों का यूँ अचानक से किसी के सामने बेनकाब हो जाना घबराहट और भय पैदा कर ही देते हैं। नीरजा ने प्रयत्नपूर्वक मुसकरा कर कहा, “अंकल, मैंने उसी कविता को कुछ आगे बढ़ाया है।”
“अरे वाह! सुनाओ तो,” कहते हुए वृद्ध की आँखों में बालक-सी जिज्ञासा उभर आई। नीरजा ने एक नज़र चारों ओर देखा फिर सुनाया-
सुबह धकेली हो गई शाम
चलता है जीवन अविराम
उत्तर नहीं यहाँ कोई भी
प्रश्न खड़े हैं यहाँ तमाम
उन बुजुर्ग ने तुरंत नीरजा के सर पर हाथ रख दिया, “सच में बेटा, आप तो बहुत अच्छा लिखती हैं।” नीरजा ने सब्जी का थैला एक हाथ से दूसरे हाथ में लेते हुए कहा, “बहुत पहले लिखा करती थी, ये तो आज वर्षों बाद लिखा है अंकल। शादी से पहले मम्मी-पापा को ये सब अच्छा लगता था, फ्रेंड-सर्किल भी वैसा ही था... पर अब यहाँ वैसा माहौल ही नहीं है,” कहकर नीरजा थोड़ा झिझकी और एक पल के लिए उसके मन में आया कि कहीं उसने कुछ गलत तो नहीं कह दिया।
बुजुर्ग ने किसी तरह अपनी हँसी रोकते हुए कहा, “मतलब आप कविता की धक्कामार गाड़ी हो।” नीरजा की आँखों में प्रश्नवाचक चिह्न चमका तो बुजुर्ग आगे बोले, “कोई सुने तो लिखूँ, कोई पढे तो लिखूँ, कोई तारीफ करे तो लिखूँ... ये कविता की धक्कामार गाड़ी ना हुई तो और क्या हुई?” नीरजा सुन्न खड़ी रही। सच्चाई इस तरह खुलकर उससे सवाल-जवाब करने लगेगी, उसे अनुमान ना था। “पर फिर भी यह बहुत बड़ी बात है कि आप आज भी लिख लेती हैं। एक बार जड़ता हावी हो गई तो उसी तरह रहने की आदत हो जाएगी बेटा, और फिर सबके बीच ऐसी अकेली हो जाओगी कि जीवन भार लगने लगेगा,” कहते हुए वे एकदम गंभीर हो गए। दूर कहीं देखते हुए-से वे फिर बोले, “एक दिन मैं भी वहीं खड़ा था, जहाँ आज आप हो बेटा, तब मुझे किसी ने सचेत किया था एक कविता सुनाकर”-
जब तक रहती चेतनता
तब तक रहती अहिल्या।
ज्यों-ज्यों चेतनता खोती
त्यों-त्यों जड़ता छाती जाती
बन जाती सिला किसी एक दिन।
तब शुरू होती प्रतीक्षा
एक लंबी, बहुत लंबी- प्रतीक्षा
किसी के पावन स्पर्श की।
बुजुर्ग शाम के बढ़ते धुँधलके में किसी खोए हुए पल के साक्षी बने हुए थे। नीरजा कविता के हर कंपन को अपने भीतर महसूस कर रही थी। उसकी चेतनता करवट ले रही थी। “आज आपको इसकी बहुत ज़रूरत है। आपको ये कविता सुनाकर मैं जैसे उऋण हो गया। “अच्छा बेटा अब मैं चलता हूँ,” उन्होंने शांत भाव से नीरजा के सर पर फिर एक बार हाथ रखते हुए कहा। लंबे-लंबे डग भरते हुए वे फिर सड़क पर आगे को बढ़ गए। नीरजा का हृदय गद्गद था। नमस्ते अंकल कहकर नीरजा मुसकराई और घर की ओर बढ़ने लगी। दूर किसी गली में बजते हुए बैंड की आवाज़ सुनाई दे रही थी। सड़क के उस पार चार-पाँच दुकानों पर रंग-बिरंगी लाइटों की सजावट की हुई थी। रंगीन रोशनी बिखेरते नन्हे-मुन्ने बल्ब देखकर उसे एक पुराने गाने की धुन याद आई। बहुत कोशिश करने पर भी उसे गाने के बोल याद नहीं आए, किन्तु फिर भी नीरजा बड़ी मस्ती में गाने की धुन ही गुनगुनाती हुई आगे को बढ़ गई। 

शनिवार, 22 अगस्त 2015

अबे, तू खवि है क्या!

जैसे ही हम अपनी दैनिक सांध्य-बैठक में पहुँचे तो देखा, तीन-चार यार लोग गुरू के इर्द-गिर बैठ, अखबार पर धरी हुई नमकीन मुंगफली के दानों को मसल कर खा रहे हैं जिससे अखबार पर काफी भूरे-भूरे छिलके बिखर गए हैं। यह बैठक काशी की चाय की थड़ी के पिछले भाग में, जहाँ कुछ टूटे-जंग खाए हुए लोहे के जालीदार स्टूल, एक के ऊपर एक रखे हुए किसी पुराने ट्रक के टायर और दो चौड़े पत्थर रखे हुए हैं, स्थापित है। ये कबसे है, ये जानने के लिए तो पुरातत्व विभाग को ही पहल करनी पड़ेगी। 

बैठक के सर्वमान्य और स्वयंभू अध्यक्ष होते हैं, जानकी गुरू। मोहल्ले का हर जवान होता लड़का जब पहली-पहली बार कजरारी आँखों का शिकार होता, तो घायल पंछी की तरह मार्गदर्शन के लिए अपना धड़कता दिल लेकर जाने किस अज्ञात प्रेरणा से जानकी गुरू की शरण में आ पहुँचता। पुराने शागिर्दों की सिफ़ारिश और आगंतुक के सेवा भाव (चा-पानी, नमकीन) से प्रभावित हो जानकी गुरू उसका पथ प्रशस्त करते। पहले केस-हिस्ट्री जानी जाती- लड़की किस गली की है, कौनसे स्कूल में पढ़ती है, आना-जाना स्कूल बस से है या खुद के वाईकल से..........आदि। प्रेम-पत्र, व्हाट्स एप्प के मैसेज, फेसबुक के स्टेटस आदि कैसे हों, कौनसी भाषा का प्रयोग त्वरित प्रभावी होगा; गुरू सब जानते हैं। कई ठुकराए, जुतियाए हुए आशिक भी आते हैं। तब जानकी गुरू केस-स्टडी के पहले चरण पर ही बोल पड़ते हैं, "अबे साले ढक्कन, सैंट पेट्रिक्स में पढ़ने वाली को लेटर लिखा हिन्दी में, मामला तो फिलौफ होना ही था।"

