शुक्रवार, 13 दिसंबर 2019
साठ पार का आदमी
प्यासे पीर-1
गुरुवार, 12 दिसंबर 2019
कुएँ की मेढकी
मेढकी पानी में तैरती हुई तेज़ी से आगे बढ़ी और दीवार के पास आकर अपनी दोस्तों को आवाज़ देने लगी। चींटियाँ चलते-चलते रुक गईं। रानी चींटी ने मुड़ कर देखा और बोली, “ओह! तो तू है। बोल प्यारी मेढकी, क्या बात है!” मेढकी ने कुछ संकोच के साथ, धीरे-धीरे फुसफुसाते हुए रानी चींटी से कहा, “तुम तो दिन-रात चलती रहती हो, जाने कहाँ-कहाँ जाती हो। मैं भी यहाँ से निकल कर देखना चाहती हूँ कि यहाँ के बाहर क्या-क्या है!” “हाँ तो देखो ना, ये दुनिया तो बहुत बड़ी है, जाने कितनी-कितनी दूर फैली हुई! कई तरह के जीव, कई तरह की चीजें, कई तरह की गंध, कई तरह के स्वाद... और भी जाने क्या-क्या है,” रानी चींटी बोली। मेढकी ने कुछ उदास होते हुए कहा, “मैंने बहुत कोशिश की यहाँ से निकलने की, पर घेरे की दीवार पर इतनी फिसलन है कि हर बार मैं फिसल कर पानी में गिर जाती हूँ। ... क्या तुम कोई और रास्ता बता सकती हो, जिस से मैं बाहर निकल जाऊँ!” रानी ने थोड़ी देर सोचा फिर कहा, “तुम ऐसा करो, यहाँ से घेरे के किनारे-किनारे चलती जाओ। आगे, बहुत आगे एक जगह ऐसी आएगी जहाँ घेरे का पत्थर अभी कुछ रोज़ पहले ही उखड़ा है, वहाँ से ऊपर तक एक दरार आई हुई है। इस दरार में अभी फिसलन नहीं हुई है, तुम उसके सहारे-सहारे घेरे से बाहर निकल जाना।” मेढकी की खुशी का ठिकाना ना रहा। उसने अपनी दोस्त रानी चींटी को धन्यवाद दिया। रानी चींटी ने मुस्करा के उसे देखा और अपने दल के साथ आगे बढ़ गई।
बहुत देर तक वहीं बैठी रहने के बाद उसने अपने खाने-पीने-रहने का ठिकाना ढूँढना शुरू किया। कुएँ के ठीक पास ही एक छोटे गड्ढे में पानी भरा हुआ था। उसमें भी कुछ मेढक तैर रहे थे। जब उनकी इच्छा होती गड्ढे के बाहर आ जाते, घूमते-फिरते और फिर उसमें चले जाते। मेढकी ने गड्ढे के मेढकों से दोस्ती की और उनके साथ रहने लगी। अब वह कुएँ की उस अंधेरी, गंदी-बदबूदार कैद से आज़ाद थी। दिन गुजरने लगे। रोज़ मेढकी रोशनी में खूब घूमती, आस-पास के पेड़ों, झाड़ियों में रहने वाले पक्षियों से उसकी जान-पहचान बढ़ने लगी।
रविवार, 17 नवंबर 2019
एक दोस्त के नोट्स
1. जिन्दगी पर काबू पाना सीखना पड़ता है, वरना जिन्दगी नाक में नकेल डालकर नचाती रहती है और हमारे पास अफसोस के सिवा कुछ नहीं बचता।
2. वक्त सबके पास एक-सा रहता है। ये हम पर निर्भर करता है कि हम उसे कैसे कैसे, कहाँ कहाँ और किसे किसे देते हैं।... पर इस सबका अहसास हमें वक्त गुजर जाने के बाद ही होता है। और लोग इसीलिए वक्त को कोसते रह जाते हैं।
3. हर मोड़ से एक नई राह निकलती है। नई राह का स्वागत सूरज की पहली किरण की तरह करें तो जीवन में प्रकाश भर सकता है, आनंद के पंछी किल्लोल कर सकते हैं।... और सबसे खास बात ये है कि इसके लिए प्रतीक्षा करने की जरूरत नहीं है, मन को मोड़ा और वो मोड़ हाजिर हुआ।
4. बारिश की फुहारों में बेतकल्लुफ होकर भीगना अपने भीतर खोए बचपन को तलाशने जैसा है। और यकीनन बेहद खूबसूरत अहसास है ये।
