शुक्रवार, 8 मई 2020

प्रीत बावरी

... प्रीत न करियो कोय!
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प्रीत बावरी....! क्या इस जगत में प्रीत सदा अधूरी रहती है? इसके किरदार तो पूर्णतया  लौकिक हैं, किन्तु अपेक्षाएं, अभीप्साएं पारलौकिक-सी हैं।"तुम सदा मेरे साथ रहना, तुम केवल मेरे हो, ये आत्माओं का मिलन है......," जैसी ही अनेकोंनेक पुकारें प्रेमियों की ह्रदय-धरा पर उठती रहती हैं।जागतिक स्तर पर तो ये आकांक्षाएं अधूरी ही रह जाती हैं, तो क्या प्रीत इस लोक में किसी पारलौकिक शक्ति की खोज है...? या दग्ध ह्रदय को किसी अंजान, अज्ञात प्रदेश से आने वाली या आती हुई महसूस होने वाली किसी रूहानी शीतलता का आभास करवाने का माध्यम है...? कहीं प्रीत का ये अधूरापन ही तो इसे अनूठा नहीं बना देता है, या कहीं ये ही तो इसके किरदारों में एक अद्भुत आग तो नहीं भर देता जो कि उन्हें ज़माने से टकराने की कुव्वत दे देता है...?
...सबसे ऊंची प्रेम सगाई!

केटी
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