ढीले-ढाले मैले चीकट कुर्ते-पायजामे और लाल पट्टियों वाली चप्पल पहने मंझौले कद के जानकी गुरू हर क्षेत्र के जानकार हैं। वो चाहे दर्शन-शास्त्र हो, राजनीति, इतिहास, खेल, फिल्म, साहित्य या और कोई भी क्षेत्र; जानकी गुरू पूरे अधिकार से उसमें घुस जाते और किसी के भी समस्त पूर्व ज्ञान को धत्ता बताते हुए नए सिद्धान्त का प्रतिपादन कर जाते और सामने वाले के पास नतमस्तक होने के सिवा कोई चारा नहीं बचता। तब शागिर्दों के मुँह पर चमक देखने लायक होती और उनमें से कोई एक थोड़ा पीछे को झुककर काशी को चाय का इशारा कर देता।

मुझे आता देख यार लोग मुँह दबा कर हँसने लगे और कनखियों से गुरू को मेरी ओर इशारा करने लगे। मैं समझ गया, आज ज़रूर कुछ गड़बड़ है। सकपकाते हुए लोहे का जालीदार स्टूल सरकाया, जिसका एक पैर छोटा होने से किसी के बैठते ही ये भड़ाक से एक ओर को डिगता है और बैठने वाले का अस्तित्व हिलता हुआ जान पड़ता है। गुरू ने एक पूरी नज़र मुझ पर गड़ाई तो मुझे वो पल याद आ गया जब बरसों-बरस पहले नई-नई जवानी के आलम में मैंने साथ पढ़ने वाली बेला को मेले में एक तरफ लेकर आइसक्रीम खिला दी थी, बिना गुरू के संज्ञान में लाए। दरअसल गुरू का मूलतः मानना था कि हम सब साले ढक्कन हैं, किस समय पर, कौनसा काम, कैसे करना चाहिए, इसका हमें ज्ञान नहीं है। खैर, वो जवानी तो पीछे छूट गई पर आज ऐसा क्या हो गया, मैं सोच में पड़ा कयास लगाने लगा।

तभी गुरू ने एक ओर मुँह करके ढेर सारा पीला थूक उछाला। फिर स्थितप्रज्ञ नेत्रों से थूक के बुलबुलों को निहारते रहे, गोया क्षणभंगुर जीवन के अस्तित्व का कोई साम्य तलाश रहे हों। थूक की पीलास ने बता दिया कि चाय के एक-दो दौर के साथ किसी मुद्दे पर चर्चा हो चुकी है और हम थोड़ी देर से पहुँच पाए हैं।

गुरू ने अपनी हथेली के शुक्र पर्वत से अपने होठों पर बचे थूक को पोंछते हुए गर्दन घुमा तपाक से मुझसे पूछा, "अबे साले ढक्कन, तू खवि है क्या?" इस पर सारे शागिर्द खी-खी करके  हँस पड़े। मैंने कहा, "क्यों गुरू, ऐसा क्यों पूछ रहे हो...!" फिर अचानक मेरा ध्यान खत्म हो रही मुंगफलियों के दानों के नीचे बिछे अखबार पर गया जिसमें उस कवि सम्मेलन की तस्वीर मय खबर छपी दिखाई दे रही थी, जिसमें मैं कल ही कविता पाठ करके आया था। अब सारा माजरा समझ में आ गया। मैंने मुंगफली के छिलकों को झटकते हुए खबर को पढ़ा तो कवियों की सूची में अपना नाम भी नज़र आया। मैं शर्म से रक्तिम कपोल और नत-नयनों से कुछ संप्रेषित करने की कोशिश में अस्फुट स्वर में बोला, "वो ........ वो तो गुरू यूँही ........ मित्रों ने कह दिया ........ तो मैंने पढ़ दी।"

गुरू किसी मुर्गी की तरह गर्दन को दबा, दाँतों को कम से कम खोल कर, पतली-सी 'फिक्क' हँसी हँस पड़े, जो वो अक्सर तब हँसा करते थे जब उन्हें किसी पर बहुत तरस आ जाए। "अबे साले ढक्कन, बाप न मारी मेंढकी, बेटा तीरंदाज!"

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गुरुवार, 13 अगस्त 2015

बहादुर बंटी

जंगल के उस पार एक नदी बहती थी। नदी में रहती थी बहुत सारी मछलियाँ। नीले, लाल, सुनहरे पंखों वाली कई मछलियाँ। नदी के तल में हरी चट्टानों के बीच मछलियों का महल था। दिन भर वे सब नदी में खेलती फिरती और रात को अपने महल में आ जातीं। 