5. ये आंशिक रूप से सही है। वर्कप्लेस का मेरा लम्बा और बहुआयामी अनुभव मुझे सिखाता है कि वर्कप्लेस पर सबके साथ दोस्ती होनी चाहिए। ये आपको काम में सुविधा और आनंद देती है। दोस्ती के अभाव में वर्कप्लेस दिनोंदिन अरुचिकर, नीरस और धीरे धीरे एक कुढ़न देने वाला बन जाता है।
6. यादें... झिरमिर झिरमिर बूँदाबाँदी वाले मौसम में कार के विंड स्क्रीन पर लटकती, ड्राइवर को शरारत भरी नजरों से तकती महीन बूँदें हैं। एक बार नहीं, दस बार वाइपर चला लो; कुछ पल के लिए ओझल हो जाएँगी, कब वापस आ जाएँगी, पता ही नहीं चलेगा। चोर नजरों से सीधे मन की खिड़की में झाँकने लगेंगी, अहसास करवाएँगी कि जब जब झिरमिर रुत हो तो वे विंड स्क्रीन पर उभरेंगी ही, क्योंकि सच तो ये है वे कभी कहीं जाती ही नहीं, वहीं रहती हैं।
7. अचानक से गायब हो जाना कैसा होता है!!...
यह सच है कि जिन्दगी के सफर में लोग मिलते हैं, बिछड़ते हैं, कभी-कभी फिर मिलते हैं। मन की स्लेट पर कोई हल्की, कोई गहरी तो कोई बहुत गहरी रेखा खींच जाते हैं।... दूर जाता हुआ व्यक्ति बहुत दूरी तक दिखता रहता है... धीरे-धीरे उसका आकार छोटा और धुँधला होता जाता है... फिर भी देर तक दिखता रहता है... और अंत में दृष्टि-रेखा के अंतिम छोर पर वह एक बिन्दु के रूप में बदल जाता है पर वह बिन्दु भी बहुत दूर तक दिखता रहता है। तब कहीं जाकर वह आँखों से ओझल होता है।
... किन्तु, ठीक पास, एकदम करीब, हँसता-बोलता-खिलखिलाता, अपने छोटे-छोटे दुख-सुख बाँटता, कोई व्यक्ति एकदम गायब कैसे हो सकता है!! ठीक वैसे ही जैसे कमरे में बैठे हों, एक पल के लिए लाइट गई और जैसे ही अगले पल रौशनी हुई तो देखा एक व्यक्ति उठकर कहीं चला गया! ऐसे में हर पल, हर घड़ी यही खटका रहता है कि शायद वह फिर लौट आया।... पर जब दिनों, हफ्तों, महीनों तक दरवाजे तक गई हर नजर उदासी और निराशा की प्रतिध्वनि बन लौट आती है तब अचानक यह विचार एक विस्फोट के साथ समूची चेतना पर छा जाता है कि "अरे! वह तो गायब हो गया!"
केटी
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8. कितना कुछ गुजर जाता है पर तब भी घने कोहरे से ढका बहुत कुछ रह जाता है। यही वो कोना बन जाता है जहाँ हम बेसाख्ता उघड़ते चले जाते हैं, दबे हुए जख्म रिसने लगते हैं, दर्द की ठंडी लहर रीढ़ की हड्डी में बजबजाती रहती है, मन पर कटे कबूतर की मानिंद फड़फड़ाता रहता है... देर तक... बहुत देर तक!
कुछ ग़मों का एहतराम ख़ामोशी से करना होता है दोस्त!
केटी
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9. बचपन की खुशियाँ पूरे जीवन की अमूल्य निधि होती है जिसे हर व्यक्ति कंजूस की छुपी हुई पोटली की तरह संभाल कर रखता है, जब तब उसे टटोलता रहता है और खुश होता रहता है।
केटी
गुरुवार, 24 अक्टूबर 2019
लट्टू और डोरी
शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2019
थल्लम-थल्ली
शुक्रवार, 13 सितंबर 2019
वो कविता रचना मेरे कवि!