सब मछलियाँ बहुत खुश थीं, पर सोनू मछली कई दिनों से उदास थी। उसका छोटा बेटा बंटी आजकल अजीब-अजीब बातें कर रहा था। अभी परसों की ही बात है, उसके सारे भाई तो सो रहे थे, रात भी काफी हो चुकी थी, पर वो जग रहा था। सोनू ने प्यार से पूछा, "क्या बात है बेटा!, नींद क्यों नहीं आ रही!" "माँ, मेरा यहाँ मन नहीं लगता, मैं यहाँ बोर हो गया हूँ," बंटी बोला। सोनू हँस पड़ी। "दिन भर तो अपने दोस्तों के साथ खेलता रहता है और ऊपर से कहता है कि यहाँ मन नहीं लगता।" बंटी कुछ बड़बड़ाया फिर करवट बदल कर सो गया। दूसरे दिन भी बंटी कुछ अनमना-सा लगा, खेलने भी नहीं गया। शाम को सोनू ने बंटी से जब पूछा तो वो बोला, "माँ, मैं समुद्र देखना चाहता हूँ। मैंने सुना है कि समुद्र बहुत बड़ा होता है। वहाँ तरह-तरह की मछलियाँ होंगी, मैं नए-नए दोस्त बनाऊँगा, नयी-नयी जगहें  देखूंगा। माँ, तुम मुझे भेजोगी ना।" सोनू घबरा कर बोली, "नहीं-नहीं बेटा, समुद्र बहुत दूर है। वहाँ बहुत खतरे हैं और तू तो अभी बहुत छोटा है, मैं तुझे नहीं जाने दूँगी।" उस समय तो बंटी कुछ नहीं बोला, पर शाम को उसने खाना नहीं खाया, किसी से बोला भी नहीं और सो गया। सुबह जल्दी ही वो कहीं बाहर निकल गया। जब दोपहर तक वो घर नहीं लौटा तो सोनू को चिंता हो गई। वो बंटी को ढूँढने लगी। आज तो वो अपने दोस्तों के साथ भी नहीं था। दूर हरी बेलों के झुरमुट के नीचे बंटी अकेला बैठा था। सोनू ने उसे आवाज़ दी, "बंटी, तू यहाँ है और मैं तुझे कहाँ-कहाँ खोज आई हूँ।" बंटी कुछ नहीं बोला, बस उठा और घर को चल दिया। सोनू अपने बेटे की इस अनोखी ज़िद से परेशान थी। डरती भी थी कि सच में अगर वो कहीं चला गया तो जाने क्या होगा। रात को वो प्यार से बंटी को सुलाने लगी। उसके नाजुक-नाजुक पंखों को सहलाने लगी। बंटी बोला, "माँ, मैंने तय कर लिया है कि मैं समुद्र देखने जाऊंगा। तू डरना मत, मैं सही सलामत घर लौट कर आ जाऊंगा। तू बिलकुल भी मत डरना।" सोनू ने गहरी साँस लेकर कहा, "ठीक हे बेटा, जब तूने तय कर ही लिया है तो चले जाना।" बंटी खुशी से उछल पड़ा। समुद्र यात्रा के रंगीन सपने देखते हुए कब उसे नींद आ गई, उसे पता ही नहीं चला। दूसरे दिन सुबह ही बंटी अपने भाईयों, दोस्तों और माँ से विदा लेकर समुद्र यात्रा पर निकल पड़ा। बंटी बहुत उत्साह में था। नदी की धार के साथ तैरता हुआ वो काफी आगे निकल आया। रास्ते में तरह-तरह की मछलियाँ उसे मिलीं। कोई उसे अंजान समझ कर ठगी-सी देखती रहती और कोई छोटा, प्यारा बच्चा समझ कर मुसकरा देती। उसने भी उन्हें देख कर अपने पंख हिलाए। कुछ आगे चलकर बंटी को रुकना पड़ा। यहाँ से दो रास्ते अलग-अलग हो रहे थे। दाईं ओर वाले रास्ते का पानी कुछ हरे-हरे रंग का था और बाईं ओर वाला रास्ता कुछ नीला-नीला-सा था। बंटी कुछ समझ नहीं पाया कि अब उसे क्या करना चाहिए। वो बस अंदाज़ से दाएँ रास्ते की ओर चल पड़ा। ये पानी उसे कुछ अलग-सा नज़र आया। हरा पानी आगे चलकर बदबूदार हो गया। उसे उबकाई-सी आने लगी। बदबू से बचने के लिए उसने किनारा पकड़ लिया। कभी-कभी वो पानी के ऊपर आ जाता। बाहर का नज़ारा ऐसा था, जैसा उसने पहले कभी नहीं देखा। अपनी नदी में जब-जब वो नदी के ऊपर आता तो वही पेड़ और वही जंगल दिखाई देता था। कभी कभार इक्का-दुक्का आदमी भी दिखाई देता, पर माँ ने समझा रखा था, "आदमी से दूर रहना, ये पकड़ के ले जाते हैं;" इसलिए आदमियों को देखते ही वो गहरे पानी में गोता लगा जाता। नदी के बाहर बड़े-बड़े मकान बने हुए थे। पास में ही छोटे-छोटे बच्चे खेल रहे थे। बच्चों को देख कर बंटी रुक गया। वो उनका खेल देखने लगा। बच्चे इधर-उधर भाग रहे थे। कभी एक-दूसरे को पकड़ते, कभी ज़ोर से हँस पड़ते और फिर से भागने लगते। बंटी भी एक बार उनके साथ-साथ हँसा। शायद एक-दो बच्चों ने नदी की तरफ देखा भी, पर फिर से वे खेलने में मस्त हो गए। तभी बंटी को लगा, उसे बहुत देर हो गई है, आगे चलना चाहिए। उसने गहरे पानी में डुबकी लगाई और आगे बढ़ गया। रास्ते में उसे एक बूढ़ी मछली मिली। बंटी उसके पास गया और बोला, " अम्मा, यहाँ से समुद्र कितनी दूर है?" बूढ़ी मछली ने पलकें झपकाई फिर बोली, " अरे! तुम कौन हो! तुम्हें तो पहले यहाँ नहीं देखा...!"
 "मैं बंटी हूँ, बहुत दूर से आया हूँ और समुद्र देखने जा रहा हूँ।"
"समुद्र यहाँ से बहुत दूर है, संभल के जाना बेटा।" 
"तुम भी मेरी माँ की तरह हो," बंटी बुदबुदाया और आगे बढ़ गया। उसने देखा उसी की उम्र की तीन-चार मछलियाँ पानी में खेल रही थी। एक मछली मोटी-मोटी-सी थी। वो थोड़ा-सा भागने पर थक जाती। एक मछली नीली आँखों वाली थी। बंटी रुक गया। वे सब उसके पास आ गए। "तुम कौन हो भाई", मोटी मछली ने पूछा। 
"मैं बंटी हूँ, और तुम्हारा नाम क्या है?" 
सभी ने अपने-अपने नाम बताए। बंटी को नए दोस्त मिल गए। बंटी को उन्होने अपने खेल में मिला लिया। वो बहुत खुश हुआ। बहुत देर तक खेलने के बाद वे अपने घरों को लौटने लगे। उन्होने बंटी से भी घर चलने को कहा। "नहीं दोस्तो, अभी मुझे बहुत दूर जाना है, चलता हूँ," बंटी बोला। फिर उसने मुड़ कर कहा, "लौटते वक़्त ज़रूर मिलूँगा दोस्तो।" बंटी दुगुने उत्साह से आगे बढ़ रहा था। पानी में किसी रंगीन पत्थर को उठाता और उछाल देता। उसे यात्रा में बड़ा आनंद आ रहा था।
 "अरे वाह! इतना सारा खाना!" बंटी को भूख लगी हुई थी, वो खाने पर टूट पड़ा। खाते-खाते अचानक उसके गले में बहुत तेज़ दर्द हुआ, जैसे कोई तीखी चीज़ गड़ गई हो। वो बेचैन हो उठा। उसने जीभ को घुमा-घुमा कर उस तीखी चीज़ को निकालने की बहुत कोशिश की, पर वो कुछ ना कर पाया। अब तो उसका दर्द बढ्ने लगा। वो ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा। उसने माँ को पुकारा पर माँ तो बहुत दूर थी। वो बुरी तरह छटपटा रहा था। एक तेज़ झटके से किसी ने उसे उछल कर कहीं फैंक दिया। बंटी को साँस भी नहीं आ रही थी, वो बेहोश हो गया। वो कितनी देर बेहोश रहा उसे ध्यान भी नहीं। अजीब-अजीब-सी आवाज़ें, धुंधले-धुंधले साए उसके आसपास से गुज़र रहे थे। जब उसे होश आया, उसने अपने आपको एक चमकदार कटघरे में पाया। वहाँ उसके जैसी कई सुनहरी मछलियाँ थीं। वहाँ का पानी एकदम साफ और खुशबूदार था। उसमें खाना भी था। बंटी को थोड़ी तसल्ली हुई। उसका सर भारी हो रहा था। कुछ खाना खाकर उसने आगे बढ़ने के लिए छलांग लगाई। उसका बदन मानो किसी अदृश्य चट्टान से जा टकराया। उसने उलट-पलट कर देखा तो उसे चारों ओर दीवार नज़र आई। "ये मैं कहाँ आ गया," बंटी ने घबराते हुए सोचा। बंटी सुबक-सुबक कर रोने लगा। तभी चारों ओर तेज़ रोशनी हुई। सब मछलियाँ डर के मारे चुप हो गईं।    
बंटी ने देखा एक बच्चा उनकी ओर आया। उसने कटघरे को ऊपर से खोला और खाने की चीज़ें डालने लगा। बच्चा मुसकरा रहा था। वो उनसे कुछ कह रहा था। कुछ देर बाद वहाँ बहुत सारे लोग आए। बंटी कटघरे में एकदम नीचे चला गया। उसे माँ की बहुत याद आई। वे लोग कभी ज़ोर से हँसते और जाने क्या-क्या बोल रहे थे। बंटी को लगा वो अब कभी घर नहीं लौट पाएगा। माँ और अपने भाइयों को कभी नहीं देख पाएगा। वो रोते-रोते बेहाल हो गया। ऐसे ही कई दिन बीत गए। वो सिर्फ रोता रहता था। कई दिनों तक उसने कुछ नहीं खाया। वो बहुत कमजोर हो गया था। एकदम सुस्त, कटघरे के एक कोने में पड़ा रहता।  

और फिर एक दिन वही बच्चा एक आदमी के साथ वहाँ आया। वे लोग उसकी ओर इशारा करके कुछ बातें कर रहे थे। बड़ा आदमी ज़ोर-ज़ोर से कुछ बोल रहा था। बच्चा पैर पटक-पटक के रो रहा था। बंटी के कुछ समझ में नहीं आया। अचानक उस आदमी ने कटघरे को ऊपर से खोला, पानी में हाथ डालकर बंटी को पकड़ा और खिड़की से बाहर उछल दिया। बंटी फड़फड़ाते हुए नीचे बह रहे एक गंदे नाले में जा गिरा। वहाँ पानी कम और कीचड़ ज़्यादा था। पूरा नाला गंदगी से भरा हुआ था। उसे अपनी नदी का साफ-सुथरा पानी याद आया। पर उसे खुशी भी हुई कि कम से कम अब वो उस कटघरे से तो बाहर आ गया। उसने अपने पंख फड़फड़ाए और तेज़ी से तैरने लगा। कई दिन और कई रात वो इसी तरह आगे बढ़ता रहा। उस पल तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा जब उसने सामने बहती हुई नदी देखी। नाले का पानी नदी में गिर रहा था। वो भी छप्प से नदी में गिर गया। बंटी ज़ोर से चिल्लाया, "मिल गई, मिल गई, मुझे मेरी नदी मिल गई।" 
उसने आँखेँ मसलते हुए देखा, उसकी माँ और सारे भाई चारों ओर खड़े थे। सोनू ने बंटी के सर को सहलाते हुए पूछा, "क्या हुआ बेटा, चिल्ला क्यों रहे हो! कोई बुरा सपना देखा क्या?" बंटी तो कुछ बोल ही नहीं पाया। वो तो अपने घर में ही था। "वो हरे पानी वाली नदी, वो मोटी मछली, वो बूढ़ी मछली, वे खेलते हुए बच्चे और वो कटघरा.............," बंटी बुदबुदाया। माँ मुसकराई फिए बोली, "लगता है मेरा बहादुर बंटी सपने में समुद्र की सैर कर रहा था। बंटी शरमा गया और अपनी माँ से लिपट कर सो गया। 
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रविवार, 14 जून 2015