वो कविता रचना मेरे कवि!
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धन्यवाद मेरे कवि!
कि तूने अहसास करवाया मुझे
मेरी रगों तक पैठ चुके अँधेरे का,
अँधेरे के खौफ का,
स्याह काली पड़ती मेरी रूह का।
पर मेरे प्रिय कवि!
एक संकेत-भर कर देता,
कुछ शब्द दे देता
कर लेता जिससे मैं उजाले का संधान।
प्रतीक्षा करूँगा मैं प्रिय कवि!
कल और एक कविता की
चाँद की, उजाले की, भविष्य की।
केटी
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मंगलवार, 10 सितंबर 2019
संकल्प
संकल्प
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प्रेम गीत रचा जाएगा
किन्तु उससे पहले सुननी होगी
युद्ध की दास्तान
झेलने होंगे अनेकों घाव।
युद्ध के लिए
करने होंगे पार न जाने कितने बीहड़
क्रान्ति के आखर माँडते हुए
रंगने होंगे न जाने कितने आँगन
कितने नुक्कड़ों पर गुँजाने होंगे आह्वान के गीत
बजाते हुए डफ, मिलाते हुए ताल।
हर चीज मिट जाए
पर यह संकल्प जिन्दा रहेगा
कि कुछ भी हो जाए ऐ दोस्त!
ये सफर तय किया जाएगा
और आखिर एक दिन
प्रेम गीत रचा जाएगा।
केटी
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शुक्रवार, 6 सितंबर 2019
जिज्ञासा
बच्चा जब घुटनों पर चलता है
सरकता, किलकता, मचलता रहता है
अचानक ठहर कर घुमाता है गर्दन
लक्ष्य करता किसी चीज को
अपलक ताकता रहता है।
वो चाहे खुद की परछाई हो
बूढ़ी दादी या मैं-मैं करती बकरी
या कोई टूटा हुआ खिलोना।
अपलक ताकते बच्चे की आँख
हो जाती फैल कर अंडाकार,
पुतलियाँ बदल जाती एक प्रश्नवाचक चिह्न में
वहीं से शुरू होता सफर
जिज्ञासा के 'जि' का।
केटी
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गुरुवार, 22 अगस्त 2019
उजाला
उजाला तैयार था
मुझ तक आने को
रुका रहा तब तक
जब तक मैंने बाँहें ना फैलाईं
अँधेरे के स्वागत में।
केटी
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गुरुवार, 11 जुलाई 2019
मन मेरा
एक घर है मन
आते हैं, जाते हैं मेहमान- विचार हैं।
कुछ मेहमान रहते लम्बे समय तक घर में
कुछ लौट जाते कुछ समय रहकर
कुछ केवल रखते पैर अंदर
और चल देते तुरंत उल्टे मुँह।
मेहमानों से होती घर में चहल-पहल
शान्त घर लगता अशान्त।
मैं देखता रहता हूँ आते जाते मेहमानों को
या कभी कभार खाली घर को भी
शायद देखना ही मेरी नियति है।
मेहमानों से ठुँसा पड़ा है घर
घर का मालिक मैं, दूर खड़ा हूँ घर से
जाऊँ कैसे भीतर।
केटी
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स्पर्श
कण-कण कर बदलता
बदलता जाता निरंतर
और एक वो क्षण ऐसा भी आता
कि बदल जाता समूचा मैं एक भीनी सुगंध में।
होता यह तब
जब साँसों के एकदम करीब आ
छू लेता वो मुझे।
केटी
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मंगलवार, 9 जुलाई 2019
पीड़ा
पेड़ जब उखड़ता है तेज अंधड़ में
गिर जाता धरती पर
अस्थमा के बलगम भरी छाती-सा हाँफता
लेता गहरी गहरी साँस
आखिरी साँस की इंतजार में।
किसी अदृश्य जड़ की बाल से भी बारीक कली
रह जाती जुड़ी धरती से
ठेठ गहरे पाताल में।
वो अदृश्य जड़ जो करती महसूस
खुद से बहुत दूर पड़े पेड़ का दुख
पर दिखती नहीं किसी को
कहती नहीं कुछ भी
दुख में बनती चिर सहभागिनी
वो... पीड़ा है।
केटी
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