मन के मरुस्थल

 पूरे रास्ते  वो सर खाता रहा। "किरण जी, मैं आपको रियली बता रहा हूँ कि आपके आने से हमारे कार्यक्रम में चार चाँद लग गए। सब कह चुके थे, इतनी बड़ी राष्ट्रीय स्तर की कवयित्री अदिति किरण ……! कहाँ उनको इतना समय, पर किरण जी मुझे पक्का विश्वास था कि आप ज़रूर आओगे। मैं आपको रियली बता रहा हूँ........," वो बोलता ही चला गया। अदिति ने एक औपचारिक मुस्कान देकर गर्दन मोड़ ली और कार के शीशे से बाहर देखने लगी। जैसलमेर …… पीले पत्थरों वाले मकानों का शहर। शाम के छः बज गए थे पर फिर भी धूप आँखों में घुस के जैसे पूछ रही हो, "और, अब बता, कैसा लगा मेरा तेवर!" दूर ऊपर किला नज़र आ रहा था। किले की जड़ छोड़ते हुए पत्थर कभी भी हरहरा के उसके गिर जाने की भयावहता को पूरी तरह से सम्प्रेषित करते थे। कुछ प्राइवेट बसें खड़ी थीं आसपास के सीमावर्ती गावों तक जाने के लिए। बसों के पास ग्रामीणों की भीड़ थी। धोती और नीले कुर्ते में पुरुष और नीले-हरे रंग के सूट जैसे पहनावे में महिलाएँ। महिलाओं और पुरुषों दोनों की ही आँखों में काजल लगा हुआ था। चाँदी की गोल छल्लेदार नथ को झुलाती महिलाएँ हँसते हुए कुछ बोल रही थीं। 
"प्रकाश जी, ये कौन लोग हैं," उसने पूछा। एक पल को प्रकाश जी को ये लगा कि वो तो इतनी देर से क्या-क्या बोल रहे थे और ये उनकी बात ना सुन के बाहर कुछ और ही देख रही है। ऐसा दोनों को एक साथ लगा और अदिति ने उसे भरने के लिए जैसे कहा, "आपका जैसलमेर बहुत शानदार है।" हालाँकि ये वाक्य कुछ भी सोच के नहीं बोला गया था, या बस यूँही जैसे झैंप मिट जाए, या कि जिससे वो पल गुज़र जाए जिसमें इस बात का सामना करना पड़ता कि क्या आप मुझे अनदेखा कर रही थी। प्रकाश जी तुरन्त ही सहज हो गए, "किरण जी, मैं आपको रियली बता रहा हूँ कि आप मेरा निवेदन स्वीकार करो और आज यहीं रहो। मैं कल आपके जैसलमेर भ्रमण का कार्यक्रम बनाता हूँ।"बोलते-बोलते शायद उन्हें लगा कि कुछ ज़्यादा ही हो गया तो एक फीकी-सी हँसी से अपनी ही बात को उन्होंने हल्का भी किया। "अभी तो नहीं पर हाँ किसी दिन आऊंगी अवश्य," कह कर अदिति ने फिर वही औपचारिक मुस्कान दोहराई और साथ में चैन की साँस  भी ली कि चलो इनको अनावश्यक रूप से बुरा भी नहीं लगा। बस-स्टैंड से थोड़ा-सा आगे ही 'खादी ग्रामोद्योग भवन' का बोर्ड लगा था जो गाँधी की विरासत को संभाले हुए एक इतिहास को खुद में संजोए रखने के दर्प से भरा हुआ सर उठाए खड़ा था। बस, वहीँ प्रकाश जी उतर गए। उतर के फिर बोले, "किरण जी रियली बता रहा हूँ कि आप रुक जाते तो.…," इसके आगे खुद ही चुप लगा गए। 
"बहुत अच्छा लगा आप सब से मिल के, फिर होती है आपसे मुलाकात।" अदिति ने कार की खिड़की से प्रकाश जी को हाथ जोड़ कर विदा ली। शाम धीरे-धीरे रैंग रही थी। धूप की पीलास में गाढ़ापन उतर रहा था। शहर पीछे छूटता जा रहा था। वैसे तो अदिति की छुट्टियाँ अगले सप्ताह से शुरू हो रही थीं और उसके बाद ही उसे यहाँ आना था पर कामिनी जी ने एक पुस्तक लोकार्पण के लिए उसे जैसलमेर जाने को कहा तो उन्हें वो मना नहीं कर पाई। हालाँकि दिल्ली में रहते हुए, नौकरी करते हुए उसे ना जाने कितने साल गुज़र गए थे पर तब भी उसे दिल्ली की आदत नहीं हुई। आसमान के छोर से अँधेरा अपनी स्याही की बूँदें टपका कर शाम की गाढ़ी पीलिमा को हरने की कोशिश में लगा हुआ था। अदिति ने कार का शीशा खोल दिया तो हवा का एक तेज़ झौंका लपक के भीतर घुस आया। अभी तक बहुत गर्मी थी। शीशे को तुरन्त बंद करते हुए उसने पास पड़ी वो पुस्तक उठा ली जिसका आज उसने लोकार्पण किया था। कुछ कविताएँ पढ़ने लगी। पहली पुस्तक का छपना, पहली कविता के लिखे जाने के एहसास को बहुत सजीवता से दोहरा जाता है। ................ दिल्ली के कॉलेज वाले दिन उसके व्यस्ततम दिन हुआ करते थे। उसने माँ से पहले ही कह रखा था, "आप करो अपनी नौकरी, मुझे तो पढ़ना है। एम.ए. करूंगी, पी.एच.डी. करूंगी, ये नौकरी का चक्कर अपने बस का नहीं है।" हॉस्टल में रूम-पार्टनर मिली किट्टू ........ पूरी पगली। जहाँ एक ओर अदिति किताबों में डूबी रहती वहीं अक्सर किट्टू "चल रही है क्या पिक्चर" जैसे कई प्रपोजल लेकर आ धमकती। उसका चिपकना अदिति को बिलकुल नहीं सुहाता था। मान, मनुहार, प्यार, दोस्ती के तकाजे, डराने, धमकाने, चीखने, चिल्लाने जैसे सारे उपाय करके हार जाने के बाद "तो मर यहीं पे," कहके जब वो दरवाज़े को भटाक की आवाज़ के साथ अपने पीछे बंद करते हुए कमरे से निकल जाती तो ऐसा लगता जैसे कोई तूफ़ान-सा गुज़र गया हो। फिर कुछ पलों के बाद जब कमरे में ख़ामोशी पसरने लगती तो अदिति हल्का-सा मुस्कराती किट्टू की हरकतों को याद करके। कभी-कभी तो अदिति को किट्टू बहुत मासूम, छोटी-सी बच्ची लगती और कभी भारी आफत। कुल मिलाकर ये था कि वो समझ में पूरी तरह से आती ही नहीं थी। 
"किट्टू देख, कल रात मैंने एक कविता लिखी है, तुझे सुनाती हूँ।"
"मुझे माफ़ कर मेरी माँ, मुझे आत्महत्या नहीं करनी तेरी कविता सुनके," कहते हुए किट्टू करवट बदल कर फिर सो गई। बिना कुछ बोले अदिति पलट कर अपनी डायरी टेबल पर रखने लगी। किट्टू उठ कर आई और "अरे-अरे स्वीट हार्ट ऐसे उदास मत हो, चल ला, पढ़ते हैं तेरी कविता," कहते हुए अदिति से लिपट गई। 
"किट्टू!!! सौ बार कह चुकी हूँ तुझसे, मुझे ये तेरी चिपटा-चिपटी बिलकुल पसंद नहीं। मुझसे बात करनी है तो ढंग से किया कर वरना रहने दे," अदिति गुस्से में छिटक के किट्टू से दूर होते हुए बोली। 
"ओके ओके, कूल डाउन बेबी। ला, दे डायरी मुझे," कहती हुई किट्टू खुद ही डायरी लेकर बैड पर पसर गई। कुछ देर तो अदिति पास पड़ी कुर्सी पर बैठी रही फिर सरकते-सरकते खुद भी उसी के साथ आकर लेट गई। किट्टू कविता को अवांछित, अतिरिक्त स्वराघात लगा-लगा कर पढ़ने लगी-
                                    एक टुकड़ा दुपहरी झुलसा गई 
                                    तेज़ गर्म अंधड़ों ने कँपाया 
                                    तीखी चुभन ने किया बेबस 
                                    मेरे हिये के बिरवे को। 
किट्टू पढ़ते-पढ़ते हँसने लगी और हँसते-हँसते दोहरी होने लगी। फिर जैसे अदिति की आँखों को भाँप कर खुद ही संयत हो गई।
                                   सज गए सन्नाटों के मेले 
                                   सधने लगी एकांतों की रागिनियाँ 
                                   थिरकने लगे पैर, बिखरने लगे मोती। 
                                   आह! ये ताप कितना मादक…!
                                   कितना सरस, कितना अद्भुत…!
                                    एक अबूझ स्वीकृति में फैलादी बाँहें 
                                    मेरे हिये के बिरवे ने। 
                                    पूर्ण स्वीकृति के चरम बिंदु में 
                                    घटित हुआ चमत्कार 
                                    जलाता है जो, वही नया गढ़ने लगा 
                                    ताप भीतर पैंठने लगा 
                                    सृजन के अलिखित हस्ताक्षर उभर आए
                                     मेरे हिये के बिरवे पे। 
                                    अंतर का समूचा नेह-रस उमड़ आया बाहर 
                                    अलौकिक सुगंध बाहर को फूटी 
                                    सुप्त स्वर जाग उठे, करने लगे मंगल-ध्वनि 
                                     प्रेम कली खिल उठी 
                                     मेरे हिये के बिरवे पे।                       

कविता ख़त्म कर किट्टू अदिति की आँखों में झाँकने लगी। "बहुत अच्छी लिखी है यार। पूरी तो समझ में नहीं आई, पर है बहुत ज़ोरदार," कहते हुए किट्टू ने अदिति के चेहरे पर आ रहे बालों को सहलाते हुए पीछे किया। अदिति शून्य में जैसे कुछ तलाशते हुए, एक-एक शब्द जोड़ते हुए बोली, "किट्टू, पता है, हर किसी का खुद से बात करने का एक तरीका होता है, और मैंने इसके लिए कविता को चुना है।"
"तुझे देखती हूँ ना अदि, तो मुझे ये लगता है कि शायद कई बार ऐसा भी होता हो कि कविता खुद चुनती हो किसी को अपने लिए।" किट्टू की ये बात सुनकर अदिति जैसे फिर से अपने में लौट आई। हर बात को मज़ाक में उड़ा कर, ठठा कर हँसने वाली ये मस्तमौला लड़की भी कैसी गंभीर बात कह गई, अदिति सोचने लगी। और उस दिन तो अदिति गुस्से में फट पड़ी, "क्या ज़रूरत थी तुझे अपने मन से ये सब करने की? मैं नहीं जाने वाली कहीं भी। कम से कम मुझसे पूछा तो होता।" किट्टू ने अपने किसी परिचित को अदिति की कविताओं के बारे में बताया और अब उन्होंने अदिति को एक काव्यगोष्ठी में काव्यपाठ के लिए आमंत्रित कर लिया। दोनों में खूब लम्बी बहस, आड़ी-टेढ़ी तकरार हुई, पर अंत में किट्टू अदिति को साथ ले जाने में सफल हुई। पूरे रास्ते वो वादे करती रही कि अब अपने मन से ऐसा कुछ भी नहीं करेगी। गोष्ठी में भी किट्टू अदिति को पूरे समय बराबर संभाले रही। अपनी बारी आने पर अदिति ने कुछ कविताएँ पढ़ीं और साथ में सोच भी रही थी कि सबने इतनी अच्छी-अच्छी कविताएँ पढ़ीं, क्या पता क्या सोच रहे होंगे सब उसके बारे में। कविता रचने का अपना सुख होता है, कुछ-कुछ वैसा ही जैसा एक माँ निपट एकांत में अपनी संतान को चूमती है, प्यार करती है, उसे देख-देख कर खुश होती है; फिर चाहे दुनिया के लिए वो संतान कितनी भी भद्दी या बदसूरत क्यों ना हो। किन्तु उसी कविता को सबके सामने रखना, हरेक की तर्क-कसौटियों से गुज़रना और एक अजीब तरह की जवाबदेही-सी महसूस करना बड़ा ही यंत्रणादायक होता है। गोष्ठी ख़त्म हुई। "अब चल ना यहाँ से," कितनी ही बार कह चुकी थी अदिति, पर किट्टू चाय के साथ क्रैकजैक बिस्किटों पर टूटी पड़ी थी। तभी एक आकर्षक व्यक्तित्व वाली महिला ने अदिति का हाथ पकड़ उसे बहुत प्यार से कविता के लिए बधाई दी। चमकते नीले रंग की साड़ी को बहुत करीने से पहने हुए, गर्दन तक कटे हुए बालों को सहलाते हुए, अपने बाएँ हाथ की मध्यमा में पहनी अंगूठी के हीरक की आभा से अपने सौंदर्य-श्री की वृद्धि करती हुई ये महिला शहर की लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकार और एक साहित्यिक पत्रिका की सम्पादक थीं कामिनी जी। अदिति का हाथ थामे हुए वे उसे खिड़की के पास ले आईं और उसके बारे में पूछने लगीं। अदिति ने अपनी पढाई, अपने परिवार और अपनी कविता के बारे में बताया। वैसे ज़्यादा समय वो 'जी मैम, हाँ मैम' ही करती रही।
"मेरा नाम कामिनी है, आज से हमारी दोस्ती पक्की," कहते हुए कामिनी जी हँसी। अदिति की उनसे ये छोटी-सी जान-पहचान धीरे-धीरे एक मज़बूत और गहरी दोस्ती में बदलती चली गई। शहर में जब-तब होने वाले कवि सम्मेलनों, साहित्यिक चर्चाओं और कार्यक्रमों में कामिनी जी अदिति को ज़रूर शामिल कर लेतीं। बाद में यही कामिनी जी उसके पी.एच.डी. करने, कॉलेज में लेक्चरर की नौकरी करने और निरंतर उसके साहित्य अध्ययन-सृजन करने में उसकी एकमात्र सहायक, पथ-प्रदर्शक, लोकल गार्जियन और स्नेही मित्र की भूमिका निभाती रहीं। कॉलेज के दिन भी कब ना जाने पंख लगा कर उड़ गए। परीक्षाएँ ख़त्म होने के बाद जब घर जाने के लिए वो अपना सामान पैक कर रही थी तो किट्टू चुपचाप उसके साथ लगी हुई थी। फिर अचानक फफक कर अदिति से गले लगकर रोने लगी तो अदिति को भी रोना-सा आया। पर रोने से ज़्यादा उसे आश्चर्य इस बात का हो रहा था कि ये लड़की भी किसी के लिए इतनी गंभीर हो सकती थी क्या! ............. एक तेज़ ब्रेक के साथ  कार थोड़ी दूर तक घिसटती चली गई और झटके से रुक गई। जैसलमेर से पैसठ किलोमीटर की दूरी तय करके कब रामगढ़ आ गया कुछ पता ही नहीं चला। अदिति ने कार का दरवाज़ा खोला। सामने ही मूमल गैस्ट हाउस था। ये उसकी छुट्टियाँ बिताने की प्रिय जगह थी। एक छोटा-सा क़स्बा जो सूरज के निकलने के बहुत देर बाद खुलता और सूरज के डूबने से पहले ही जैसे अपने आप में सिमट कर बंद हो जाता। मूमल गैस्ट हाउस के ठीक पीछे रेत के धोरे फैले हुए थे। सड़क पर से गैस्ट हाउस ऐसा दीखता था जैसे किसी महाकाय रेतीले राक्षस के जबड़ों में फँसा हुआ हो और जैसे किसी भी पल वो उसे उदरस्थ कर लेगा। 
"चाय बणवाऊँ या खाणा ही लगवाऊँ हुकम....?" सरूप सिंह ने कुर्सी से उठते हुए पूछा। सरूप सिंह गैस्ट हाउस का मैनेजर, हाउस कीपिंग, नौकर, चौकीदार और सब कुछ था। "नहीं, मेरा खाना खाने  का मन नहीं है, ड्राइवर को खिला देना। मेरे लिए थोड़ी देर में अच्छी-सी कॉफी बनवा देना।" अदिति अपने कमरे की चाबी लेकर चलने लगी। नहा के निकली तो जैसे थोड़ी-सी साँस आई। सरूप सिंह कॉफी ले आया। एक बार फिर उसने पूछा, "हुकम, कहो तो खाणा लगवादूँ?" इन्कार में गर्दन हिलाते हुए कप को हाथ में लेते हुए अदिति पास रखे मोढ़े पर आराम से बैठ गई। इतनी लम्बी यात्रा के बाद इस कॉफी ने बड़ा सुकून दिया। कमरे की दीवार पर रेगिस्तान के प्रेमी-युगल महेन्द्र-मूमल की पेंटिंग लगी हुई थी। चित्र में मूमल राजस्थानी परिधान में सजी हुई अपने प्रेमी राजकुमार महेन्द्र के पास रेत के धोरों पर बैठी हुई थी। थोड़ा ही पास में महेन्द्र का प्रिय ऊँट खड़ा दिखाई दे रहा था। चित्र के रंग लगभग उड़ चुके थे। प्रीत बावरी ……! क्या इस जगत में प्रीत सदा ही अधूरी ही रहती है? इसके किरदार तो पूर्णतया लौकिक हैं, किन्तु अपेक्षाएँ, अभीप्साएँ पारलौकिक-सी हैं। "तुम सदा मेरे साथ रहना, तुम केवल मेरे हो, ये आत्माओं का मिलन है.………," जैसी ही अनेकों पुकारें प्रेमियों की ह्रदय-धरा पर उठती रहती हैं। जागतिक स्तर पर तो ये आकांक्षाएँ अधूरी ही रह जाती हैं, तो क्या प्रीत इस लोक में किसी पारलौकिक शक्ति की खोज है?
कप को टेबल पर सरका कर अदिति कमरे से बाहर निकली। गैस्ट हाउस के पिछले गेट से निकल कर रेत के धोरे पर धीरे-धीरे टहलने लगी। जब चप्पलें रेत में धँसने लगी तो उसने उन्हें खोल कर हाथ में ले लिया। मरुभूमि की इस रेत की खूबी है कि ये बहुत जल्दी गर्म होती है और जल्दी ही ठंडी भी हो जाती है। चाँदनी चारों ओर फैली हुई थी। कभी-कभी कोई हवा का हल्का-सा आवारा झौंका उसे छूता हुआ निकल जाता। अदिति वहीँ बैठ गई। एक हाथ की मुट्ठी में रेत को भरती और धीरे-धीरे मुट्ठी ढीली कर देती। रेत फिसलती जाती और मुट्ठी खाली हो जाती। फिर से मुट्ठी को भरती और थोड़ी देर में उसे खाली पाती। भरी हुई मुट्ठी का अपना सुख है और कुछ समय बाद उसके खाली होने के एहसास का  अपना ही दुःख है। अदिति सोचने लगी कि ऐसा उसी की ज़िन्दगी में हुआ या सभी के साथ ऐसा ही होता होगा। फिर अचानक उसने सोचा सब उसकी तरह सुनसान रात में ऐसे अकेले रेत के धोरे पर आकर भी तो नहीं बैठते। इस बेतुके साम्य पर उसे हँसी आई। उसकी नज़र ऊपर को गई तो उसे ऐसा लगा जैसे चाँद उसी को घूर रहा है। कालिदास से लेकर आज तक के सभी कवियों के मन को उद्वेलित करता रहा है ये चाँद। कितना पढ़ा, कितना लिखा.………… लगता है जैसे पूरे दौर का साक्षी था ये चाँद। पर दिल्ली में शायद ये वाला चाँद नहीं आता होगा। ये चाँद जैसे यहाँ के फैले हुए मरुस्थल को अपनी चाँदनी से शीतल करता था वैसे ही अदिति के भीतर फैले हुए मरुस्थल को भी। वो अपने भीतर के मरुस्थल में उतर गई। दूर-दूर तक सुनसान….... रेत ही रेत.……… प्यास ही प्यास! अदिति के मन के भीतर ये विशाल मरुस्थल कब व्याप गया उसे पता ही नहीं चला। माँ को अस्पताल ले जाने से लेकर, घर के छोटे-बड़े, अंदर-बाहर के सभी काम करने, इकलौते छोटे भाई महेश की नौकरी के फॉर्म भरने, नौकरी लग जाने पर उसकी रहने-खाने-पीने की व्यवस्था करने, उसकी शादी करवाके उसकी गृहस्थी जमाने तक के सारे काम अदिति पूरी जिम्मेदारी से करती चली गई थी। छोटा भाई पहले-पहले तो लाचारी से बड़ी बहन की ओर ताकता था, बाद-बाद में उसने इसी को आदत बना लिया क्योंकि ये ज़्यादा सुविधाजनक था। पापा तो कब के चले गए थे, माँ की बीमारी ने उसे घर के मुखिया की तरह काम करना सिखा दिया। धीरे-धीरे माँ खुद ही ये चाहने लगी कि वो हमेशा इसी तरह उसके साथ रहे, शायद वो जानती थी कि बेटा उनकी सेवा नहीं करेगा। शुरू-शुरू में अदिति के लिए बहुत से रिश्ते आए थे पर माँ ही कोई ना कोई कमी निकल कर उन्हें ठुकराती रही। 
"…… प्राइवेट नौकरी वाला है, इसमें तो खतरा ही रहता है, ..... अब सरकारी है तो क्या हुआ, घर में पाँच-पाँच लोग हैं, दो तो बहनें ही कुँवारी बैठी हैं, ……… इतनी दूर!! इतनी दूर रिश्ता करना ठीक नहीं है, पता नहीं कैसे लोग हैं, ………… इसकी उम्र ज़्यादा है, .......... इसकी उम्र कम है," ……… हर बार ऐसी ही कोई प्रतिक्रिया। जब भी कहीं से कोई प्रस्ताव आता तो तीन-चार दिनों तक घर में एक अजीब-सा तनाव छा जाता। माँ बात-बात में चिढ़ने लगती, "रहने दे, मैं तो नहीं लेती अब ये गोलियाँ, परेशान हो गई हूँ मैं तो, खाली तुझ पर बोझ बनी हुई हूँ। ऐसे में अदिति चुपचाप हाथ में गोलियाँ और पानी का गिलास लेकर माँ के सामने खड़ी हो जाती। जब-जब भी उसने महेश को माँ को सँभालने की बात कही तो "दीदी ये, दीदी वो" करता हुआ घंटे भर बात करके अपनी गृहस्थी, नौकरी और दूसरी परेशानियों का रोना रोकर अंत में कहता, "अब तू कहे जैसे करूँ।" उसके ट्रांसफर ने तो जैसे उसकी रही-सही जिम्मेदारी, जो कि मजबूरी में उसे कभी-कभी निभानी पड़ जाती थी, से भी उसे मुक्त कर दिया। इस सबके चलते धीरे-धीरे उसके भीतर का दरिया सूखते-सूखते मरुस्थल में बदल गया। अब उसके मन में हिलोरें नहीं उठती थीं, चलते थे तेज़ अंधड़, बिखरती थी रेत। ऐसे में उसे किट्टू की नितान्त भोलेपन में कही गई बात अक्सर याद आ जाती थी कि शायद कई बार ऐसा भी होता हो कि कविता खुद चुनती हो किसी को अपने लिए। साहित्य पढ़ना और रचना उसके जीवन की ऊष्मा थी। ये उसे बचाता था- मन में फैली निराशा से, मन में व्याप्त मरुस्थल के ताप से, जीवन में मजबूरीवश चुने गए निपट एकाकीपन के एहसास से। भीड़ में अकेले गुज़रने वाले दिनों में एक दिन वो भी आया जब माँ की बीमारी ने उसकी साँसों पर अंतिम जीत दर्ज़ कर उसे उठा लिया। जाने क्या हुआ पर अदिति रो नहीं पाई। सारे क्रिया-कर्म, आते हुए-जाते हुए रिश्तेदारों की व्यवस्था और बार-बार रो पड़ने वाले छोटे भाई को सँभालने में उसे बिलकुल अवकाश नहीं मिला कि वो ये सोचे भी कि उसने क्या खोया। जिस दिन महेश भी चला गया उस दिन अकेले घर में उसे माँ की बहुत याद आई। माँ की सुबह भूखे पेट लेने वाली दवाईयाँ फ्रीज़ के ऊपर ज्यों की त्यों रखी थी। उसका ताम्बे का लोटा, मुलायम वाला तकिया, त्रिफला पाउडर की शीशी, दोपहर और रात वाली दवाईयाँ देख कर अचानक अदिति को लगा कि माँ की स्मृति उसके जीवन में सुबह से रात तक चलने वाले इलाज की एक समय-सारिणी मात्र है। शाम को कामिनी जी आईं। उनके बहुत कहने के बाद भी कि वो कुछ दिन उन्हीं के साथ रहे, वो अपने घर पर ही रही, एकदम अकेली। वैसे भी ये अकेलापन उसके लिए कोई नया नहीं था। कुछ दिनों बाद जब उसने नौकरी पर जाना शुरू कर दिया तो एक दिन कामिनी जी ने उसे अपने साथ साहित्य अकादमी द्वारा जैसलमेर में आयोजित राज्य-स्तरीय कवि सम्मलेन में भाग लेने के लिए चलने को कहा। वैसे दो-तीन बार अकादमी से उसके पास फ़ोन आ चुका था पर वो असमर्थता जता चुकी थी। लेकिन कामिनी जी के स्वर में कुछ प्यार और कुछ आदेश का ऐसा मिश्रण था कि वो मना नहीं कर पाई। और तब पहली बार वो कामिनी जी के साथ ही रामगढ़ के इस मूमल गैस्ट हाउस में ठहरी थी। यहाँ मीलों दूर तक पसरे हुए इस रेगिस्तान के भूगोल ने जैसे उसके मन के भूगोल को पहचान उसे सहज स्वीकृति दी और उसे बहुत शांति मिली। दिन भर तपती और रात में शीतल होती इस मरुभूमि में न जाने कौनसा आकर्षण था कि आज चार साल बीत गए उस बात को पर तब से हर छुट्टी में वो यहीं आ जाती थी। कामिनी जी ने एक बार हँसते हुए कहा था कि ऐसा लगता है जैसे वो रेगिस्तान तेरा पीहर हो और दिल्ली तेरा ससुराल। कभी-कभी  सोचती थी कि ऐसे ही रेत के इस धोरे पर बैठे-बैठे उसे नींद आ जाए और चारों और से रेत सरक कर उसे पूरा का पूरा ढक ले और उसकी साँसों को अपनी साँसों में मिला ले। चाँद बहुत आगे जाकर उस पर अपनी वक्र दृष्टि डाल रहा था। दूर गैस्ट हाउस के पिछले गेट पर उसे सरूप सिंह खड़ा दिखाई दिया। ये इस बात का संकेत था कि रात काफी बीत चुकी है। 
अदिति धीरे-धीरे उठी और नीचे को उतरने लगी। रेत जैसे पैरों को जकड़ कर रो रही हो उसके जाने पर। जितनी खुश वो यहाँ आने पर होती थी उतनी ही उदासी यहाँ से लौटने पर उसे घेरने लगती थी। पीठ पीछे चाँद था और वो बोझिल क़दमों से रेत के धोरे से उतर रही थी। बालुई रेत पर बिखरी चाँदनी में उसके क़द से कहीं लम्बा उसका साया उसके आगे-आगे चल रहा था। हर बार की तरह ये साया तो चला जाएगा, वो तो शायद यहीं रह जाएगी। 
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